संजय सक्सेना
शहरों की शोरगुल से भरी और भागमभाग की जिंदगी से दूर एक जिंदगी गांव में भी बसती है। यह करीब 74 प्रतिशत की है। भारत कृषि प्रधान और ग्रामीण पृष्ठभूमि वाला देश है। गांवों में सुविधाएं भले ही सीमित हों, लेकिन जिंदगी यहां भी पूरे सलीके से पलती-बढ़ती है। गांव की संस्कृति देश का प्रतिनिधित्व करती है। कई मामलों में तो यह जिंदगी शहरों से भी काफी बेहतर होती है, लेकिन इससे इतर गांव में इस समय अजीब सी बेचैनी देखने को मिल रही है। दरअसल, हाल के कुछ सालों में भारत के सीमावर्ती और आंतरिक राज्यों के ग्रामीण इलाकों में अवैध रूप से आए प्रवासियों (जिनमें मुख्य रूप से बांग्लादेश और म्यांमार से आए लोग शामिल हैं) के बसने की खबरें गांव की चौपालों में लगातार चिंता का कारण बनती जा रही हैं। ग्रामीण परेशान हैं, लेकिन यहां उनका दुख-दर्द सुनने वाला कोई मीडिया या नेता मौजूद नहीं होता है। पुलिस भी सीमित संख्या में रहती है। क्योंकि गांवों में बड़ी संख्या में बस गए बांग्लादेशी और रोहिंग्या अब तो इतने निर्भीक हो गए हैं कि वह किसी न किसी तरह अपनी ‘ताकत’ का प्रदर्शन करते ही रहते हैं। इसकी बानगी सहज देखना हो तो आप किसी भी ट्रेन में बैठ जाएं, जब यह ट्रेन गांवों से गुजरती है तो सैकड़ों की तादाद में कई ऐसी बस्तियां नजर आती हैं जिनकी छतों पर ये घुसपैठिए धार्मिक हरा झंडा लहराकर अपनी ताकत का इजहार करते दिखते हैं। इस बात का खुलासा गांव के लोग भी करते हैं, गांव वालों का कहना है कि पिछले 15-20 सालों में यह बदलाव काफी तेजी से देखने में आया है। शुरुआत में काम की तलाश में आए कई घुसपैठिए रेलवे लाइनों के किनारे, झुग्गी-झोपड़ियों या सरकारी जमीनों पर अस्थायी ठिकाने बनाकर रहते थे। तिकड़म के सहारे इनके स्थानीय पहचान पत्र और अन्य दस्तावेज बन जाने के कारण ये लोग ग्रामीण क्षेत्रों में स्थायी या अर्ध-स्थायी मकान बनाकर बसने लगे हैं।
गौरतलब है कि अवैध रूप से सीमा पार करने वाले लोग सबसे पहले बड़े शहरों के बाहरी हिस्सों या रेलवे पटरियों के किनारे खाली पड़ी जमीनों पर शरण लेते हैं। इन जगहों पर वे दिहाड़ी मजदूरी, कचरा बीनने या छोटे-मोटे काम करके गुजारा करते थे, लेकिन शहरों में बढ़ती निगरानी और जमीन की कमी के कारण ये लोग धीरे-धीरे ग्रामीण इलाकों की ओर बढ़ने लगे। गांवों में सस्ती जमीन, किराए पर मकान मिलना आसान और स्थानीय लोगों के खेतों में काम मिलना सहज होता है, जिससे वे वहां अपनी बस्तियां बसा लेते हैं। इसका प्रभाव यह होता है कि किसी भी क्षेत्र में अचानक जनसंख्या बढ़ने से वहां के पानी, बिजली, स्वास्थ्य सुविधाओं और राशन जैसे संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। क्योंकि अक्सर स्थानीय स्तर पर कुछ बिचौलियों की मदद से ये घुसपैठिए राशन कार्ड, आधार कार्ड या अन्य पहचान पत्र बनवा लेते हैं, जिससे इन्हें कानूनी रूप से रोकने में सुरक्षा एजेंसियों को दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। उत्तर प्रदेश सहित अन्य सीमावर्ती राज्यों (जैसे पश्चिम बंगाल, असम) के साथ-साथ देश के आंतरिक हिस्सों (जैसे झारखंड के संताल परगना, दिल्ली-एनसीआर के आसपास के ग्रामीण इलाके) में भी इस तरह के जनसांख्यिकीय बदलावों को लेकर स्थानीय आबादी और प्रशासन के बीच सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़ी चिंताएं बनी रहती हैं।
भारतीय सुरक्षा बल (जैसे बीएसएफ) और राज्य पुलिस समय-समय पर अवैध बस्तियों की पहचान करने और उनके दस्तावेजों की जांच करने के लिए अभियान चलाती हैं। मगर इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण ज्यादा कामयाबी नहीं मिल पाती थी। जब से बंगाल जैसे कुछ राज्यों में राजनीतिक बदलाव हुए हैं, तब से जरूर हालात में कुछ सुधार आया है। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय ने भी देश में अवैध प्रवासन को लेकर चिंता जताई है और सरकारों को घुसपैठ रोकने तथा अवैध प्रवासियों की पहचान करने के सख्त निर्देश दिए हैं। सरकारी और विभिन्न आधिकारिक अनुमानों के अनुसार देश के करीब 17 से अधिक राज्यों में अवैध प्रवासियों का जाल फैला हुआ है, जिनमें पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा, झारखंड, बिहार और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (दिल्ली-एनसीआर) के ग्रामीण व अर्ध-शहरी इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। संसद में समय-समय पर पेश किए गए विभिन्न आंकड़ों और रिपोर्टों के मुताबिक देश भर में अवैध घुसपैठियों की कुल संख्या एक करोड़ से डेढ़ करोड़ के बीच आंकी गई है, जो सीमावर्ती व आंतरिक जिलों की डेमोग्राफी को लगातार बदल रहे हैं। अकेले पश्चिम बंगाल में अनुमानित रूप से 50 लाख से अधिक, असम में 20 से 25 लाख, और झारखंड, बिहार व दिल्ली-एनसीआर जैसे राज्यों व क्षेत्रों में शेष लाखों अवैध प्रवासी अनधिकृत रूप से रह रहे हैं। बात अगर इन्हें देश से बाहर खदेड़ने या डिपोर्ट करने की की जाए, तो सुरक्षा बलों, बीएसएफ और राज्य सरकारों के विशेष अभियानों के तहत अब तक कुल मिलाकर कई लाख अवैध प्रवासियों की पहचान करके उन्हें वापस उनके देश भेजा जा चुका है। अकेले असम और पश्चिम बंगाल जैसे सीमावर्ती राज्यों से पिछले कुछ वर्षों में नियमों और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन कराते हुए हजारों संदिग्ध घुसपैठियों की पहचान कर और उनके नाम सूचीबद्ध कर उनके खिलाफ लगातार सख्त कार्रवाई की जा रही है, तथा केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देशों पर देश भर में अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें स्वदेश लौटने या कानूनी रूप से डिपोर्ट करने का सिलसिला तेजी से चल रहा है।





