बिहार में किसके सिर सजेगा सीएम का ताज!

Who will wear the CM's crown in Bihar?

प्रमोद कुमार झा

बिहार की राजनीति में ऐतिहासिक मोड़ आया है। भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई (भाजपा) में नई सरकार बनने का रास्ता साफ हो गया है। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर एक बार फिर केंद्रीय राजनीति में पदार्पण करने जा रहे हैं। वर्षों से राज्यसभा सदस्य बनने की तमन्ना पाल रहे कुमार बिहार को भाजपा के हवाले करने जा रहे हैं। उन्होंने इस बात का जिक्र अपनी एक सोशल मीडिया पोस्ट में किया है। वह कहते हैं-‘‘संसदीय जीवन शुरू करने के समय से ही मेरे मन में एक इच्छा थी कि मैं बिहार विधान मंडल के दोनों सदनों के साथ संसद के भी दोनों सदनों का सदस्य बनूँ। इसी क्रम में इस बार हो रहे चुनाव में राज्यसभा का सदस्य बनना चाह रहा हूँ।’’ इसके साथ ही, जेपी आंदोलन से निकले एक ऐसे समाजवादी नेता के शासन का अंत माना जाएगा जो समाजवाद के शोधालय बिहार में सामाजिक न्याय को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं।
प्रदेश में मुख्यमंत्री के रूप में उनके उत्तराधिकारी की खोजबीन शुरू हो गई है। नये चेहरे को लेकर भाजपा की तलाश जारी है और जल्द ही इसका एलान भी हो जाएगा। प्रबल दावेदारों की लंबी फेहरिस्त है। लेकिन मुख्यमंत्री पद के लिए जिस नाम पर मुहर लगेगी वह उसी तरह चौंकाने वाला होगा जिस प्रकार भाजपा ने अध्यक्ष पद के लिए नितिन नवीन के नाम की घोषणा करके पूरे देश को चौंकाया था।

दुनिया के सबसे बड़े राजनीतिक दल, भाजपा की कमान संभालने से पहले उनका नाम देश में पार्टी के ही बहुत सारे नेता व कार्यकर्ता नहीं जानते थे। बहरहाल, बिहार में भाजपा के नेताओं व कार्यकर्ताओं में जबरदस्त उत्साह है क्योंकि दो दशक पुरानी उनकी ख्वाहिश पूरी होने जा रही है। नीतीश कुमार भाजपा के साथ 2005 से (बीच में 2013 से 2017 और 2022 से जनवरी 2024 तक की अवधि को छोड़कचौंकायार जब वह राष्ट्रीय जनता दल के सहयोग से सरकार चला रहे थे) बिहार की सत्ता में काबिज रहे हैं। हालांकि इस दौरान 20 मई 2014 से 22 फरवरी 2015 के दौरान मुख्यमंत्री की कुर्सी पर जीतनराम मांझी थे, लेकिन उनकी सरकार कुमार के समर्थन से चल रही थी।

भाजपा ने 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में 55 और 2010 में 91 सीटें जीती थीं। लेकिन नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाटेड (जदयू) को ज्यादा सीटें आई थीं, इसलिए भाजपा को छोटे भाई की भूमिका में रहकर उप मुख्यमंत्री के पद से ही संतोष करना पड़ा। हालांकि 2020 से नेशनल डेमोके्रटिक अलायंस (एनडीए) में भाजपा को 74 सीटें मिली थीं जबकि जदयू को सिर्फ 43 फिर भी सत्त्ता की कुंजी नीतीश कुमार के पास ही रही। बीते साल 2025 में हुए विधानसभा चुनाव में भी जदयू को जहां 85 सीटें पर जीत मिलीं वहां भाजपा ने 89 सीटों पर अपनी जीत का परचम लहराया। सीटों के लिहाज से बड़े भाई की भूमिका में है, फिर भी मुख्यमंत्री के पद पर नीतीश कुमार ही आसीन रहे। लेकिन अब कुमार द्वारा राज्यसभा चुनाव के लिए पर्चा भरे जाने के बाद बिहार में पहली बार भाजपा की अगुवाई सरकार बनने जा रही है। सूत्र बताते हैं कि भाजपा ने इस बड़े बदलाव की पटकथा बीते साल ही लिखी थी जब 20 नवंबर 2025 को नीतीश कुमार ने 10वीं बार मुख्यमंत्री के रूप पद और गोपनीयता की शपथ ली थी। इस शपथग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मौजूद थे। बिहार में सबसे लंबी अवधि तक मुख्यमंत्री रहने वाले नीतीश कुमार सुशासन बाबू के नाम से चर्चित रहे हैं। कुमार को बिहार में तथाकथित जंगल राज ( पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद और उनकी पत्नी व पूर्व मुख्यमंत्री रावड़ी देवी का कार्यकाल) का अंत करने और का श्रेय दिया जाता है। देश में साफ-सुथवी छवि वाले नेता के रूप में उनकी गिनती होती रही है। उनपर भ्रष्टाचार के कोई आरोप नहीं है। पिछले वित्तीय वर्ष 2024-25 में बिहार की आर्थिक विकास दर 13.1 फीसदी रही है जोकि देश की आर्थिक विकास दर 9.8 से अधिक है। नीतीश कुमार के शासन काल में बिहार ने दोहरे अंकों की आर्थिक विकास दर देखी है। राज्य में इन्फ्रास्ट्रक्टर के क्षेत्र में अभूतपूर्व विकास हुआ है। हालांकि, शराबबंदी के कारण उपजे हालात और हाल के दिनों में आपराधिक घटनाओं में वृद्धि को लेकर नीतीश सरकार को आलोचनाएं भी झेलनी पड़ी हैं। ऐसे में भाजपा को मुख्यमंत्री के रूप में ऐसे चेहरे की तलाश करनी होगी जो नीतीश कुमार की तरह ही बेदाग छवि वाले एवं दूरदर्शी नेता हों और आज जिन वजहों से सरकार के कामकाज पर सवाल उठाए जा रहे हैं उनका समाधान तलाशने में सक्षम हों।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की मौजूदगी में नीतीश कुमार और भाजपाध्यक्ष नितिन नवीन ने 5 मार्च को राज्यसभा चुनाव के लिए अपना-अपना पर्चा दाखिल किया। उनके साथ राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने भी अपना पर्चा दाखिल किया। नीतीश कुमार जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। एक गठबंधन के तीन दलों के राष्ट्रीय अध्यक्षों द्वारा एक साथ राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन पत्र भरना भी एक ऐतिहासिक था। जदयू की ओर से केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर और भाजपा के प्रदेश महामंत्री शिवेश कुमार ने भी अपना नामांकन पत्र दाखिल किया। बिहार विधानसभा में एनडीए के 202 विधायक हैं। राज्यसभा की एक सीट के लिए 41 विधायकों के मतों की जरूरत होगी। ऐसे में चार सीटें एनडीए की झोली में जाना तय है। बाकी एक सीट पर भी विपक्ष के मुकाबले एनडीए का ही पलड़ा भारी माना जा रहा है।

बहरहाल सबकी बिहार में सत्तारुढ़ गठबंधन के बीच बनने वाले समीकरण पर जिसके जरिये नई सरकार के मुखिया का चयन और सरकार का गठन होगा। नीतीश कुमार ने विकसित बिहार बनाने का अपना संकल्प दोहराया है। उन्होंने कहा है कि बनने वाली नई सरकार को उनका पूरा सहयोग एवं मार्गदर्शन रहेगा। इससे साफ है कि भाजपा मुख्यमंत्री के चयन पर भी कुमार की राय ले सकती है। अगर, ऐसा होता है तो चेहरा चाहे जो भी हो लेकिन वह अति पिछड़ा वर्ग से हो सकता है। संभव है कि वह भाजपा को दिल्ली की तरह बिहार में भी मुख्यमंत्री पद के लिए किसी महिला का चयन करने की सलाह दें। बताते चलें कि बिहार की पहली और एकमात्र महिला मुख्यमंत्री रावड़ी देवी रही हैं जिनका कार्यकाल 25 जुलाई 1997 से 11 फरवरी 1999 और 11 मार्च 2000 से लेकर 6 मार्च तक 2005 था। हालांकि, मुख्यमंत्री की दौड़ में जिनको शामिल बताया जा रहा है उनमें सबसे आगे उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सबसे आगे हैं। कुशवाहा समाज से आने वाले सम्राट चौधरी बिहार में भाजपा के मजबूत नेता हैं। सरकार और संगठन दोनों पर उनकी पकड़ है। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय भी मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार बताये जा रहे हैं। वह भी ओबीसी समाज से आते हैं और बिहार के साथ-साथ केंद्र की राजनीति में भी सक्रिय रहते हैं। भाजपा अगर वैश्य समाज का समीकरण साधने की कोशिश करेगी तो पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल का नाम सबसे पहले आएगा। वह भी ओबीसी समुदाय से आते हैं। उधर, पटना की दीघा विधानसभा सीट से विधायक संजीव चैरसिया के नाम पर भी चर्चा चल रही है। वह भी ओबीसी समाज से आते हैं। भाजपा में विगत में मुख्यमंत्री के चयन की जो परंपरा है उससे तो यही लगता है कि कोई ऐसा भी नाम सामने आ जाए जो चर्चा में नहीं है। बिहार में किसके सिर सजेगा मुख्यमंत्री का ताज? इसका बहरहाल रहेगा इंतजार।