दिलीप कुमार पाठक
हर साल 25 सितंबर को देश में ‘अंत्योदय दिवस’ मनाया जाता है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती के अवसर पर शुरू किए गए इस दिवस का एक प्रशासनिक और सामाजिक लक्ष्य समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति का आर्थिक और सामाजिक उत्थान करना है। 2014 में जब केंद्र सरकार ने इस दिवस को आधिकारिक रूप से मनाने की घोषणा की थी, तब उद्देश्य यही था कि विकास की नीतियां केवल शहरी और संपन्न वर्ग तक सीमित न रहें, बल्कि देश के सुदूर गांवों और वंचित तबकों तक पहुंचे। लेकिन आज इस व्यवस्थागत सफर के एक दशक से अधिक समय बाद, यह आत्मनिरीक्षण करना जरूरी है कि हमारी योजनाएं ज़मीन पर कितनी प्रभावी साबित हुई हैं।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का अंत्योदय दर्शन किसी जटिल आर्थिक सिद्धांत पर आधारित नहीं था, बल्कि वह बेहद व्यावहारिक था। उनका मानना था कि किसी भी कल्याणकारी राज्य की सफलता का पैमाना उसकी सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर या बड़े बुनियादी ढांचे का निर्माण नहीं हो सकता। विकास का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि देश के सबसे गरीब और संसाधनहीन नागरिक को भोजन, कपड़ा, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं मिल पा रही हैं या नहीं। आज जब भारत वैश्विक मंच पर एक मजबूत आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है, तब इस अंत्योदय दर्शन की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ जाती है। यदि हम विकास के नीतिगत और सांख्यिकीय ढांचे को देखें, तो सरकार ने कई मोर्चों पर बजटीय आवंटन और ढांचागत सुधार किए हैं। ग्रामीण विकास मंत्रालय के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, ‘दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन’ के तहत अब तक देश के लगभग 10.05 करोड़ ग्रामीण परिवारों को जोड़ा जा चुका है। इसके साथ ही ग्रामीण महिलाओं के 92 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूह काम कर रहे हैं, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी बढ़ा रहे हैं। इसके अतिरिक्त, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के माध्यम से ‘पीएम-यशस्वी’ और ‘पीएम-दक्ष’ जैसी कौशल विकास योजनाएं चलाई जा रही हैं, ताकि अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग और विमुक्त समुदायों के युवाओं को सीधे तकनीकी प्रशिक्षण और छात्रवृत्ति का लाभ मिल सके।
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी योजनाओं के माध्यम से वंचित वर्ग के मेधावी छात्रों को प्रतिष्ठित संस्थानों तक पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है। इन तमाम प्रशासनिक प्रयासों और आंकड़ों के बावजूद, ग्राउंड ज़ीरो यानी ज़मीनी हकीकत में चुनौतियां जस की तस बनी हुई हैं। नीतियों का कागज़ पर उत्कृष्ट होना एक बात है, लेकिन उनका अंतिम लाभार्थी तक बिना किसी रुकावट के पहुँचना दूसरी बात है। आज भी देश के कई हिस्सों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में तकनीकी खामियों, जैसे बायोमेट्रिक सत्यापन न होने के कारण गरीबों को राशन के लिए परेशानी उठानी पड़ती है।
प्रशासनिक बिचौलियों और स्थानीय स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार आज भी उस ‘आख़िरी आदमी’ के अधिकारों का हनन कर रहा है। मुफ्त राशन या सब्सिडी तात्कालिक राहत के लिए अनिवार्य हो सकती हैं, लेकिन यह दीर्घकालिक समाधान नहीं हैं। असली अंत्योदय तब सिद्ध होगा जब देश के अंतिम व्यक्ति को खैरात के बजाय गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और गरिमापूर्ण रोजगार के समान अवसर मिलेंगे। जब तक हम अपने मानव संसाधन को केवल उपभोक्ता बनाए रखने के बजाय उत्पादक नहीं बनाएंगे, तब तक समावेशी विकास का लक्ष्य अधूरा रहेगा। समाचार माध्यमों में अक्सर बड़े नीतिगत बदलावों और कॉर्पोरेट जगत की हलचलों को प्रमुखता मिलती है, लेकिन 25 सितंबर का यह दिन हमें इस बात के लिए प्रेरित करता है कि हम अपनी प्राथमिकताओं के केंद्र में देश के उस गरीब नागरिक को रखें, जो मुख्यधारा से कटा हुआ है। यह दिन सरकारों और अफ़सरशाही के लिए अपनी उपलब्धियों का जश्न मनाने का नहीं, बल्कि व्यवस्थागत कमियों को दूर करने और जवाबदेही तय करने का अवसर है। देश का वास्तविक विकास उसी दिन सुनिश्चित होगा, जब ‘अंत्योदय’ केवल एक वार्षिक आयोजन या राजनीतिक नारा न रहकर प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यशैली का स्थायी हिस्सा बन जाएगा।





