अजय कुमार
बात हाल-फिलहाल की है, जब भारत के दिल और देश की राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन की हेडलाइनों की तपिश से उबल रहा था। पूरे देश में इस आंदोलन को लेकर चर्चा गरम थी। चाय की एक दुकान पर टंगे टेलीविजन स्क्रीन पर तीन-चार नेता एक-दूसरे पर चिल्ला रहे थे। बहस का विषय देश का विकास, युवाओं की नौकरियां, महिलाओं की सुरक्षा या किसानों की बदहाली नहीं था, बल्कि एक मामूली स्थानीय घटना को लेकर शुरू हुआ ऐसा विवाद था, जिसे मजहबी और सियासी रंग दे दिया गया था। बहस में शामिल एक युवा नेता पूरी ताकत से चिल्लाकर अपने से दुगनी उम्र के विरोधी नेता को सरेआम भ्रष्टाचारी और अपराधियों का सरपरस्त घोषित कर रहा था। उसके पास न तो कोई अदालती सबूत था और न ही कोई पुख्ता दस्तावेज, लेकिन उसकी आवाज की कड़वाहट और अपशब्दों की तीव्रता इतनी ज्यादा थी कि एंकर भी मूकदर्शक बना हुआ था। चाय की चुस्की लेते हुए वहां खड़े एक बुजुर्ग ने गहरी सांस छोड़कर पास बैठे नौजवान से कहा कि आजकल जो जितना घटिया और तीखा बोलता है, उसे उतना ही बड़ा और जुझारू नेता मान लिया जाता है, सियासी तजुर्बे और मर्यादा की तो जैसे अब कोई कीमत ही नहीं बची है।
यह दृश्य आज देश की समकालीन राजनीति का एक ऐसा कड़वा सच बन चुका है, जहां राजनीति हर समय 24 घंटे और 365 दिन चरम पर रहती है। चुनाव खत्म हो जाते हैं, सरकारें बन जाती हैं, लेकिन चुनावी मोर्चेबंदी और नफरत का माहौल कभी शांत नहीं होता। राजनीति का स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है और सार्वजनिक विमर्श से वे मुद्दे पूरी तरह गायब हो चुके हैं, जो सीधे तौर पर आम नागरिक के जीवन को प्रभावित करते हैं। आज देश के युवाओं की तरक्की, रोजगार के नए अवसरों का निर्माण, महिलाओं का सम्मान और उनकी वास्तविक सुरक्षा, किसानों की आय दोगुनी करना, मजदूरों को उनका हक दिलाना और कानून व्यवस्था को मजबूत करके अपराधियों पर शिकंजा कसना जैसे बुनियादी विषय राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों की धूल फांक रहे हैं। नेताओं की चिंता अब देश की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने की कम और सोशल मीडिया पर अपनी रील्स और बयानों को वायरल करवाकर सुर्खियां बटोरने की ज्यादा हो गई है। अपनी राजनीति चमकाने के लिए बेहद छोटी और स्थानीय घटनाओं को तिल का ताड़ बनाकर पेश करना कुछ सियासी सूरमाओं का रोज का काम बन गया है।
इस गिरते स्तर का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि अब बिना किसी जांच या सबूत के किसी भी सम्मानित व्यक्ति या विरोधी पर सीधे भ्रष्टाचार, बलात्कारियों को संरक्षण देने या चंदा चोरी जैसे गंभीर आरोप लगा दिए जाते हैं। टीवी कैमरों के सामने आकर बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस में सनसनी फैलाई जाती है, लेकिन जब अदालत में सबूत पेश करने या जिम्मेदारी लेने का वक्त आता है, तो यही नेता अपनी बात से पलट जाते हैं या फिर विक्टिम कार्ड खेलने लगते हैं। जिम्मेदारी से भाग जाना और झूठे आरोपों के पीछे छिप जाना आज के कई राजनेताओं का स्थायी चरित्र बन चुका है। हद तो तब हो जाती है, जब अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए कुछ नेता देश की तुलना पड़ोसी मुल्कों से करने लगते हैं। कोई भारत को नेपाल जैसी अस्थिरता की तरफ धकेलने की बात करता है, तो कोई खुलेआम धमकी देता है कि अगर उनकी बातें न मानी गईं तो देश के हालात बांग्लादेश जैसे हो जाएंगे, जहां तख्तापलट और हिंसा का तांडव देखने को मिला था। ऐसी गैर-जिम्मेदाराना बयानबाजी करते वक्त वे भूल जाते हैं कि वे उसी लोकतंत्र की थाली में छेद कर रहे हैं, जिसने उन्हें पहचान और पावर दी है।
इस पूरे तमाशे में सबसे बड़ा सहारा संविधान को बनाया जाता है। हर छोटा-बड़ा नेता हाथ में संविधान की किताब लेकर घूमता दिखाई देता है और खुद को उसका सबसे बड़ा रक्षक घोषित करता है। लेकिन विडंबना देखिए कि उसी संविधान की दुहाई देकर रोज लोकतांत्रिक संस्थाओं का अपमान किया जाता है, न्यायपालिका पर सवाल उठाए जाते हैं और कानून की धज्जियां उड़ाई जाती हैं। संविधान को ढाल बनाकर देश के ताने-बाने को तार-तार करने का यह खेल अब जनता भी समझने लगी है। इसी राजनीति का एक और दुखद और घिनौना पहलू यह है कि प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष दिखने की होड़ में किसी न किसी बहाने से सनातन परंपराओं और हिंदुओं को गाली देना आज एक फैशन और नया रिवाज बन गया है। बहुसंख्यक समाज की आस्था, उनके त्योहारों और उनकी संस्कृति पर अभद्र टिप्पणियां करके कुछ राजनीतिक दल एक खास वोट बैंक को साधने की कोशिश करते हैं। उन्हें लगता है कि सनातन को नीचा दिखाकर वे खुद को आधुनिक और मसीहा साबित कर देंगे, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि इस देश की आत्मा सर्वधर्म समभाव में बसती है और किसी एक धर्म को लगातार निशाना बनाना समाज में केवल नफरत का जहर ही घोलता है।
इन नेताओं की सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि ये जनता को बेवकूफ समझते हैं। वातानुकूलित कमरों में बैठकर सोशल मीडिया की ट्रोल आर्मी के भरोसे राजनीति करने वाले इन सियासी दलों को लगता है कि वे जनता से बहुत ज्यादा होशियार और काबिल हैं। वे सोचते हैं कि वे जो भी नैरेटिव या झूठ परोसेंगे, जनता उसे सच मानकर आंखें बंद कर लेगी। वे जनता की खामोशी को उनकी नासमझी मान बैठते हैं। लेकिन भारतीय लोकतंत्र का इतिहास गवाह है कि जब-जब नेताओं का अहंकार सातवें आसमान पर पहुंचा है, तब-तब इसी देश की साधारण और गरीब जनता ने अपने वोट की ताकत से बड़े-बड़े सूरमाओं के सिंहासन को मिट्टी में मिला दिया है। जनता नेताओं की हर चाल, उनके हर खोखले वादे, उनके झूठे आरोपों और उनकी नफरत भरी बयानबाजी को बहुत बारीकी से देखती है। जब चुनाव का समय आता है, तो वह बिना कोई शोर मचाए ईवीएम का बटन दबाकर इन घमंडी और खुद को जरूरत से ज्यादा चालाक समझने वाले नेताओं को उनकी सही जगह दिखा देती है।
हाल के वर्षों में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं, जहां जनता ने उन दलों और नेताओं को बार-बार ठुकराया है, जो केवल नकारात्मकता, झूठे आरोपों और बहुसंख्यक समाज को गाली देने की राजनीति पर निर्भर थे। जिन राज्यों में नेताओं ने विकास के काम ठप करके केवल जातिगत नफरत और तुष्टिकरण का खेल खेला, वहां की जनता ने उन्हें सत्ता के गलियारों से बाहर का रास्ता दिखा दिया। जिन नेताओं ने बिना सबूत के कीचड़ उछालने को ही अपना मुख्य पेशा बना लिया था, उन्हें जनता ने चुनावों में करारी शिकस्त देकर यह संदेश दिया कि देश को गालीबाज नहीं, बल्कि काम करने वाले जनसेवक चाहिए। लेकिन इस लोकतांत्रिक थप्पड़ के बाद भी इन नेताओं के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। चुनाव हारने के बाद अपनी गलतियों को सुधारने और आत्ममंथन करने के बजाय, इन सियासी दलों का हो-हल्ला मचाने का सिलसिला और तेज हो जाता है। वे अपनी हार का ठीकरा कभी ईवीएम पर फोड़ते हैं, कभी चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा करते हैं, तो कभी जनता के विवेक पर ही सवाल उठाने लगते हैं। वे यह मानने को तैयार ही नहीं होते कि जनता ने उनके खोखलेपन और उनकी नफरत की राजनीति को खारिज कर दिया है।
संसद से लेकर सड़क तक इनका यह हंगामा और शोर-शराबा थपने का नाम नहीं लेता, क्योंकि इनका मकसद देश का सुधार करना नहीं, बल्कि किसी भी तरह सत्ता हथियाना या फिर चर्चा में बने रहना है। उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं है कि उनके इस गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार से देश की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खराब होती है या युवा पीढ़ी के मन में राजनीति के प्रति पूरी तरह से वितृष्णा पैदा हो रही है। आज का जागरूक युवा जब इन नेताओं को संसद में कागज फाड़ते, आसन के सामने चिल्लाते और घटिया स्तर की भाषा का इस्तेमाल करते देखता है, तो उसका लोकतंत्र के इस पूरे ढांचे से भरोसा डगमगाने लगता है। राजनीति, जो कभी देश सेवा और समाज सुधार का सबसे पवित्र माध्यम मानी जाती थी, उसे इन स्वार्थी और अहंकारी नेताओं ने व्यक्तिगत दुश्मनी साधने और अपनी महत्वाकांक्षाएं पूरी करने का अखाड़ा बना दिया है।
आम जनता के दिलों में देश की इस राजनीतिक स्थिति को लेकर चिंता साफ देखी जा सकती थी। ये नेता चाहे जितना भी हो-हल्ला मचा लें, चाहे जितना भी खुद को जनता से ज्यादा होशियार समझ लें, आखिरी फैसला इसी देश की मिट्टी और यहां के लोगों को करना है। जो दल देश के विकास, युवाओं के रोजगार और महिलाओं के सम्मान की चिंता छोड़कर केवल विभाजन और अपशब्दों का सहारा लेगा, उसे यह जनता बार-बार और हर बार ठुकराती रहेगी। शोर मचाने वाले नेता कुछ समय के लिए सुर्खियां तो पा सकते हैं, लेकिन वे कभी जनता के दिलों में जगह नहीं बना सकते। भारतीय लोकतंत्र की असली ताकत इसकी समझदार जनता है, जो समय आने पर हर अहंकारी और झूठे राजनेता का भ्रम बड़ी खामोशी और बेमुरव्वत तरीके से तोड़ देती है, और यही इस देश के भविष्य की सबसे बड़ी उम्मीद भी है।





