कानूनी सुधारों के बावजूद क्यों नहीं थमती हिंसा?

Why does violence not stop despite legal reforms?

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

हर घंटे 51 महिलाएँ हिंसा का शिकार होती हैं। यह वाक्य किसी रिपोर्ट की पंक्ति भर नहीं, बल्कि समकालीन समाज के अंतर्मन से उठती पीड़ा की गूंज है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की 2023 की रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं के खिलाफ लगभग 4.48 लाख मामले दर्ज हुए, यानी प्रतिदिन औसतन 1,227 एफआईआर। ये आंकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि हिंसा अपवाद नहीं, बल्कि एक भयावह सामान्यता बन चुकी है। घर की चारदीवारी, सड़कें, कार्यस्थल और अब डिजिटल दुनिया—कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं रहा, और यही इस संकट की गंभीरता को और गहरा करता है।

हिंसा से भी अधिक चिंताजनक स्थिति तब बनती है, जब पीड़िता न्याय की चौखट पर पहुँचकर भी निराश लौटती है। बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में दोषसिद्धि दर मात्र 22-28 प्रतिशत के आसपास रहना न्याय व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करता है। एसिड अटैक जैसे अपराधों में दोषसिद्धि दर अत्यंत कम (कई वर्षों में 5-10 प्रतिशत से भी नीचे) है, जहाँ पीड़िता आजीवन शारीरिक और मानसिक पीड़ा झेलती है, जबकि अपराधी अक्सर कानून की खामियों का लाभ उठाकर बच निकलते हैं। यह स्थिति कानून के भय को कम और अपराधियों के हौसले को अधिक मजबूत करती है।

कम दोषसिद्धि दर के मूल में जांच और न्यायिक प्रक्रिया की खामियाँ गहराई से जुड़ी हैं। एफआईआर दर्ज करने में देरी, पुलिस की लापरवाही, वैज्ञानिक ढंग से सबूत न जुटा पाना और वर्षों तक लंबित रहने वाले मुकदमे न्याय को कमजोर बनाते हैं। गवाहों पर सामाजिक दबाव और डर उनकी गवाही को प्रभावित करता है, जिससे अभियोजन पक्ष कमजोर पड़ जाता है। कई मामलों में पीड़िता को ही संदेह की नजर से देखा जाता है, जिससे उसका आत्मविश्वास टूटता है और वह न्याय की प्रक्रिया से दूर हो जाती है।

यह समस्या तब और विकराल हो जाती है जब इसमें जाति और वर्ग का आयाम जुड़ जाता है। दलित और आदिवासी महिलाओं के मामलों में दोषसिद्धि दर काफी कम (30-35 प्रतिशत के आसपास या उससे नीचे) रह जाना इस बात का संकेत है कि सामाजिक भेदभाव न्याय व्यवस्था के भीतर तक पैठ बना चुका है। कानून भले ही समान हो, लेकिन उसका क्रियान्वयन समान नहीं है। पीड़िताओं की सामाजिक स्थिति, आर्थिक निर्भरता और सीमित संसाधन उन्हें लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने से रोकते हैं, जिससे अपराधियों को एक प्रकार की सामाजिक सुरक्षा मिल जाती है।

घरेलू हिंसा महिलाओं के खिलाफ हिंसा का सबसे व्यापक और मौन रूप है। एनसीआरबी 2023 के अनुसार, पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के मामले कुल अपराधों का लगभग 30 प्रतिशत हैं। विडंबना यह है कि जिस घर को सुरक्षा का स्थान माना जाता है, वही कई महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित बन जाता है। घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 ने कानूनी संरक्षण का वादा किया था, परंतु इसके कमजोर क्रियान्वयन ने अपराधियों के भीतर भय पैदा नहीं किया। परिणामस्वरूप पीड़िताएँ चुप्पी में जीने को मजबूर रहती हैं।

इक्कीसवीं सदी में हिंसा का स्वरूप बदल रहा है और साइबर हिंसा एक नई चुनौती बनकर उभरी है। डीपफेक वीडियो, ऑनलाइन उत्पीड़न और रिवेंज पॉर्न महिलाओं की गरिमा और निजता पर सीधा हमला करते हैं। डिजिटल दुनिया में होने वाली हिंसा का प्रभाव वास्तविक जीवन में भी गहरा होता है, लेकिन कानून और जांच एजेंसियाँ अभी इस चुनौती से पूरी तरह निपटने के लिए तैयार नहीं हैं। तकनीकी साक्ष्यों की समझ और त्वरित कार्रवाई के अभाव में अपराधी अक्सर बच निकलते हैं।

निर्भया कांड के बाद 2013 में किए गए आपराधिक कानून संशोधन ने समाज में उम्मीद जगाई थी। बलात्कार की परिभाषा का विस्तार हुआ, सख्त सजाओं का प्रावधान किया गया और फास्ट-ट्रैक अदालतों की स्थापना हुई। इसके बाद वन-स्टॉप सेंटर, महिला हेल्पलाइन और निर्भया फंड जैसे कदम उठाए गए। 2024 में लागू भारतीय न्याय संहिता ने डिजिटल सबूतों और कड़ी सजा पर जोर दिया, लेकिन जमीनी स्तर पर इन सुधारों का प्रभाव अपेक्षित गति से नहीं दिख पाया है।

दोषसिद्धि दर बढ़ाने के लिए सबसे पहले जांच की गुणवत्ता में सुधार अनिवार्य है। फोरेंसिक प्रयोगशालाओं का विस्तार, आधुनिक तकनीक का उपयोग और पुलिस बल की जेंडर संवेदीकरण ट्रेनिंग इस दिशा में निर्णायक कदम हो सकते हैं। गवाह संरक्षण कार्यक्रम को प्रभावी बनाकर उन्हें भयमुक्त वातावरण देना आवश्यक है। विशेष अभियोजकों की नियुक्ति और न्यायाधीशों के नियमित प्रशिक्षण से न्यायिक प्रक्रिया अधिक निष्पक्ष और संवेदनशील बन सकती है, जिससे पीड़िताओं का भरोसा लौटेगा।

कानूनी सुधार तब तक अधूरे हैं, जब तक समाज की मानसिकता नहीं बदलती। स्कूलों से लेकर कार्यस्थलों तक लिंग समानता और संवेदनशीलता की शिक्षा अनिवार्य की जानी चाहिए। पितृसत्तात्मक सोच को चुनौती देने वाली व्यापक सामाजिक मुहिम की आवश्यकता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर महिलाओं के खिलाफ नफरत और हिंसा फैलाने वालों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण उन्हें हिंसा से बाहर निकलने का साहस देता है, इसलिए यह भी एक महत्वपूर्ण सामाजिक उपाय है।

कुछ राज्यों में बेहतर फोरेंसिक उपयोग और त्वरित जांच से दोषसिद्धि दर 40 प्रतिशत तक पहुँचना यह सिद्ध करता है कि सुधार संभव है। इन सफल मॉडलों को राष्ट्रीय स्तर पर अपनाने की आवश्यकता है। निर्भया फंड का पूर्ण उपयोग, प्रभावी वन-स्टॉप सेंटर और साइबर हिंसा के लिए अलग कानून समय की मांग हैं। अंततः महिलाओं के खिलाफ हिंसा रोकना और दोषसिद्धि दर बढ़ाना केवल कानून का नहीं, बल्कि पूरे समाज के सामूहिक संकल्प का प्रश्न है। जब तक अपराधियों को त्वरित और कठोर दंड नहीं मिलेगा, तब तक एक सुरक्षित और समान भारत का सपना अधूरा रहेगा।