जहाँ अक्षर उँगलियों से बोलते हैं: ब्रेल लिपि के जनक लुई ब्रेल

Where letters speak with fingers: Louis Braille, the father of Braille

सुनील कुमार महला

प्रतिवर्ष 4 जनवरी को ‘विश्व ब्रेल दिवस’ (वर्ल्ड ब्रेल डे) के रूप में मनाया जाता है, क्यों कि आज ही के दिन ब्रेल लिपि(नेत्रहीन लोगों के पढ़ने के लिए एक लिपि) के आविष्कारक लुईस ब्रेल का जन्म हुआ था। दूसरे शब्दों में कहें तो यह दिन ब्रेल लिपि के आविष्कारक लुई ब्रेल की जयंती पर दृष्टिबाधित व्यक्तियों के अधिकारों, उनकी शिक्षा और उनके लिए समान अवसरों के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाने के लिए समर्पित है। बहुत कम लोग जानते हैं कि ब्रेल कोई भाषा नहीं, बल्कि यह एक लिपि है, जिसे दुनिया की लगभग सभी भाषाओं में अपनाया जा सकता है। केवल छह उभरे बिंदुओं के संयोजन से अक्षर, अंक, गणितीय चिह्न, संगीत संकेत और यहां तक कि कंप्यूटर कोड भी पढ़े-लिखे जा सकते हैं। जानकारी मिलती है और लुई ब्रेल ने इस प्रणाली का विकास मात्र 15 वर्ष की उम्र में किया था। आज ब्रेल केवल काग़ज़ तक सीमित नहीं है। डिजिटल ब्रेल डिस्प्ले, ब्रेल नोट-टेकर और स्मार्ट डिवाइसों ने इसे आधुनिक तकनीक से जोड़ दिया है, जिससे आज शिक्षा और रोज़गार के नए अवसर खुले हैं। भारत में भी विभिन्न भारतीय भाषाओं के लिए मानकीकृत ब्रेल उपलब्ध है। यहां पाठकों को बताता चलूं कि इस दिवस का मुख्य उद्देश्य दृष्टिबाधित लोगों के शिक्षा, सूचना और अभिव्यक्ति के अधिकार को सुदृढ़ करना, समाज में समावेशन (इन्क्लूजन) की भावना को बढ़ावा देना और सुलभ सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। ब्रेल साक्षरता आत्मनिर्भरता, आत्मसम्मान और गरिमापूर्ण जीवन की आधारशिला है और वास्तव में यही संदेश विश्व ब्रेल दिवस के केंद्र में रहता है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि (2026 की थीम के संदर्भ में) उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र हर वर्ष कोई अनिवार्य/स्थायी आधिकारिक थीम घोषित नहीं करता है तथा 2026 में भी यह दिवस व्यापक रूप से सुलभता, समावेशी शिक्षा और दृष्टिबाधितों के अधिकारों जैसे संदेशों के साथ मनाया जाएगा। कुल मिलाकर, विश्व ब्रेल दिवस हमें याद दिलाता है कि सुलभता कोई सुविधा नहीं है, बल्कि यह मौलिक अधिकार है, और ब्रेल लिपि इस अधिकार को साकार करने का सशक्त माध्यम है। बहरहाल, कहना ग़लत नहीं होगा कि फ्रांस में जन्मे लुईस ब्रेल नेत्रहीनों (अंधों) के लिए ज्ञान के चक्षु बन गए। फ्रांस के लुई ब्रेल ने स्वयं एक दृष्टिहीन होने के बावजूद दृष्टिहीनों को पढ़ने-लिखने के योग्य बनाया। सामान्य बच्चे या तो रोमन लिपि में पढ़ते हैं या देवनागरी लिपि में, लेकिन दृष्टिहीन बच्चों के पढ़ने के लिए लुई ब्रेल ने एक अलग लिपि जिसे ब्रेल के नाम से जाना जाता है, छोटी उम्र में ही विकसित की। पाठकों को यहां जानकारी देना चाहूंगा कि लुई ब्रेल का पारिवारिक जीवन अत्यंत साधारण, संघर्षपूर्ण और प्रेरणादायक था।उनका जन्म 4 जनवरी 1809 को कूपव्रे, फ्रांस में हुआ था तथा उनके पिता साइमन-रेने ब्रेल पेशे से चमड़े का काम (हार्नेस बनाने) करते थे, जबकि माता मोनीक ब्रेल एक गृहिणी थीं। जानकारी मिलती है कि उनका परिवार आर्थिक रूप से समृद्ध नहीं था, लेकिन माता-पिता ने बच्चों को संस्कार, अनुशासन और शिक्षा का महत्व सिखाया।लुई ब्रेल अपने परिवार के चार बच्चों में सबसे छोटे थे। कहते हैं कि मात्र तीन वर्ष की उम्र में पिता की कार्यशाला में खेलते समय एक औज़ार से उनकी आंख में चोट लगी, जो संक्रमण के कारण धीरे-धीरे पूर्ण दृष्टिहीनता में बदल गई। इस दुर्घटना के बाद परिवार ने उन्हें बोझ नहीं समझा, बल्कि हर संभव सहयोग दिया। माता-पिता ने उनके आत्मविश्वास को बनाए रखा और शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया।लुई ब्रेल का विवाह नहीं हुआ तथा उनका पूरा जीवन शिक्षा, अध्ययन और दृष्टिबाधित लोगों के लिए उपयोगी लेखन प्रणाली के विकास को समर्पित रहा। परिवार का भावनात्मक सहारा और बचपन में मिले संस्कार उनके व्यक्तित्व की नींव बने। साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने ऐसी लिपि विकसित की, जिसने दुनिया भर के करोड़ों दृष्टिबाधित लोगों के जीवन को रोशन किया।पिता के साथ काम करने के दौरान एक हादसे में पहले उनकी एक ही आंख खराब हुई थी, लेकिन बाद में उनकी दूसरी आंख की रौशनी भी चली गई थी तथा आर्थिक तंगी के कारण उन्हें सही से इलाज भी न मिल सका और 8 साल की उम्र में ही लुईस ब्रेल को दिखाई देना बंद हो गया था। ब्रेल ने नेत्रहीनों के लिए पढ़ने और लिखने के लिए एक स्पर्शनीय कोड का आविष्कार किया था, जो ब्रेल लिपि कहलाई। इसमें विशेष प्रकार के उभरे कागज का इस्तेमाल होता है, जिस पर उभरे हुए बिंदुओं को छूकर पढ़ा जा सकता है। टाइपराइटर की तरह की ही एक मशीन ‘ब्रेलराइटर’ के माध्यम से ब्रेल लिपि को लिखा जा सकता है। इसके अलावा स्टायलस और ब्रेल स्लेट के जरिए भी लिख सकते हैं। पाठकों को बताता चलूं कि ब्रेल में उभरे हुए बिंदुओं को ‘सेल’ कहा जाता है। बहरहाल, नेत्रहीन यानी कि ‘जो देख नहीं सकते’ उन लोगों के लिए 4 जनवरी का दिन बेहद खास होता है। ये लुईस ब्रेल ही थे, जिसके चलते आज दृष्टिहीन लोग भी ब्रेल लिपि का उपयोग कर पढ़-लिख रहे हैं और निरंतर आगे बढ़ रहे हैं। वास्तव में, ब्रेल लिपि नेत्रहीनों को पढ़ने और लिखने में छूकर व्यवहार में लाई जाती है। वास्तव में, देखा जाए तो ब्रेल एक लिपि मात्र नहीं है, अपने आप में यह एक भाषा है, जिसका उपयोग दृष्टिबाधित लोग लिखने और पढ़ने के लिए करते हैं। लुईस ब्रेल ने ब्रेल लिपि का आविष्कार करके दृष्टि बाधित लोगों को शारीरिक कमी के बाद भी आत्मनिर्भर बनाने का काम किया और नेत्रहीन लोगों की जिंदगी में एक मसीहा बनकर उभरे। दूसरे शब्दों में कहें तो ब्रेल लिपि का आविष्कार करके लुईस ब्रेल दुनियाभर के दृष्टिबाधितों के मसीहा बन गए। हालांकि, जब तक वह जीवित थे, तब उनके काम(ब्रेल लिपि के आविष्कारक को) को सम्मान नहीं मिला, लेकिन बाद में विश्व ब्रेल दिवस की शुरुआत उनके ही जन्मदिन पर करके लुईस ब्रेल को सम्मान प्रदान किया गया। ब्रेल ने इस पद्धति(ब्रेल लिपि )का आविष्कार उन्होंने 1821 में किया था। वास्तव में यह लिपि अलग-अलग अक्षरों, संख्याओं और विराम चिह्नों को दर्शाती है। विकीपीडिया पर उपलब्ध जानकारी से यह पता चलता है कि ब्रेल के नेत्रहीन होने पर उनके पिता ने उन्हें पेरिस के ‘रॉयल नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ब्लाइंड चिल्ड्रेन’ में भर्ती करवा दिया था। उस स्कूल में “वेलन्टीन होउ” द्वारा बनाई गई लिपि से पढ़ाई करवाई जाती थी, लेकिन यह लिपि अधूरी थी। कहते हैं कि इस इंस्टीट्यूट में एक बार फ्रांस की सेना के एक अधिकारी कैप्टन चार्ल्स बार्बियर प्रशिक्षण देने के लिये आए और उन्होंने सैनिकों द्वारा अँधेरे में पढ़ी जाने वाली ‘नाइट राइटिंग’ या ‘सोनोग्राफी लिपि’ के बारे में एक व्याख्यान(लेक्चर) दिया। यह लिपि कागज पर अक्षरों को उभारकर बनाई जाती थी और इसमें 12 बिंदुओं को 6-6 की दो पंक्तियों को रखा जाता था, पर इसमें विराम चिह्न, संख्‍या, गणितीय चिह्न आदि नहीं होते थे। ब्रेल को वहीं से यह विचार आया। लुई ने इसी लिपि पर आधारित किन्तु 12 के स्थान पर 6 बिंदुओं के उपयोग से 64 अक्षर और चिह्न वाली एक लिपि बनाई। उसमें न केवल विराम चिह्न बल्कि गणितीय चिह्न और संगीत के नोटेशन भी लिखे जा सकते थे। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि ब्रेल उभरे हुए डॉट (बिंदु) का इस्तेमाल करके लिखी जाती है। आलेख में पहले ही जानकारी दे चुका हूं कि ब्रेल के अनुसार एक अक्षर को एक ‘सेल’ माना जाता है तथा एक सेल में 6 डॉट्स होते हैं और किसी भी तरह के कोई भी अक्षर लिखने के लिए इन्हीं 6 डॉट्स के अलग-अलग पैटर्न का इस्तेमाल किया जाता है। लुईस ब्रेल द्वारा इजाद यह लिपि आज सर्वमान्य है। सन् 1824 में पूर्ण हुई यह लिपि आज दुनिया के लगभग सभी देशों में उपयोग में लाई जाती है। बहरहाल, यहां पाठकों को यह भी जानकारी देना चाहूंगा कि संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 6 नवंबर 2018 को एक प्रस्ताव पारित किया गया था, जिसमें हर साल 4 जनवरी को ब्रेल लिपि के जनक लुई ब्रेल के जन्मदिन को ‘विश्व ब्रेल दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया था, जिसके बाद 4 जनवरी 2019 को पहली बार संपूर्ण विश्व में ‘विश्व ब्रेल दिवस’ मनाया गया। बहरहाल, कहना ग़लत नहीं होगा कि आज दुनिया में दृष्टि हीनता एक बड़ा स्वास्थ्य समस्या है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच ओ) के नवीनतम अनुमान के अनुसार लगभग 2.2 अरब लोग दुनिया भर में किसी न किसी प्रकार की दृष्टि हानि या अंधापन का सामना कर रहे हैं, जिनमें से लगभग 1 अरब मामलों में यह हानि रोकी या सुधारी जा सकती थी, लेकिन अभी तक उसे संबोधित नहीं किया गया है। यहां यदि हम अपने देश भारत की बात करें तो भारत के संदर्भ में भी दृष्टि हानि और अंधापन बड़ी समस्या है।अलग-अलग अध्ययनों के आधार पर अनुमान यह है कि भारत में लगभग 70–74 मिलियन (7–7.4 करोड़) लोग दृष्टि से प्रभावित हैं, जिनमें कई को मध्यम से गंभीर दृष्टि हानि है और लगभग 5 मिलियन (50 लाख) लोग पूर्ण रूप से दृष्टिहीन माने जाते हैं।कुछ अन्य रिपोर्टों में यह भी उल्लेख है कि इतिहास में भारत दुनिया में अंधों की संख्या के हिसाब से सबसे ऊपर है और देश में 20% से अधिक विश्व स्तर पर दृष्टि हानि वाले लोग भारत में रहते हैं। वास्तव में ये सभी आंकड़े यह दिखाते हैं कि दृष्टि हानि और अंधापन न केवल स्वास्थ्य के लिहाज से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक प्रभाव भी बहुत बड़े हैं, और समय रहते उपचार तथा रोकथाम (जैसे मोतियाबिंद का ऑपरेशन, चश्मों का उपयोग और नियमित नेत्र जांच) से कई मामलों में सुधार संभव है। दृष्टिहीन लोगों के लिए ब्रेल लिपि बहुत ही मददगार साबित हुई है। आज विश्व में दृष्टि बाधित लोगों की एक बड़ी संख्या है। जानकारी देना चाहूंगा कि वर्ष 2021 में इंटरनेशनल एजेंसी फॉर द प्रिवेंशन ऑफ ब्लाइंडनेस विजन एटलस नवीनतम नेत्र स्वास्थ्य डेटा का संकलन है। इस रिपोर्ट से यह पता चलता है कि आज के समय में वैश्विक स्तर पर 43 मिलियन लोग अंधेपन के साथ जी रहे हैं और 295 मिलियन लोग मध्यम से गंभीर दृश्य हानि के साथ जी रहे हैं। सच तो यह है कि आज विश्व में नेत्रहीनों की संख्या करोड़ों में पहुंच गई है। कितनी बड़ी बात है कि हर वर्ष इसमें 40 से 50 हजार की संख्या का इजाफा हो जाता है। आंकड़े बताते हैं कि अधिकांश विकासशील देशों में 10% भी नेत्रहीन बच्चे किसी भी प्रकार की शिक्षा प्राप्त नहीं कर रहे हैं। इन्हें शिक्षा प्रदान किया जाना बहुत ही जरूरी है, क्यों कि हम सभी को यह सोचने और समझने की जरूरत है कि नेत्रहीन व्यक्ति समाज की दया का पात्र नहीं है बल्कि आज उन्हें उचित अवसर और सुविधाएं प्रदान करने की आवश्यकता बहुत ही अहम् और महत्वपूर्ण है। हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि नेत्रहीन होने के बावजूद इतिहास में ऐसे अनेक महान पुरुषों और प्रतिभाओं का जिक्र है जिन्होंने न केवल अपनी प्रतिभा को समाज में प्रदर्शित ही किया है बल्कि समय समय पर हमारे समाज का मार्गदर्शन भी किया है। अंत में यही कहूंगा कि, ब्रेल लिपि केवल पढ़ने–लिखने की एक पद्धति नहीं, बल्कि दृष्टिहीन व्यक्तियों के आत्मसम्मान, शिक्षा और आत्मनिर्भरता का सशक्त माध्यम है। छह बिंदुओं पर आधारित यह लिपि बहुत सरल, लेकिन वैज्ञानिक व्यवस्था दुनिया भर के करोड़ों लोगों के लिए ज्ञान, सूचना और अभिव्यक्ति के द्वार खोलती है। लुई ब्रेल ने अत्यंत कम आयु में अपनी दृष्टि खोने के बावजूद जिस संकल्प, संवेदनशीलता और दूरदर्शिता से ब्रेल लिपि का विकास किया, वह मानव इतिहास में करुणा और नवाचार का अनुपम उदाहरण है। उनकी यह देन आज भी यह संदेश देती है कि शारीरिक सीमाएँ व्यक्ति की क्षमता को नहीं, बल्कि समाज की सोच को चुनौती देती हैं। ब्रेल लिपि और लुई ब्रेल का योगदान हमें समावेशी शिक्षा और समान अवसरों की दिशा में निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।