क्या महाराष्ट्र निकाय चुनावों से उद्धव, पवार फैमिली व कांग्रेस कोई सीख लेंगे

Will Uddhav, Pawar family and Congress learn anything from the Maharashtra civic elections?

अशोक भाटिया

महाराष्ट्र में 29 नगर निगम पर चुनाव के नतीजे आ गए। भाजपा -शिवसेना (शिंदे गुट) को प्रचंड जीत मिली है। गठबंधन ने 29 में से 25 नगर निगम पर जीत हासिल की है। भाजपा गठबंधन की प्रचंड लहर के सामने न तो ठाकरे ब्रदर्स (उद्धव-राज) की जोड़ी का जादू चला, न ही पवार परिवार का पावर दिखा। उद्धव का साथ छूटने के बाद कांग्रेस ने चुनाव तो लड़ा, लेकिन गलतियों से सीख लेती नजर नहीं आई।

बहरहाल निकाय चुनाव के नतीजों ने महाराष्ट्र की राजनीति की दशा और दिशा पूरी तरह बदल दी है। बीएमसी मेंभाजपा और शिंदे की महायुति ने बहुमत का जादुई आंकड़ा पार कर लिया है। पिछले तीन दशकों से बीएमसी की सत्ता पर काबिज ठाकरे परिवार का वर्चस्व अब खत्म हो गया है। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की जोड़ी भीभाजपा लहर को रोकने में नाकाम रही।

इन चुनावों मेंभाजपा मुंबई में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। सीएम देवेंद्र फणवीस की रणनीति ने विपक्षी गठबंधन के हर दांव को पूरी तरह फेल कर दिया है। पवार परिवार भी पस्त नजर आया। यह जीत न केवल मुंबई बल्कि पूरे महाराष्ट्र मेंभाजपा के बढ़ते दबदबे का स्पष्ट संकेत है। मुंबई ही नहीं बल्कि महाराष्ट्र की 29 नगर निगम में से 23 मेंभाजपा गठबंधन अपना कब्जा जमाने में कामयाब रही।

पिछले 30 सालों से बीएमसी पर शिवसेना का एकछत्र राज था, लेकिन इस बार मुंबईकरों ने बदलाव के पक्ष में वोट दिया है। हालांकि, 20 साल के बाद उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे आपसी गिला-शिकवा भुलाकर एक साथ नगर निगम चुनाव लड़ने का फैसला किया ताकि सियासी वर्चस्व को बचाए रखा जा सके। इसके बावजूद वे अपना गढ़ नहीं बचा पाए। उनका ‘मराठी अस्मिता’ का मुद्दा काम नहीं कर पाया।ठाकरे ब्रदर्स ने आक्रमक तरीके से मराठी मानुष का मुद्दा उठाया, मराठी भाषा और मराठी पहचान की राजनीति को भुनाने की कोशिश की। इस तरह दोनों भाइयों ने कॉमन ग्राउंड पर काफी मशकक्त किया, लेकिनभाजपा और शिंदे की जोड़ी के सामने टिक नहीं सके। मुंबई की जनता ने अब नए नेतृत्व पर अपना भरोसा जताया है। इस तरह ठाकरे ब्रदर्स महाराष्ट्र निकाय चुनाव में पूरी तरह फेल रहे – ना ही मुंबई, ना ही ठाणे, ना ही पुणे-नासिक में कोई करिश्मा दिखा सके।

गौरतलब है कि बालासाहेब ठाकरे की विरासत को लेकर दोनों भाई अलग राह पर रहे, लेकिन पार्टी टूटने, शिवसेना नाम और चिन्ह जाने के बाद उद्धव के लिए भावनात्मक सहारा और राजनीतिक मजबूती दोनों का साथ आए। ठाकरे ब्रदर्स का राजनीतिक मिलन राज्य की सबसे बड़ी हेडलाइन बनी। उनके समर्थकों को यह उम्मीद थी कि ठाकरे ब्रांड की मुंबई की राजनीति में वापसी होगी।

ऐसा लग रहा था कि ठाकरे ब्रदर्स की जोड़ी बीजेपी- एकनाथ शिंदे (शिवसेना) गुट को बीएमसी चुनाव में कड़ी चुनौती देगा। लेकिन चुनाव नतीजों ने साफ कर दिया कि ठाकरे बंधुओं की जोड़ी जनता को भरोसे में नहीं ले सकी, यानी यह प्रयोग राजनीतिक तौर पर असफल रहा। राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे के भाषण मंच से तो गूंजे लेकिन मतदान केंद्रों तक असर नहीं छोड़ सके।ठाकरे ब्रदर्स की भावनात्मक अपील के साथ-साथ मशीनरी और वार्ड के बूथ स्तर पर मैनेजमेंट पर जोर देना चाहिए था। इस मोर्चे पर वे पीछे रह गए। राज ठाकरे की राजनीति लंबे समय तक मराठी अस्मिता, भाषा विवाद और सांस्कृतिक मुद्दों पर केंद्रित रही है। वहीं उद्धव ठाकरे पिछले कुछ सालों में खुद को मध्यमार्गी और विकासवादी नेता के तौर पर पेश कर रहे थे। राज ठाकरे के ये मुद्दे बड़े चुनावों में भी अपनी साख खो चुके हैं तो बीएमसी के चुनाव में तो असली मुद्दे पानी, सड़क, अस्पताल, स्कूल, ट्रैफिक, ड्रेनेज, बिजली- मुंबई की रोजमर्रा की जिंदगी की समस्याएं होती हैं।

वहीं,भाजपा ने अपनी सोशल इंजीनियरिंग और शिंदे के साथ सियासी केमिस्ट्री को बनाए रखा। भावनात्मक राजनीति काम नहीं करती बल्कि लोग आपके परफॉर्मेंस और भरोसेमंद नेतृत्व की उम्मीद में वोट डालते हैं।भाजपा और शिंदे गुट ने इन्हीं मुद्दों पर फोकस किया। ठाकरे गठबंधन ने भी इन मुद्दों पर बात की पर उनका नैरेटिव ज्यादातर पहचान और भावनाओं के आसपास घूमता रहा। ठाकरे बंधुओं के दांव कोभाजपा और शिंदे ने मराठी अस्मिता पर केंद्रित नहीं रहने दिया। इस तरह उनकी सारी कोशिश फेल रहीं।

महाराष्ट्र के निगम चुनाव के बीच उद्धव और राज ठाकरे से एक साथ आए तो पवार परिवार भी एकजुट हुआ। शरद पवार ने अपने भतीजे अजित पवार के साथ गठबंधन कर पुणे और पिंपरी-चिंचवड नगर निगम का चुनाव लड़े, ये दोनों ही इलाके एनसीपी के मजबूत गढ़ हुआ करते थे। इसके बाद भी एक भी महानगरपालिका पर विजय हासिल नहीं कर पाए।पुणे और पिंपरी चिंचवड में पवार परिवार ने पूरी ताकत झोंक दी थी। सुप्रिया सुले और अजित पवार एक मंच पर आए थे। शरद पवार गुट के विधायक रोहित पवार ने भी पुणे और पिंपरी चिंचवड में खूब चुनाव प्रचार किया, लेकिन चुनाव नतीजों में दोनों स्थानों परभाजपा सत्ता हासिल करने में सफल रही। पुणे मेंभाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है तो वहीं दूसरी तरफ एनसीपी का प्रदर्शन काफी कमजोर रहा है।

बीजेपी की मजबूत घेराबंदी को दादा अजित पवार नहीं तोड़ पाए। पुणे और पिंपरी चिंचवड में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के कमांडर के तौर पर केंद्रीय राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोल ने कमान संभाली थी। मोहोल से अजित पवार का टकराव सामने आया था। अजित पवार की पुणे में कारारी शिकस्त इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि वह यहां के प्रभारी मंत्री हैं। एनसीपी के दोनों धड़ों में गठबंधन के बाद चर्चा छिड़ गई थी क्या आगे दोनों पार्टियां एक हो जाएंगी? लेकिन नतीजों ने अजित पवार को ही नहीं बल्कि शरद पवार को भी बड़ा शॉक दे दिया है।पुणे में भाजपा ने 96 सीट जीतीं, जबकि एनसीपी को 20 सीट और एनसीपी (एसपी) को सिर्फ तीन सीट ही मिल सकीं। पिंपरी चिंचवड मेंभाजपा ने 84 सीट जीतीं, जबकि एनसीपी दूसरे स्थान पर रही और उसे 37 सीटें ही मिलीं। शरद पवार की पार्टी का खाता तक नहीं खुल सका। भाजपा की मजबूत व्यूहरचना को अजित पवार नहीं तोड़ पाए। पश्चिम महाराष्ट्र के इस क्षेत्र में पवार परिवार का गढ़ बारामती है, जिसका सर्वाधिक प्रभाव पुणे और पिंपरी चिंचवड में माना जाता है। एनसीपी पहले दोनों जगह सत्ता में रह चुके है, लेकिनभाजपा के पस्त हो गई।

फ़िलहाल ठाकरे ब्रदर्स और पवार परिवार की महाराष्ट्र में हार देश के सियासी परिवारों के लिए एक सबक है। बिहार चुनाव में पहले ही लालू यादव की विरासत संभाल रहे तेजस्वी यादवभाजपा के मात खा चुके हैं, लेकिन ये सबक अखिलेश यादव से लेकर एमके स्टालिन और अभिषेक बनर्जी के लिए किसी सबक से कम नहीं है।विरासत की सियासत और भवानात्मक राजनीति के जरिए लंबी सियासी पारी नहीं खेली जा सकती है।भाजपा से मुकाबला करना आसान नहीं है। करीब आठ साल तक कांग्रेस मुक्त भारत अभियान चलाने के बादभाजपा ने अपनी सियासी रणनीति में बदलाव किया। क्षेत्रीय दलों के सियासी किले को ध्वस्त करने की रणनीति बनाई, जिनकी कमान ऐसे नेताओं के हाथों में है, जिन्हें राजनीति विरासत में मिली है।एक बात तो स्वीकार करना पड़ेगी कि परिवारवाद के खिलाफ देश में माहौल बन गया है।भाजपा जिस तरह से परिवारवाद को मुख्य राजनीतिक विमर्श के रूप में स्थापित करने में कामयाब रही है, उसके चलते विरासत में सियासत संभालने वाले नेताओं के लिए सियासी चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि परिवारवादी पार्टियों के नेताओं का रवैया और रहन-सहन दूसरी पीढ़ी आते-आते लोगों को खटकने लगता है। बात इतनी ही होती तो शायद गनीमत होती, लेकिन मामला उससे आगे चला गया है। पीएम मोदी और भाजपा भी परिवारवाद के खिलाफ मुखर है। मोदी की परिवारवाद विरोधी मुहिम में कई और मुद्दे समाहित हैं। ऐसे में राजनीतिक परिवार भावनात्मक मुद्दे के दम पर सियासी नहीं खींच सकते।बीजेपी ने महाराष्ट्र में दो परिवारवादी पार्टियों को पटखनी देने में सफलता मिली है। महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी, दोनों को गहरा राजनीतिक आघात लगा है। इनके लिए इससे संभलना बहुत कठिन है, खासतौर से उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) के लिए। ऐसे ही पवार परिवार का पस्त होना बड़ा सियासी संदेश है।भाजपा का अगला टारगेट पश्चिम बंगाल है, जहां ममता बनर्जी के सियासी वारिस के तौर पर अभिषेक बनर्जी उभरे हैं।भाजपा के निशाने पर अभिषेक बनर्जी हैं और उन्हें केंद्रित कर बंगाल को फतह करने की रणनीति बना रही है।

परिवारवाद से जनता का मोहभंग हो रहा है। जनता अब तंग आ चुकी है। जनता को जिन्हे विरासत में कुर्सी मिली हो, वे जनता का दुखदर्द व स्थानीय मुद्दों को कैसे समझेंगे। एसी में बैठकर जनता की समस्याओं को नहीं समझा जा सकता है। न ही वहां से इसका निदान किया जा सकता है। इसके लिए जनता के बीच रहना होगा। जनता की नब्ज के लिहाज से अपनी राजनीतिक लकीर खींचनी होगी, उसके बाद भीभाजपा से मुकाबला कर सकते हैं।