ड्रैगन का पुराना ढर्रा और भारत का नया संकल्प

Dragon's old pattern and India's new resolve

अशोक भाटिया

24 अक्टूबर को भारत-तिब्बत सीमा पुलिस ने अपने स्थापना दिवस की 65वीं वर्षगांठ मनाई है, जो भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति उसके अडिग संकल्प को दर्शाती है। इस ऐतिहासिक अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आईटीबीपी के जांबाज ‘हिमवीरों’ को बधाई देते हुए उनके असाधारण शौर्य और पराक्रम की सराहना की। प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में विशेष रूप से रेखांकित किया कि आईटीबीपी के इन वीर जवानों ने हमेशा खुद को असाधारण वीरता के माध्यम से साबित किया है और हर चुनौती का सामना एक अनुकरणीय व अटूट दृढ़ संकल्प के साथ किया है। उन्होंने आगे कहा कि देश के प्रति इन जवानों की यह निस्वार्थ सेवा और सर्वोच्च बलिदान संपूर्ण राष्ट्र के लिए एक महान और अटूट प्रेरणा का स्रोत है।

शून्य से भी कई डिग्री नीचे के हाड़ कपाने वाले तापमान, भयानक बर्फीले तूफानों और 18,000 फीट तक की अत्यंत दुर्गम चोटियों पर तैनात आईटीबीपी के ये हिमवीर आज चीन के दशकों पुराने विस्तारवादी ढर्रे के मुकाबले भारत की सामरिक आत्मनिर्भरता और अदम्य साहस की सबसे मजबूत अग्रिम दीवार बनकर खड़े हैं। यह वर्षगांठ केवल एक विशिष्ट सुरक्षा बल के शौर्य का उत्सव नहीं है, बल्कि यह बीजिंग की भू-राजनीतिक चालाकियों के सामने नई दिल्ली के उस बदलते रक्षा प्रतिमान और नए रणनीतिक संकल्प की हुंकार है जो अब किसी भी प्रकार के बाहरी दबाव के आगे घुटने टेकने को तैयार नहीं है।

चीन की सामरिक संस्कृति हमेशा से ‘सलामी स्लाइसिंग’ यानी किश्तों में पड़ोसियों की जमीन हड़पने और द्विपक्षीय समझौतों को दरकिनार कर ‘यथास्थिति को एकतरफा बदलने’ के पुराने ढर्रे पर आधारित रही है। सन 1962 के धोखेबाज आक्रमण से लेकर 2020 के गलवान संघर्ष और उसके बाद की लंबी सैन्य तनातनी तक, बीजिंग का एक ही ढर्रा रहा है कि कूटनीतिक मेज पर शांति का ढोंग रचाया जाए और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चुपके से सैन्य बुनियादी ढांचे का विस्तार करके नया दावा ठोक दिया जाए। चीन की इस विस्तारवादी नीति में बड़े पैमाने पर सैनिकों का जमावड़ा करना, विवादित या बिना सीमांकन वाले क्षेत्रों में बंकर, पुल, हवाई पट्टियां बनाना और सीमावर्ती मॉडल गांव बसाकर स्थायी अतिक्रमण करना शामिल रहा है। चीन का पुराना ढर्रा हमेशा इस धारणा पर काम करता था कि भारत कूटनीतिक बयानों और रक्षात्मक प्रतिक्रियाओं तक ही सीमित रहेगा, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भारत ने इस पुरानी और ऐतिहासिक हिचकिचाहट को पूरी तरह से त्याग दिया है।

आज का भारत बीजिंग को उसी की सैन्य और कूटनीतिक भाषा में दोटूक जवाब दे रहा है, जिसका सीधा संदेश है कि भारत शांति का प्रबल समर्थक है लेकिन अपनी क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की कीमत पर किसी भी प्रकार का समझौता कभी नहीं करेगा। भारत का यह नया संकल्प सीमाओं पर केवल सैन्य तैनाती बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें एक अभूतपूर्व रणनीतिक आधुनिकीकरण शामिल है। भारत ने डारबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी सड़क, ज़ोजिला टनल और अटल टनल जैसी कई महत्वपूर्ण और हर मौसम में चालू रहने वाली बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को रिकॉर्ड गति से पूरा किया है, जिससे अब भारतीय सेना और आईटीबीपी के जवानों की सीमा तक पहुंच कुछ ही घंटों में संभव हो गई है। इसके साथ ही चीन के मॉडल गांवों के जवाब में भारत ने ‘वाइब्रेंट विलेजेस प्रोग्राम’ शुरू किया है, जिसके तहत सीमावर्ती गांवों में आधुनिक सुविधाएं पहुंचाई जा रही हैं ताकि वहां से जनसांख्यिकीय पलायन रुके और स्थानीय नागरिक देश की सुरक्षा की पहली अग्रिम पंक्ति के रूप में सुदृढ़ बने रहें। आर्थिक मोर्चे पर भी भारत ने चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाने और रणनीतिक क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नियमों को कड़ा करके चीन पर अपनी निर्भरता को न्यूनतम करने का एक सशक्त चक्रव्यूह तैयार किया है।

1962 के भारत-चीन युद्ध के तुरंत बाद स्थापित किए गए इस विशिष्ट बल ने पिछले 65 वर्षों में काराकोरम दर्रे से लेकर अरुणाचल प्रदेश के जेचप ला तक फैले 3,488 किलोमीटर लंबे अत्यंत कठिन हिमालयी मोर्चे की रखवाली करते हुए शौर्य की जो अमिट इबारत लिखी है, वह अद्वितीय है। देश के गृह मंत्रालय के अनुसार आईटीबीपी की अधिकांश सीमा चौकियां 9,000 से लेकर 18,800 फीट की अत्यधिक ऊंचाइयों पर स्थित हैं, जहां सर्दियों में तापमान शून्य से 45 डिग्री सेल्सियस नीचे तक गिर जाता है। ऐसे प्रतिकूल वातावरण में भी बल का मूल मंत्र “शौर्य, दृढ़ता, कर्मनिष्ठा” इन जवानों के भीतर देशप्रेम की असीम ऊर्जा भरता है। गलवान और पैंगोंग त्सो के गतिरोध के दौरान आईटीबीपी ने भारतीय सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के आक्रामक मंसूबों को पूरी तरह से नाकाम कर दिया था। वर्तमान में भारत के नए संकल्प के तहत डीडी न्यूज पोर्टल पर आईटीबीपी की जारी रिपोर्टों के अनुसार सुरक्षा बलों का आधुनिकीकरण तीव्र गति से किया जा रहा है, जिसमें उन्हें नए ऑल-टेरेन व्हीकल्स उच्च तकनीक वाले निगरानी ड्रोनों, एंटी-ड्रोन प्रणालियों और अत्यधिक ऊंचाई के लिए उपयुक्त आधुनिकतम हथियारों से लैस किया जा रहा है।

वैश्विक भू-राजनीतिक पटल पर भी भारत ने अपनी रणनीतिक बिसात को बेहद चतुराई से बिछाया है, जहां ‘क्वाड’ समूह में भारत की सक्रिय भूमिका और आसियान देशों के साथ प्रगाढ़ होते रक्षा संबंधों ने चीन की उस घेराबंदी को तोड़ दिया है जो वह हिंद महासागर क्षेत्र में करना चाहता था। भारत अब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक जिम्मेदार ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ के रूप में उभर रहा है, जो वैश्विक मंच पर चीन की आर्थिक और सैन्य दादागिरी को संतुलित करने की पूरी क्षमता रखता है। हाल के दिनों में सीमा पर गश्त को लेकर दोनों देशों के बीच हुए कुछ समझौतों ने 2020 के बाद से जारी सैन्य गतिरोध को जरूर कम किया है, लेकिन समाचारों के अनुसार भारत का नया संकल्प यह स्पष्ट करता है कि वह अपनी सतर्कता और सामरिक तैयारियों में रत्ती भर भी ढील नहीं आने देगा।

आर्थिक मोर्चे पर आत्मनिर्भरता हासिल करना भारत के इस नए संकल्प का सबसे अहम पहलू है, क्योंकि चीन लंबे समय से विनिर्माण क्षेत्र में अपने एकाधिकार का इस्तेमाल दूसरे देशों पर दबाव बनाने के लिए करता रहा है। भारत ने इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर और रक्षा विनिर्माण में ‘प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव’ जैसी योजनाओं के जरिए घरेलू उद्योगों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाया है। इससे रक्षा उपकरणों के आयात पर निर्भरता कम हुई है और स्वदेशी रूप से विकसित हथियारों व तकनीकों को बल मिला है। सुरक्षा के मोर्चे पर यह केवल सीमाओं को सुरक्षित रखने की लड़ाई नहीं है, बल्कि देश की डिजिटल सीमाओं और डेटा संप्रभुता की सुरक्षा का भी एक व्यापक मिशन है।

चीन का इतिहास गवाह है कि वह केवल शक्ति और अडिग संकल्प की भाषा समझता है, और जब उसे सामने एक मजबूत व अभेद्य दीवार दिखाई देती है, तो उसके विस्तारवादी हौसले पस्त होने लगते हैं। आईटीबीपी के स्थापना दिवस की यह 65वीं वर्षगांठ देश को यह पूर्ण विश्वास दिलाती है कि हमारी सीमाएं पूरी तरह सुरक्षित हाथों में हैं और ‘हिमवीरों’ का अदम्य शौर्य तथा नई दिल्ली का दृढ़ राजनीतिक संकल्प मिलकर चीन के हर पुराने ढर्रे और विस्तारवादी चाल को हर मोर्चे पर नाकाम करने के लिए पूरी तरह सक्षम और तैयार हैं। 2047 के एक सशक्त, आत्मनिर्भर और विकसित भारत की यात्रा इन सुरक्षित हिमालयी सीमाओं और जवानों के चट्टानी इरादों के बिना अधूरी है, और देश का यह नया पथ अब किसी भी परिस्थिति में पीछे मुड़ने वाला नहीं है।