कृति आरके जैन
“सुरक्षा” एक ऐसा शब्द है, जिसे सुनते ही मन में भरोसे और संरक्षण की छवि उभरती है। यही शब्द माता-पिता की सबसे बड़ी ढाल माना जाता है और यही समाज की सबसे बड़ी दलील भी। लेकिन जब यह शब्द बेटी की आज़ादी छीनने का माध्यम बन जाए, तब इसका अर्थ बदल जाता है। तब सुरक्षा एक ऐसा ताला बन जाती है, जो बेटी के सपनों, इच्छाओं और आत्मसम्मान पर जड़ दिया जाता है। यह ताला दिखाई नहीं देता, पर इसका बोझ हर सांस के साथ महसूस होता है। बेटी को बताया जाता है कि यह सब उसके भले के लिए है, जबकि असल में यह उसके अस्तित्व पर नियंत्रण की प्रक्रिया होती है।
भारतीय समाज में बेटी को आज भी एक स्वतंत्र व्यक्ति की बजाय परिवार की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाता है। उसकी चाल, पहनावा, दोस्ती और निर्णय—सब पर निगाह रखी जाती है। जैसे ही बेटी अपने जीवन के फैसले खुद लेने की बात करती है, “सुरक्षा” का तर्क सामने खड़ा कर दिया जाता है। प्रेम, विवाह, शिक्षा या करियर—हर क्षेत्र में उसकी आज़ादी सीमित कर दी जाती है। यह सीमाएँ परिवार द्वारा खींची जाती हैं और समाज द्वारा स्वीकार कर ली जाती हैं। यही स्वीकृति इस समस्या को और गहरा बनाती है।
इस तथाकथित सुरक्षा का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इसे प्रेम का रूप देकर प्रस्तुत किया जाता है। माता-पिता कहते हैं कि दुनिया बहुत खराब है, इसलिए बेटी को घर में रखना ज़रूरी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या दुनिया केवल बेटी के लिए ही खराब है? बेटे भी उसी दुनिया में रहते हैं, वही रास्ते तय करते हैं, वही जोखिम उठाते हैं। फर्क सिर्फ़ इतना है कि बेटी को कमजोर और असहाय मान लिया जाता है, और यही मान्यता उसकी आज़ादी की सबसे बड़ी दुश्मन बन जाती है।
यह कैद केवल दरवाज़े बंद करने तक सीमित नहीं होती। यह सोच, भावनाओं और निर्णयों पर भी पहरा बिठा देती है। बेटी से बार-बार कहा जाता है कि वह समझदार बने, समाज की बात माने, परिवार की इज़्ज़त रखे। धीरे-धीरे वह अपने मन की बात कहना छोड़ देती है। सवाल पूछना, विरोध करना या अपनी इच्छा जताना उसे अपराध जैसा लगने लगता है। यह मानसिक कैद शारीरिक कैद से कहीं अधिक खतरनाक होती है, क्योंकि इसमें सलाखें दिखाई नहीं देतीं, लेकिन रास्ते पूरी तरह बंद हो जाते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में यह समस्या परंपरा और जाति की कठोर दीवारों से और भी मज़बूत हो जाती है। प्रेम विवाह या अंतरजातीय संबंधों के मामलों में बेटियों को घर में बंद कर देना, मोबाइल छीन लेना या बाहर निकलने से रोक देना वहाँ सामान्य व्यवहार माना जाता है। कई बार यह कैद महीनों नहीं, बल्कि वर्षों तक चलती है। शहरों में इसका रूप थोड़ा बदला हुआ दिखता है, लेकिन सार वही है। यहाँ बेटी को “आधुनिक सुरक्षा” के नाम पर निरंतर निगरानी में रखा जाता है—लोकेशन ट्रैकिंग, समय की सख्त पाबंदी और हर निर्णय पर सवाल। फर्क सिर्फ़ दिखावे का है, सोच वही पुरानी है।
कानून इस पूरी व्यवस्था के विपरीत खड़ा है। भारतीय संविधान हर महिला को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। बालिग बेटी को अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने का पूरा हक़ है। इसके बावजूद, जब मामला परिवार का बताकर पेश किया जाता है, तो कानून कई बार मौन हो जाता है। पुलिस और प्रशासन अक्सर माता-पिता की बात को ही अंतिम मान लेते हैं, जबकि बेटी की सहमति और इच्छा को नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। यहीं कानून और समाज के बीच का टकराव साफ दिखाई देता है, और दुर्भाग्य से अक्सर समाज हावी हो जाता है।
इस कैद का मनोवैज्ञानिक प्रभाव बेहद गहरा और दीर्घकालिक होता है। आत्मविश्वास टूटता है, आत्मसम्मान कमजोर पड़ता है और भविष्य को लेकर डर पैदा होता है। कई बेटियाँ अवसाद, चिंता और अकेलेपन का शिकार हो जाती हैं। पढ़ाई और करियर पर इसका सीधा असर पड़ता है, क्योंकि उनकी ऊर्जा अपने अधिकारों की रक्षा में ही समाप्त हो जाती है। परिवार इसे अस्थायी कदम मानता है, लेकिन बेटी के लिए यह अनुभव जीवन की दिशा बदल देता है।
समाज की दोहरी मानसिकता इस समस्या को और अधिक जटिल बना देती है। एक ओर बेटियों को देवी कहकर पूजने की परंपरा है, तो दूसरी ओर उन पर भरोसा करने से गहरा संकोच भी है। फिल्मों, धारावाहिकों और लोककथाओं में आज भी “आदर्श बेटी” वही दिखाई जाती है, जो चुप रहे, सहन करे और कभी सवाल न उठाए। यही सांस्कृतिक संदेश पीढ़ी दर पीढ़ी दोहराया जाता है, जिससे नियंत्रण को नैतिकता और दमन को संस्कार का सम्मानजनक नाम मिल जाता है।
इस अंधेरे के बीच बदलाव की कुछ स्पष्ट किरणें भी दिखाई देती हैं। शिक्षा, सोशल मीडिया और जागरूकता अभियानों ने बेटियों को अपनी बात रखने का साहस दिया है। अनेक संगठन और मंच ऐसे हैं, जो कानूनी सहायता के साथ-साथ मानसिक संबल भी प्रदान कर रहे हैं। फिर भी यह प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। जब तक समाज की सामूहिक सोच नहीं बदलेगी, तब तक “सुरक्षा” का यह पिंजरा नए-नए रूपों में बना ही रहेगा।
शिक्षा इस समस्या की जड़ पर सीधा प्रहार करती है। शिक्षित बेटी न केवल अपने अधिकार पहचानती है, बल्कि उन्हें हासिल करने का आत्मबल भी जुटाती है। उतना ही ज़रूरी है माता-पिता और समाज की मानसिक शिक्षा। जब यह समझ विकसित होगी कि सुरक्षा का अर्थ संदेह या नियंत्रण नहीं, बल्कि विश्वास, संवाद और समर्थन है, तब बेटियों को कैद करने की प्रवृत्ति स्वतः समाप्त होने लगेगी। स्कूलों और परिवारों में समानता और सम्मान की भावना को सुदृढ़ करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
आर्थिक स्वतंत्रता भी इस संघर्ष का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हथियार है। आत्मनिर्भर बेटी न केवल अपने निर्णय स्वयं लेने में सक्षम होती है, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस भी जुटा पाती है। रोजगार, व्यावसायिक कौशल और आगे बढ़ने के अवसर उसे मानसिक व सामाजिक मजबूती देते हैं। जब बेटी आर्थिक रूप से सशक्त होती है, तब “सुरक्षा” के नाम पर लगाए गए ताले अपने आप कमजोर पड़ने लगते हैं और नियंत्रण की जगह आत्मविश्वास ले लेता है।
“सुरक्षा” के नाम पर बेटी को जेल में रखना मात्र पारिवारिक विषय नहीं, बल्कि एक गहरा और गंभीर सामाजिक अन्याय है। यह पितृसत्तात्मक सोच की वही कठोर दीवार है, जिसे तोड़े बिना समानता और न्याय की कल्पना अधूरी रहती है। सच्ची सुरक्षा बंद दरवाज़ों में नहीं, बल्कि खुले अवसरों और विश्वास में निहित है। बेटी को उड़ने का अधिकार दिया जाए, उस पर भरोसा किया जाए और उसकी स्वतंत्रता का सम्मान किया जाए। तभी समाज वास्तव में सुरक्षित, संवेदनशील और प्रगतिशील कहलाने के योग्य बन सकेगा।





