महेन्द्र तिवारी
भारत की अंतरिक्ष यात्रा ने पिछले कुछ दशकों में जो अभूतपूर्व प्रगति की है वह संपूर्ण विश्व के लिए एक अध्ययन का विषय बन गई है। शुरुआत में जब भारत ने अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम की नींव रखी थी तब संसाधनों का भारी अभाव था और दुनिया के कई विकसित देश हमारी क्षमताओं पर संदेह करते थे। लेकिन समय के साथ भारतीय वैज्ञानिकों ने अपने दृढ़ संकल्प और कठोर परिश्रम से उन सभी संदेहों को गलत साबित कर दिया। एक लंबे समय तक अंतरिक्ष से जुड़े सभी बड़े कार्य केवल सरकारी स्तर पर ही किए जाते रहे हैं। परंतु वर्तमान युग में तकनीकी विकास की गति इतनी तीव्र हो गई है कि सरकार के साथ साथ निजी क्षेत्र की भागीदारी भी अत्यंत आवश्यक हो गई है। इसी आवश्यकता को समझते हुए भारत ने अपने अंतरिक्ष क्षेत्र के दरवाजे निजी कंपनियों और नए उद्यमों के लिए खोल दिए हैं। इसका सबसे सुखद परिणाम अब हमारे सामने है जहां भारतीय नवउद्यम अंतरिक्ष के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
इसी ऐतिहासिक परिवर्तन की कड़ी में भारत का एक उभरता हुआ नवउद्यम आगामी 1 अक्टूबर 2026 को एक बहुत बड़ा कदम उठाने जा रहा है। यह कंपनी प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष संस्था की सहायता से भारत का पहला कक्षीय परिधीय संगणना उपग्रह प्रक्षेपित करने वाली है। यह घटनाक्रम कई मायनों में ऐतिहासिक है। यह केवल एक मशीन को अंतरिक्ष में भेजने की सामान्य प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में एक नए युग का आरंभ है। यह मिशन इस बात का प्रमाण है कि भारतीय युवा अब केवल विदेशी तकनीक पर निर्भर नहीं हैं बल्कि वे स्वयं ऐसी स्वदेशी तकनीकों का विकास कर रहे हैं जो वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं।
इस नई तकनीक के महत्व को गहराई से समझने के लिए हमें अंतरिक्ष विज्ञान की पुरानी और पारंपरिक कार्यप्रणाली का विश्लेषण करना होगा। आम तौर पर जो उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे जाते हैं उनका मुख्य कार्य पृथ्वी की तस्वीरें लेना और विभिन्न प्रकार के आंकड़े एकत्रित करना होता है। ये उपग्रह अंतरिक्ष में एक साधारण कैमरे या संवेदक की तरह काम करते हैं। वे जितना भी कच्चा आंकड़ा इकट्ठा करते हैं उसे सीधे पृथ्वी पर स्थित विशाल संचार केंद्रों पर भेज देते हैं। इसके बाद पृथ्वी पर मौजूद शक्तिशाली महासंगणक उन आंकड़ों को संसाधित करते हैं और उनका विश्लेषण करके उपयोगी जानकारी निकालते हैं। देखने में यह प्रक्रिया बहुत सरल लगती है लेकिन व्यावहारिक रूप से इसमें कई गंभीर बाधाएं हैं। अंतरिक्ष से पृथ्वी तक अरबों बाइट्स का कच्चा आंकड़ा भेजने में बहुत अधिक संचार क्षमता की आवश्यकता होती है। इसके अलावा इस पूरी प्रक्रिया में बहुत अधिक समय लगता है और खर्च भी बहुत ज्यादा आता है। कई बार आंकड़े पृथ्वी तक पहुंचते पहुंचते अपना महत्व खो देते हैं क्योंकि तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
इसी पारंपरिक समस्या को जड़ से समाप्त करने के लिए यह नया उपग्रह निर्माण किया गया है। यह उपग्रह परिधीय संगणना तकनीक पर काम करता है। परिधीय संगणना का सीधा सा अर्थ यह है कि आंकड़ों का विश्लेषण उसी जगह पर कर लिया जाए जहां वे उत्पन्न हो रहे हैं। इस तकनीक के कारण अब यह उपग्रह केवल एक निष्क्रिय संवेदक नहीं रह गया है बल्कि यह अंतरिक्ष में उड़ता हुआ एक अत्यंत शक्तिशाली संगणक बन गया है। इस उपग्रह में कृत्रिम मेधा का बड़े पैमाने पर उपयोग किया गया है। इसके माध्यम से उपयोगकर्ता अपने कृत्रिम मेधा आधारित निर्देश सीधे उपग्रह पर भेज सकते हैं। अब यह उपग्रह अंतरिक्ष में अपनी कक्षा में घूमते हुए ही धरती की तस्वीरें लेगा वहीं पर उन तस्वीरों का विश्लेषण करेगा और धरती पर कच्चा आंकड़ा भेजने के बजाय केवल काम का परिणाम या निष्कर्ष भेजेगा। इस एक बदलाव से समय संचार क्षमता और धन तीनों की भारी बचत होगी।
तकनीकी रूप से यह उपग्रह अभियांत्रिकी का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसे अत्यंत छोटे आकार की श्रेणी में रखा गया है जिसका कुल वजन मात्र 14 किलोग्राम है। इतने छोटे आकार और कम वजन के बावजूद इसके अंदर जो मशीनरी लगाई गई है वह किसी बड़े महासंगणक को भी मात दे सकती है। इसमें अत्यंत उन्नत सूक्ष्म संसाधक का उपयोग किया गया है। यह संसाधक इतना शक्तिशाली है कि यह एक सेकंड के भीतर 117 ट्रिलियन गणनाएं पूरी कर सकता है। इसके साथ ही इसमें 16 गीगाबाइट की तीव्र कार्यशील स्मृति और 2 टेराबाइट की विशाल भंडारण क्षमता दी गई है। पृथ्वी की सूक्ष्म घटनाओं को रिकॉर्ड करने के लिए इसमें 9 अलग अलग प्रकाश तरंगों को पकड़ने वाला एक विशेष कैमरा भी लगाया गया है। यह कैमरा पृथ्वी की सतह पर होने वाले छोटे से छोटे बदलाव को भी आसानी से दर्ज कर सकता है।
अंतरिक्ष का वातावरण किसी भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के लिए बहुत खतरनाक होता है। वहां न तो हवा है और न ही पृथ्वी जैसा चुंबकीय क्षेत्र जो सूर्य से आने वाली खतरनाक किरणों को रोक सके। अंतरिक्ष के विकिरण से बड़े बड़े उपग्रह कुछ ही महीनों में खराब हो जाते हैं। इस विकराल चुनौती का सामना करने के लिए इस भारतीय नवउद्यम ने एक विशेष प्रकार के सुरक्षा कवच का निर्माण किया है। यह आवरण उपग्रह के सभी नाजुक और महत्वपूर्ण हिस्सों को सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाता है। इस स्वदेशी सुरक्षा तकनीक के कारण इस उपग्रह का जीवनकाल सामान्य उपग्रहों की तुलना में 10 गुना तक अधिक होने की उम्मीद है। यह बात वाणिज्यिक दृष्टिकोण से बहुत मायने रखती है क्योंकि उपग्रह को बार बार बदलने का खर्च बच जाता है।
इस अभिनव तकनीक के व्यावसायिक और सामाजिक लाभ बहुत व्यापक हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अंतरिक्ष में ही आंकड़ों का विश्लेषण हो जाने के कारण जानकारी के प्रसारण में आने वाली लागत 85 प्रतिशत तक कम हो जाएगी। जिन समस्याओं का समाधान खोजने में पहले कई दिन लग जाते थे वे अब चंद मिनटों में हल हो जाएंगी। कृषि क्षेत्र में इसका उपयोग बहुत लाभकारी होगा। यह उपग्रह खेतों में फसलों के स्वास्थ्य की निगरानी कर सकता है मिट्टी में नमी का स्तर बता सकता है और बीमारियों का पहले से अनुमान लगा सकता है। इससे किसानों को समय पर सही निर्णय लेने में मदद मिलेगी और पैदावार में वृद्धि होगी। इसी प्रकार खनन उद्योग में भी खनिजों की सटीक पहचान करने और उनकी खुदाई की योजना बनाने में यह तकनीक बहुत सहायक होगी।
पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन की निगरानी में भी यह उपग्रह एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने की दर नदियों के जल स्तर में होने वाले बदलाव और जंगलों में लगने वाली आग जैसी घटनाओं पर यह उपग्रह बहुत तेजी से नजर रख सकता है। प्राकृतिक आपदाओं जैसे कि भूकंप चक्रवात या भारी बाढ़ के समय संचार व्यवस्था ठप हो जाती है। ऐसे समय में यह उपग्रह तुरंत आपदा प्रभावित क्षेत्रों का विश्लेषण करके राहत और बचाव दलों को सटीक जानकारी प्रदान कर सकता है। इससे न केवल कीमती मानव जीवन को बचाया जा सकेगा बल्कि आपदा के बाद बीमा दावों के निपटारे में भी तेजी आएगी।
इस संस्था की दूरदृष्टि केवल आंकड़ों के विश्लेषण तक सीमित नहीं है बल्कि वे अंतरिक्ष में आंकड़ों को सुरक्षित रखने की एक नई व्यवस्था पर भी विचार कर रहे हैं। इसे कक्षीय शीत भंडारण का नाम दिया गया है। आज के डिजिटल युग में आंकड़ों की सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। पृथ्वी पर मौजूद मुख्य संगणक हमेशा साइबर सेंधमारी प्राकृतिक आपदाओं या युद्ध जैसी स्थितियों में खतरे में रहते हैं। रक्षा मंत्रालय वित्तीय संस्थानों और बड़े व्यापारिक घरानों के लिए उनके संवेदनशील आंकड़ों को खोना एक बहुत बड़ा संकट हो सकता है। ऐसे में अंतरिक्ष में एक सुरक्षित भंडारण केंद्र स्थापित करना पृथ्वी के आभासी भंडारण का एक बेहतरीन विकल्प बन सकता है। वहां रखे गए आंकड़ों को भौतिक रूप से नष्ट करना या चुराना बहुत कठिन होगा।
संक्षेप में कहा जाए तो यह मिशन भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र की परिपक्वता और आत्मनिर्भरता का सबसे बड़ा प्रमाण है। यह इस बात का संकेत है कि हमारे देश के उद्यमी अब केवल दूसरों के बनाए हुए रास्तों पर नहीं चल रहे हैं बल्कि वे स्वयं नवाचार करके पूरी दुनिया को नई दिशा दिखा रहे हैं। परिधीय संगणना और अंतरिक्ष आधारित कृत्रिम मेधा भविष्य की तकनीकें हैं और भारत ने समय रहते इस क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा दी है। यह ऐतिहासिक कदम भारत को विश्व के अंतरिक्ष बाजार में एक अग्रणी शक्ति के रूप में स्थापित करेगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए तकनीकी विकास के नए द्वार खोलेगा।





