गांधी इतिहास के पन्नों में दर्ज एक महान व्यक्तित्व नहीं…सत्ता से ऊपर सत्य और जनसेवा

Gandhi is not merely a great figure recorded in the pages of history—for him, truth and public service stood above power

सौरभ वार्ष्णेय

आज जब राजनीति में सत्ता प्राप्त करना और उसे बनाए रखना ही अनेक बार सबसे बड़ा लक्ष्य दिखाई देता है, जब राजनीतिक दल और नेता एक-दूसरे को नीचा दिखाने, आरोप-प्रत्यारोप लगाने और अपनी श्रेष्ठता साबित करने की होड़ में लगे हैं, तब महात्मा गांधी की याद स्वाभाविक रूप से आती है। गांधी केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज एक महान व्यक्तित्व नहीं हैं, बल्कि उनके विचार आज भी हमारे लोकतंत्र, राजनीति और सामाजिक जीवन के लिए प्रासंगिक प्रश्न खड़े करते हैं। सवाल यह है कि जिस राजनीति की बुनियाद सत्य, अहिंसा, त्याग और जनसेवा पर रखी गई थी, वह आज सत्ता संघर्ष की इतनी तीखी प्रतिस्पर्धा में क्यों बदलती जा रही है?

महात्मा गांधी ने राजनीति को केवल सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं माना। उनके लिए राजनीति का अर्थ था समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचना और उसके जीवन में सुधार लाना। उनका प्रसिद्ध विचार था कि किसी भी निर्णय की कसौटी यह होनी चाहिए कि उससे समाज के सबसे कमजोर और अंतिम व्यक्ति को क्या लाभ मिलेगा। आज के राजनीतिक विमर्श में यदि इस कसौटी को फिर से केंद्र में रखा जाए तो अनेक सवालों के उत्तर अपने आप सामने आ सकते हैं।

आज राजनीति में मतभेद होना अस्वाभाविक नहीं है। लोकतंत्र में अलग-अलग विचार, नीतियां और दृष्टिकोण होना उसकी ताकत है। समस्या तब पैदा होती है जब वैचारिक असहमति व्यक्तिगत कटुता में बदल जाती है। विरोधी विचार रखने वाला व्यक्ति प्रतिद्वंद्वी से आगे बढ़कर शत्रु की तरह प्रस्तुत किया जाने लगता है। राजनीतिक बहस में मुद्दों की जगह व्यक्तियों पर टिप्पणियां हावी हो जाती हैं। एक-दूसरे की नीतियों की आलोचना करने के बजाय व्यक्तिगत आरोपों और राजनीतिक भाषा की तीव्रता को ही प्रभावशाली राजनीति का पैमाना मान लिया जाता है।

गांधी का राजनीतिक जीवन हमें इसके ठीक विपरीत रास्ता दिखाता है। वे अपने विरोधियों से असहमत होते थे, उनके विचारों का विरोध करते थे, लेकिन विरोध को नफरत में बदलना उनका उद्देश्य नहीं था। उनके लिए साधन और साध्य दोनों की पवित्रता महत्वपूर्ण थी। वे मानते थे कि गलत उद्देश्य को सही साधनों से हासिल नहीं किया जा सकता और न ही सही लक्ष्य के लिए गलत रास्ता उचित ठहराया जा सकता है।
आज के समय में गांधी की प्रासंगिकता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि समाज में राजनीतिक और सामाजिक ध्रुवीकरण दिखाई देता है। सोशल मीडिया ने संवाद को आसान बनाया है, लेकिन इसके साथ भाषा की कठोरता, अफवाहों और आधी-अधूरी सूचनाओं का प्रसार भी बढ़ा है। राजनीतिक मतभेद कई बार सामाजिक रिश्तों तक पहुंच जाते हैं। ऐसे वातावरण में गांधी का सत्य और अहिंसा का संदेश केवल राजनीतिक सिद्धांत नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद की आवश्यकता बन जाता है।

गांधी का अहिंसा का विचार केवल शारीरिक हिंसा से बचने तक सीमित नहीं था। विचारों और शब्दों में भी संयम आवश्यक है। किसी व्यक्ति से असहमति रखना लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन उसे अपमानित करना लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करता है। आज सार्वजनिक जीवन में भाषा के स्तर पर जिस संयम की आवश्यकता है, गांधी का जीवन उसकी याद दिलाता है।

इसी तरह गांधी का सत्य आज के सार्वजनिक जीवन के लिए एक महत्वपूर्ण कसौटी है। राजनीति में दावे और प्रतिदावे हमेशा होते रहे हैं, लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती तथ्य, पारदर्शिता और जवाबदेही से आती है। जनता को प्रभावित करने के लिए भावनात्मक नारों से अधिक जरूरी है कि उसे सही जानकारी मिले और सरकारों तथा राजनीतिक दलों से उनके निर्णयों पर सवाल पूछे जा सकें।

गांधी का एक और महत्वपूर्ण संदेश था. सत्ता से अधिक सेवा। उन्होंने अपने जीवन में सादगी को महत्व दिया। उनके लिए राजनीति व्यक्तिगत वैभव या प्रतिष्ठा प्राप्त करने का साधन नहीं थी। आज जब सार्वजनिक जीवन में पद, प्रभाव और राजनीतिक शक्ति का महत्व लगातार बढ़ता दिखाई देता है, तब गांधी की सादगी और त्याग हमें यह सोचने के लिए विवश करते हैं कि राजनीति का अंतिम उद्देश्य क्या होना चाहिए।

यह भी समझना जरूरी है कि गांधी को याद करना केवल उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण करना या उनकी जयंती पर उनके विचारों का उल्लेख करना नहीं है। गांधी को सच्चे अर्थों में याद करने का मतलब उनके विचारों को व्यवहार में उतारने की कोशिश करना है। यदि राजनीति में विरोध के बावजूद संवाद बना रहे, यदि सत्ता के साथ जवाबदेही भी जुड़ी रहे, यदि सार्वजनिक जीवन में सत्य और पारदर्शिता को महत्व मिले और यदि समाज के कमजोर वर्गों की आवाज को प्राथमिकता मिले, तभी गांधी की स्मृति सार्थक कही जा सकती है।

आज भारत एक जीवंत लोकतंत्र है। लोकतंत्र में सत्ता आती-जाती रहती है, राजनीतिक दल बदलते रहते हैं और विचारों में परिवर्तन भी होता रहता है। लेकिन लोकतंत्र की मूल भावनासंवाद, सहिष्णुता, असहमति का सम्मान और जनहित स्थायी रहनी चाहिए। यही वह क्षेत्र है जहां गांधी आज भी हमारे सामने एक नैतिक प्रश्न बनकर खड़े होते हैं।

आज आवश्यकता किसी एक राजनीतिक दल या विचारधारा को गांधी के नाम से जोडऩे की नहीं, बल्कि उनके उन मूल्यों को समझने की है जो पूरे समाज के लिए उपयोगी हैं। सत्ता के संघर्ष में एक-दूसरे को हराने की कोशिश स्वाभाविक राजनीतिक प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र में विरोधी को समाप्त कर देना लक्ष्य नहीं हो सकता। लक्ष्य होना चाहिए. बेहतर शासन, मजबूत समाज और अधिक न्यायपूर्ण व्यवस्था।

महात्मा गांधी आज इसलिए याद आते हैं क्योंकि वर्तमान समय में राजनीति को जीतने से अधिक राजनीति को गरिमा देने की आवश्यकता महसूस होती है। सत्ता बदल सकती है, सरकारें बदल सकती हैं, राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं, लेकिन सत्य, अहिंसा, सेवा और संवाद जैसे मूल्य किसी भी लोकतंत्र की स्थायी पूंजी होते हैं। आज के शोरगुल भरे राजनीतिक वातावरण में गांधी की सबसे बड़ी प्रासंगिकता शायद यही है कि वे हमें याद दिलाते हैं. राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का रास्ता नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की सेवा का माध्यम भी है।