आज़ाद भारत के इतिहास में चुनाव आयोग का निकृष्टतम दौर

The Election Commission's worst phase in the history of independent India

निर्मल रानी

1990-1996 के दौर में भारत के 10 वें मुख्य चुनाव आयुक्त थे टी. एन. शेषन। इनकी छवि भारतीय इतिहास में एक निडर, कड़क और क्रांतिकारी सुधारक की थी। शेषन ने भारतीय चुनाव प्रणाली की पूरी सूरत बदल दी और राजनेताओं के मन में कानून का खौफ पैदा किया। उनके दौर में एक कहावत प्रचलित थी कि “नेता केवल दो ही लोगों से डरते हैं। एक तो ईश्वर से दूसरे टी.एन. शेषन से ।” शेषन ने संविधान के अनुच्छेद 324 की ताक़त को पहचाना और साबित किया कि चुनाव आयोग भारत सरकार का नहीं, बल्कि भारत का होता है। उन्होंने आयोग को एक पूर्णतः स्वतंत्र और शक्तिशाली स्वायत्त निकाय बनाया और ‘आदर्श आचार संहिता’ को कड़ाई से लागू कराते हुये कई प्रभावशाली मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों तक के प्रचार पर रोक लगा दी और कड़े दंड दिए। शेषन ने बूथ कैप्चरिंग , जाली वोटिंग, दीवारों पर जबरन पोस्टर चिपकाना और लाउडस्पीकरों का बेधड़क इस्तेमाल आदि पर सख्ती से प्रतिबंध लगाया। उन्होंने चुनाव प्रचार के खर्च की सीमा तय की और उसका हिसाब मांगना शुरू किया। शेषन ने ही चुनावों में सरकारी गाड़ियों, बंगलों और मशीनरी के दुरुपयोग पर पूरी तरह रोक लगाई। वे किसी भी राजनीतिक दबाव के आगे नहीं झुके। और चुनावी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ उनके इसी महाअभियान के लिए उन्हें 1996 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

परन्तु दुःखद है कि वही चुनाव आयोग आज के दौर का सबसे निकृष्ट,भ्रष्ट और सत्ता के चापलूस व कठपुतली आयोग के रूप में देश व दुनिया में अपनी पहचान बना चुका है। ‘आदर्श आचार संहिता’ का उल्लंघन करने की सप्रमाण दर्जनों शिकायत के बावजूद आयोग के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती। असली मतदाताओं के नाम काटे जाने व फ़र्ज़ी मतदाताओं के नाम जोड़ने की अनगिनत शिकायतें होती रहती हैं। लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गाँधी ने मतदाता सूची में गड़बड़ी, फ़र्ज़ी मतदान और “वोट चोरी” के आरोपों को लेकर तीन बार पावरपॉइंट प्रेज़ेनटेशन दिया और ठोस दस्तावेज़ों के साथ देश के सामने सबूत पेश किए। परन्तु हर बार एक तरफ़ तो चुनाव आयोग द्वारा या तो आरोपों से इंकार किया गया या लीपापोती करने वाले जवाब दिए गये। हैरत की बात तो यह है कि जब जब चुनाव आयोग कि नीयत व उसकी कार्यशैली पर ऊँगली उठती चुनाव आयोग के पक्ष में सत्ता के नेता या भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता मोर्चा संभाल लेते। पिछले दिनों जब राहुल गांधी द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर “वोट चोरी”, “मैच-फ़िक्सिंग” और “देशद्रोही” जैसे गंभीर आरोप लगाये गये और उन्हें “सरकारी गवाह” बनने की सलाह दी गयी, इससे तिलमिलाये भाजपा प्रवक्ताओं ने राहुल गांधी को लेकर कहा कि राहुल गांधी का “राजनीतिक ज्ञान अत्यंत शून्य” है और उन्हें भारत की राजनीति का मूलभूत ज्ञान ही नहीं है। भाजपा ने कहा कि राहुल गांधी में समझ और ज्ञान की कमी है, वे असलियत को समझ नहीं पाते हैं और उनका विवेक पूरी तरह शून्य है। भाजपा प्रवक्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि कांग्रेस सत्ता पाने के लिए छटपटा रही है और अपनी चुनावी हार का ठीकरा फोड़ने के लिए देश की संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करने की कोशिश कर रही है।

परन्तु इस बार मामला चुनाव आयोग द्वारा चलायी गयी एसआईआर अर्थात विशेष मतदाता पुनरीक्षण प्रक्रिया में की जा रही घोर धांधली का है और इस प्रक्रिया पर सवाल उठाने वाले केवल राहुल गांधी या विपक्षी दल व नेता ही नहीं बल्कि कई पूर्व चुनाव आयुक्त व नौकरशाह भी हैं। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों और पूर्व केंद्रीय गृह सचिव व केंद्रीय मंत्री तथा भाजपा के ही नेता आर.के. सिंह जैसे वरिष्ठ अधिकारियों और अनेक पूर्व संवैधानिक पदाधिकारियों ने भी चुनाव आयोग की ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ प्रक्रिया को मनमाना, दोषपूर्ण और क़ानूनी प्रावधानों के विरुद्ध क़रार दिया है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई.क़ुरैशी ने कहा कि वे शुरुआत से ही एसआईआर प्रक्रिया के आलोचक रहे हैं। उन्होंने कहा कि पिछले डेढ़ साल के दौरान चुनाव आयोग के काम करने का तरीक़ा “बेहद मनमाना” रहा है। इसी तरह पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने भी कहा कि एसआईआर प्रक्रिया “अनावश्यक” है और इसके संचालन में आयोग द्वारा अपनाई गई पूरी कार्यप्रणाली तथा पद्धति “दोषपूर्ण” है। लवासा ने कहा कि चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर उठा यह विवाद काफ़ी अप्रिय है और इससे लोकतांत्रिक संस्था की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा होती हैं।

पूर्व केंद्रीय मंत्री व पूर्व गृह सचिव आर.के. सिंह ने तो एक खुला पत्र जारी करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर एसआईआर अभियान के दौरान “क़ानून का उल्लंघन” करने का गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने इस पूरी प्रक्रिया पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इससे मतदाता सूचियों से वैध मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर कटे हैं। आर.के. सिंह ने आरोप लगाया कि देशभर में एसआईआर लागू करने का फ़ैसला जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21 के विपरीत था। क्योंकि क़ानून में विशेष परिस्थितियों में केवल किसी विशेष निर्वाचन क्षेत्र या उसके हिस्से में ही एसआईआर विशेष पुनरीक्षण की अनुमति है, न कि पूरे देश में। सिंह ने कहा कि धारा 21 के तहत पुनरीक्षण प्रक्रिया पूरी होने और उससे जुड़ी सभी अपीलों के निपटारे तक पुरानी मतदाता सूची प्रभावी रहती है। इसके बावजूद, अपीलों के लंबित रहने के दौरान संशोधित मतदाता सूची का इस्तेमाल चुनावों में किया गया, जो कि अवैध था। सिंह का आरोप है कि 2003 के बाद जोड़े गए मतदाताओं के नाम बिना जांच, बिना नोटिस और बिना सुनवाई के हटाए गए। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि चुनाव आयोग ने सबूत का भार मतदाताओं पर डाल दिया, जबकि क़ानून के अनुसार नाम हटाने का आधार साबित करने की ज़िम्मेदारी प्रशासन की होती है। सिंह के अनुसार एसआईआर या विशेष पुनरीक्षण ने अब तक 13 करोड़ नाम हटाए हैं। यह वोटर्स का 13% है, और एसआईआर अभी ख़त्म नहीं हुआ है। 2024 के चुनावों में एन डी ए और इण्डिया गठबंधन के बीच सिर्फ़ 3% का अंतर था। इसलिए नामों को हटाने का चुनावों पर काफ़ी असर पड़ा है और पड़ेगा। सिंह ने साफ़ कहा कि सत्यापन से पहले मतदाताओं के नाम हटाना एक गंभीर अपराध है, और ज्ञानेश कुमार इस अपराध के दोषी हैं। पिछले दिनों राहुल गाँधी ने दिल्ली में यमुना किनारे बेला एस्टेट में लोगों से मिले। यहाँ 728 लोगों में 727 लोगों के नाम काट दिए गए हैं। ये लोग दशकों से यहां रह रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव और 2025 के दिल्ली चुनावों में यह लोग वोट भी डाल चुके हैं। वोट चोरी से बनी सत्ता ज्ञानेश कुमार का बचाव करने की चाहे जितनी कोशिश करे परन्तु सच्चाई तो यही है कि आज़ाद भारत के इतिहास में ‘ज्ञानेश काल ‘ में यह चुनाव आयोग का निकृष्टतम दौर है।