सुनील कुमार महला
इन दिनों राजस्थान में खेजड़ी बचाओ जन-आंदोलन खास चर्चा में है। दरअसल, खेजड़ी बचाओ जन-आंदोलन राजस्थान के राज्य वृक्ष ‘खेजड़ी’ के संरक्षण के लिए चलाया जा रहा एक जन-आंदोलन है। वास्तव में यह आंदोलन सोलर कंपनियों द्वारा पेड़ों की कटाई के कारण चर्चा में आया। आंदोलनकारियों का आरोप है कि राजस्थान के बीकानेर और आसपास के इलाकों में सोलर पावर प्रोजेक्ट्स स्थापित करने के लिए कंपनियां बड़े पैमाने पर खेजड़ी के पेड़ों की कटाई कर रही हैं। यह भी आरोप लगाया गया कि पकड़े जाने के डर से पेड़ों को रात के अंधेरे में काटकर जमीन में दबा दिया जाता है।
आंदोलनकारियों की मुख्य मांगें स्पष्ट हैं। वे पूरे राजस्थान में खेजड़ी की कटाई पर पूर्ण प्रतिबंध चाहते हैं। इसके साथ ही राज्य में एक प्रभावी ‘ट्री प्रोटेक्शन एक्ट’ लागू करने की मांग की जा रही है, जिसमें अवैध कटाई पर भारी जुर्माने (₹1 लाख तक) और जेल की सजा का प्रावधान हो। आंदोलनकारियों का यह भी कहना है कि सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए ऐसी जमीनों का ही आवंटन किया जाए, जहां पहले से हरे-भरे पेड़ मौजूद न हों।
यहां पाठकों को बताना जरूरी है कि इस आंदोलन की मुख्य और प्रभावी शुरुआत हाल ही में 2 फरवरी 2026 को राजस्थान के बीकानेर जिले से हुई। हालांकि बीकानेर कलेक्ट्रेट और करणीसर भाटियान क्षेत्र में पिछले लगभग एक महीने से शांतिपूर्ण धरने और प्रदर्शन चल रहे थे, लेकिन फरवरी 2026 के पहले सप्ताह में इसे ‘महा-आंदोलन’ का रूप मिला।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार 2 फरवरी 2026 को बीकानेर के पॉलिटेक्निक कॉलेज मैदान में हजारों पर्यावरण प्रेमियों, संतों और बिश्नोई समाज के लोगों का विशाल ‘महापड़ाव’ शुरू हुआ। इस दिन बीकानेर के बाजार पूरी तरह बंद रहे और स्कूलों में अवकाश घोषित किया गया। इसके अगले दिन, 3 फरवरी 2026 को, कलेक्ट्रेट के सामने 363 संतों और पर्यावरण प्रेमियों ने आंखों पर पट्टी बांधकर ‘आमरण अनशन’ प्रारंभ किया। यह संख्या ऐतिहासिक खेजड़ली बलिदान की स्मृति में प्रतीकात्मक रूप से चुनी गई थी।
मीडिया में उपलब्ध जानकारी के अनुसार 5 और 6 फरवरी 2026 को आंदोलन के बढ़ते दबाव के बीच राज्य के उद्योग मंत्री के.के. बिश्नोई धरना स्थल पर पहुंचे। सरकार की ओर से जोधपुर और बीकानेर संभाग में खेजड़ी की कटाई पर तत्काल लिखित प्रतिबंध लगाने तथा विधानसभा में सख्त ‘ट्री प्रोटेक्शन एक्ट’ लाने के आश्वासन के बाद आमरण अनशन समाप्त किया गया।
यह भी उल्लेखनीय है कि इस जन-आंदोलन का मुख्य केंद्र बीकानेर रहा, लेकिन इसकी गूंज पूरे पश्चिमी राजस्थान(जोधपुर, जैसलमेर और बाड़मेर) में विशेष रूप से सुनाई दी। इस आंदोलन में न केवल राजस्थान, बल्कि हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश से भी बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। आंदोलन को पूर्व मुख्यमंत्रियों वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत तथा हनुमान बेनीवाल जैसे प्रमुख नेताओं का भी समर्थन मिला, जिससे यह आंदोलन एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनकर उभरा।
फिलहाल आमरण अनशन समाप्त हो चुका है, लेकिन आंदोलनकारियों ने साफ चेतावनी दी है कि जब तक विधानसभा में कानून पारित नहीं हो जाता, तब तक उनका प्रतीकात्मक धरना यानी ‘महापड़ाव’ जारी रहेगा। उनकी मांग है कि खेजड़ी कटाई पर लगाया गया प्रतिबंध पूरे राजस्थान में प्रभावी रूप से लागू किया जाए।
यहां पाठकों को यह भी बताना आवश्यक है कि खेजड़ी संरक्षण का इतिहास राजस्थान की मिट्टी में गहराई से जुड़ा हुआ है। अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में वर्ष 1730 ईस्वी में 363 लोगों ने हरे पेड़ों को बचाने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे। इन बलिदानियों में 69 महिलाएं और 294 पुरुष शामिल थे। खेजड़ली (जोधपुर) का यह बलिदान, वर्ष 1730 ईस्वी (विक्रम संवत 1787) में घटित, विश्व इतिहास की सबसे महान पर्यावरण संरक्षण घटनाओं में गिना जाता है। यह पेड़ों की रक्षा के लिए दिया गया पहला और सबसे बड़ा सामूहिक बलिदान माना जाता है।
इतिहास बताता है कि जोधपुर के तत्कालीन महाराजा अभय सिंह को अपने नए महल के निर्माण हेतु चूना पकाने के लिए बड़ी मात्रा में लकड़ी की आवश्यकता थी। इसके लिए उनके कारिंदे गिरधारी दास सैनिकों के साथ खेजड़ली गांव पहुंचे और खेजड़ी के हरे पेड़ों को काटने लगे। इसका अमृता देवी बिश्नोई ने कड़ा विरोध किया। उन्होंने सैनिकों को चुनौती देते हुए ऐतिहासिक नारा दिया-‘सिर साठे रूंख रहे, तो भी सस्तो जाण।’ अर्थात यदि सिर कटने के बाद भी एक पेड़ बचता है, तो यह सौदा भी सस्ता ही समझा जाना चाहिए।
पेड़ों को बचाने के लिए अमृता देवी सबसे पहले खेजड़ी के पेड़ से लिपट गईं। सैनिकों ने पेड़ के साथ उन्हें भी काट दिया। उनके बाद उनकी तीन बेटियां-आसू, रत्नी और भागू-और फिर उनके पति ने भी अपने प्राणों की आहुति दी। यह दृश्य देखकर पूरे गांव और आसपास के 84 गांवों के लोग उमड़ पड़े और एक-एक करके पेड़ों से लिपटते चले गए।
जब महाराजा अभय सिंह को इस भीषण नरसंहार की जानकारी मिली, तो उन्होंने तुरंत पेड़ों की कटाई रुकवाई और भविष्य के लिए एक ताम्रपत्र यानी राजकीय आदेश जारी किया, जिसमें बिश्नोई बहुल क्षेत्रों में कभी भी हरे पेड़ न काटे जाने का निर्देश दिया गया।
यह भी उल्लेखनीय है कि आधुनिक काल का ‘चिपको आंदोलन’, जिसके प्रणेता सुंदरलाल बहुगुणा थे, इसी खेजड़ली बलिदान से प्रेरित माना जाता है। भारत सरकार और राजस्थान सरकार पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वालों को अमृता देवी के नाम पर ‘अमृता देवी वन्य जीव पुरस्कार’ (राष्ट्रीय पुरस्कार) भी प्रदान करती हैं। खेजड़ली गांव में आज भी एक भव्य शहीद स्मारक स्थित है, जहां हर वर्ष भाद्रपद शुक्ल दशमी को विश्व का एकमात्र ‘वृक्ष मेला’ आयोजित किया जाता है।
अंत में यह कहना उचित होगा कि खेजड़ी का केवल पर्यावरणीय ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व भी है। यह आंदोलन केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि राजस्थान की संस्कृति और आस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है। खेजड़ी राजस्थान का राज्य वृक्ष है, जिसका वैज्ञानिक नाम ‘प्रोसोपिस सिनेरेरिया’ है। इसे ‘रेगिस्तान का कल्पवृक्ष’ कहा जाता है और यह थार मरुस्थल की पारिस्थितिकी की रीढ़ की हड्डी मानी जाती है।
गौरतलब है कि राजस्थान सरकार ने 31 अक्टूबर 1983 को खेजड़ी को राज्य वृक्ष घोषित किया था। इसका उद्देश्य थार मरुस्थल के पारिस्थितिकी तंत्र में इसके महत्व को देखते हुए इसके संरक्षण को बढ़ावा देना था।
यदि हम खेजड़ी वृक्षों से जुड़े आंकड़ों की बात करें, तो सरकार या किसी अन्य विश्वसनीय स्रोत द्वारा राज्य में खेजड़ी के कुल वृक्षों की वर्तमान आधिकारिक संख्या का कोई विस्तृत और ताजा डेटा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। हालांकि कुछ हालिया रिपोर्टों और विधायकों के बयानों से इसकी स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार राजस्थान विधानसभा में एक स्थानीय विधायक ने यह बयान दिया कि पश्चिमी राजस्थान में पिछले 15 वर्षों में लगभग 26 लाख से अधिक खेजड़ी के पेड़ काटे जा चुके हैं और भविष्य में करीब 50 लाख खेजड़ी पेड़ों की कटाई की तैयारी बताई जा रही है। ये आंकड़े इस बात का संकेत देते हैं कि हजारों से लाखों की संख्या में खेजड़ी वृक्ष अभी भी मौजूद हैं, लेकिन उनका अस्तित्व गंभीर खतरे में है।
हालांकि, यहां राहत की बात यह है कि खेजड़ी संरक्षण के प्रयास भी जारी हैं। इसी क्रम में पाठकों को जानकारी देना आवश्यक है कि एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक समाचार पत्र के अनुसार राज्य में सोलर ऊर्जा और पर्यावरण संरक्षण के संतुलन को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2028 तक 10 लाख (एक मिलियन) नए खेजड़ी वृक्ष लगाने का लक्ष्य घोषित किया गया है। इसका उद्देश्य राज्य में खेजड़ी की कुल संख्या बढ़ाना है।
आज भी पश्चिमी राजस्थान में लाखों खेजड़ी के पेड़ मौजूद हैं, लेकिन बड़ी संख्या में इन्हें काटा जा चुका है और भविष्य में कटाई की आशंका भी बनी हुई है। वास्तव में खेजड़ी बचाओ आंदोलन राजस्थान में खेजड़ी वृक्ष के संरक्षण के लिए चल रहा एक पर्यावरणीय और सामाजिक आंदोलन है। इसका मूल कारण खेजड़ी की अंधाधुंध कटाई और उससे हो रहे पर्यावरणीय नुकसान के खिलाफ जन-आक्रोश है। आंदोलनकारियों की प्रमुख मांग कानूनी सुरक्षा और प्रभावी रोक की है। सामाजिक और राजनीतिक समर्थन, आमरण अनशन तथा सरकार की ओर से दिए गए आश्वासनों के कारण यह आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में बना हुआ है।
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि खेजड़ी केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि मरुस्थल की जीवनरेखा है। इसका संरक्षण आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए अनिवार्य है। वास्तव में खेजड़ी ही नहीं, सभी वृक्षों का संरक्षण संभव है और इसमें असंभव कुछ भी नहीं है। इसके लिए सबसे पहले अंधाधुंध कटाई पर सख्त रोक लगाना आवश्यक है। खाली पड़ी सरकारी भूमि, खेतों की मेड़ों और सड़कों के किनारे बड़े पैमाने पर खेजड़ी के नए पौधे लगाने का अभियान चलाया जाना चाहिए। नए पौधों के रोपण को प्राथमिकता देनी होगी। इसके साथ ही स्कूलों, कॉलेजों और ग्रामीण क्षेत्रों में खेजड़ी संरक्षण के लिए व्यापक जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है। खेजड़ी को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों, जैसे ‘ग्लोबोटर्म्स’ (दीमक), और विभिन्न रोगों से बचाने के लिए कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार उचित जैविक उपचार किए जाने चाहिए। खेजड़ली बलिदान से प्रेरणा लेकर समुदाय को संगठित करना और संरक्षण के प्रयासों को बिश्नोई पंथ जैसी परंपराओं से जोड़ना भी अत्यंत आवश्यक है। इसके अतिरिक्त पशु चराई पर नियंत्रण जरूरी है। खेजड़ी की वृद्धि दर बढ़ाने और इसे जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बचाने के लिए उन्नत बीजों और आधुनिक तकनीकों पर शोध किया जाना चाहिए। खेजड़ी के आसपास जल संचयन की पारंपरिक विधियों, जैसे टांका और खडीन, को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि सूखे के समय भी इन पेड़ों को पर्याप्त नमी मिल सके।अति-दोहन पर रोक लगाने के साथ-साथ खेजड़ी संरक्षण के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले व्यक्तियों और पंचायतों को पुरस्कार और आर्थिक सहायता प्रदान की जानी चाहिए। यदि हम पर्यावरण संरक्षण और पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा के प्रति सचेत और जागरूक रहेंगे, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि हम वृक्षों को बचाने में सफल हो सकते हैं।





