प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ के 3 अक्टूबर 2026 को 12 वर्ष पूरे होने पर विशेष

Special on completion of 12 years of Prime Minister Narendra Modi's radio programme 'Mann Ki Baat' on 3 October 2026

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ है करोड़ों भारतीयों की प्रेरणा का जनमंच

वासुदेव देवनानी

हर महीने का आखिरी रविवार। रेडियो पर एक परिचित आवाज। सामने न कोई चुनावी सभा, न राजनीतिक नारों का शोर। एक प्रधानमंत्री देशवासियों से संवाद करते हैं और इस संवाद के केंद्र में अक्सर वे लोग होते हैं, जिनकी पहचान कभी अपने गांव, कस्बे या जिले की सीमाओं से आगे नहीं हो पाई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का 3 अक्टूबर 2014 को विजयादशमी के दिन शुरू हुआ ‘मन की बात’ रेडियो कार्यक्रम इस वर्ष 3 अक्टूबर 2026 को अपने 12 वर्ष पूरे करने जा रहा है । 30 सितंबर 2026 तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम की 138वीं कड़ी पूरी हो चुकी है। 138वीं कड़ी गत 27 सितंबर 2026 को प्रसारित हुई थी। इस कार्यक्रम के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी शिक्षा, पर्यावरण, जल संरक्षण, कृषि, खेल, स्थानीय उत्पाद, संस्कृति और सामाजिक सेवा से जुड़े अनेक विषयों और नागरिकों के प्रयासों को राष्ट्रीय स्तर पर आम जनता के सामने लाये है।

‘मन की बात’ की एक खासियत इसका विषय चयन है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अक्सर ऐसी कहानियां सामने रखते हैं, जिनकी शुरुआत किसी बड़े संस्थान से नहीं, बल्कि किसी व्यक्ति, समूह या स्थानीय समुदाय से होती है। जैसे किसी किसान का नवीन प्रयोग, किसी महिला समूह का काम, किसी शिक्षक की पहल या किसी पर्यावरण कार्यकर्ता का वर्षों का प्रयास आदि।

जब छोटी पहल बनी बड़ी कहानी
कार्यक्रम के शुरुआती वर्षों में राजस्थान के अलवर के पवन आचार्य का सुझाव इसका उल्लेखनीय उदाहरण बना। उन्होंने दीपावली पर मिट्टी के दीये खरीदने की अपील की, ताकि स्थानीय कुम्हारों की आजीविका को सहारा मिले। प्रधानमंत्री ने उनके संदेश को देश के सामने रखा। यह प्रसंग बताता है कि ‘मन की बात’ में नागरिकों के सुझाव केवल सुने ही नहीं जाते, बल्कि कभी-कभी उन्हें व्यापक सामाजिक संदर्भ भी मिलता है।

जल संरक्षण भी कार्यक्रम के स्थायी विषयों में रहा है। 2016 में राजस्थान की प्राचीन बावड़ियों और तत्कालीन जल स्वावलंबन प्रयासों का उल्लेख हुआ। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राजस्थान और गुजरात जैसे जल-संकट वाले क्षेत्रों में पारंपरिक जल संरचनाओं को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। 2019 में जालौर की दो ऐतिहासिक बावड़ियों की कहानी सामने आई जालौर की पंचायतों के लोगों ने गंदगी और गाद से भरी बावड़ियों को सामूहिक श्रम और आर्थिक सहयोग से फिर उपयोगी बनाया। यह उदाहरण जल संरक्षण को सरकारी योजना से आगे सामुदायिक जिम्मेदारी के रूप में प्रस्तुत हुआ। 2022 में उदयपुर की सुल्तान की बावड़ी का उल्लेख इसी परंपरा को आगे बढ़ाता है। उपेक्षित हो चुकी इस ऐतिहासिक जल संरचना को देखकर कुछ युवाओं ने उसे पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया। सदियों पुरानी जल-संस्कृति और नई पीढ़ी की पहल का यह मेल ‘मन की बात’ के उस व्यापक सूत्र से जुड़ता है, जिसमें स्थानीय विरासत को वर्तमान जरूरतों से जोड़ा जाता है।

पर्यावरण से लोकभागीदारी तक
‘मन की बात’ में पर्यावरण संरक्षण का दायरा पेड़ लगाने से लेकर स्थानीय जैव-विविधता तक फैला है। राजस्थान के लिए इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण जैसलमेर है। नवंबर 2024 की 116वीं कड़ी में प्रधानमन्त्री जी ने बताया गया कि वहां महिलाओं की एक टीम ने एक घंटे में 25 हजार पौधे लगाए। एक ही स्थान पर पांच हजार से अधिक लोगों की भागीदारी का भी उल्लेख हुआ। राजस्थान की पहचान केवल रेगिस्तान और किलों से नहीं, बल्कि जल, वन्यजीव और ऊर्जा से भी जुड़ती है। गोडावण जैसे संकटग्रस्त पक्षी का संरक्षण और राज्य की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता ऐसे विषय हैं, जिनके माध्यम से राजस्थान राष्ट्रीय पर्यावरणीय विमर्श का हिस्सा बनता जा रहा है।

कृषि के क्षेत्र में भी राजस्थान की अलग पहचान उभरी। 2025 की 121वीं कड़ी में प्रधानमंत्री ने राजस्थान में लीची की खेती करने वाले जितेन्द्र सिंह रणावत का उल्लेख किया। लीची को सामान्यतः बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड से जोड़ा जाता रहा है, लेकिन राजस्थान में इसका सफल उत्पादन कृषि प्रयोग और क्षेत्रीय नवाचार का उदाहरण बनकर सामने आया।

नागरिक से राष्ट्रीय पहचान तक
‘मन की बात’ का एक और महत्वपूर्ण पहलू डिजिटल और स्थानीय उद्यमिता है। 2022 में अजमेर के सेठा सिंह रावत का उदाहरण सामने आया, जिन्होंने कोविड काल में पारंपरिक सिलाई के काम को ऑनलाइन व्यवसाय में बदलने की कोशिश की। ‘दर्जी ऑनलाइन’ के माध्यम से उनका प्रयास यह दिखाता है कि छोटे शहरों के पारंपरिक कौशल भी डिजिटल अर्थव्यवस्था से जुड़ सकते हैं। इसी तरह कार्यक्रम में किसानों, स्वयं सहायता समूहों, कारीगरों और छोटे उद्यमियों के प्रयोगों को सामने लाने से ‘वोकल फॉर लोकल’ जैसे विचारों को सामाजिक और आर्थिक संदर्भ मिला। फरवरी 2026 की 131वीं कड़ी में प्रधानमंत्री ने भारतीय निर्माताओं से खरीदारी और भारतीय उत्पादों के समर्थन की अपील भी की।

2026 : नई कहानियों का सिलसिला
2026 की 130वीं कड़ी 25 जनवरी को प्रसारित हुई। इसमें आजमगढ़ की तमसा नदी के पुनरोद्धार को जनभागीदारी का उदाहरण बताया गया। पन्ना के बीट गार्ड जगदीश प्रसाद अहिरवार द्वारा औषधीय पौधों से जुड़ी जानकारी संकलित करने के प्रयास का भी उल्लेख हुआ। 26 अप्रैल की 133वीं कड़ी और 31 मई की 134वीं कड़ी में भी विज्ञान, ऊर्जा, पर्यावरण, खेल और नागरिक पहलों से जुड़े विषय सामने आए। मई की कड़ी में भारतीय एथलेटिक्स के उभरते खिलाड़ियों गुरिंदरवीर सिंह और अनिमेष कुजूर से संवाद का उल्लेख हुआ। कार्यक्रम ने खगोल विज्ञान क्लबों और जल संरक्षण से जुड़े स्थानीय प्रयासों को भी राष्ट्रीय श्रोताओं के सामने रखा।

इस यात्रा का एक मानवीय पक्ष भी है। फरवरी 2026 की 131वीं कड़ी में केरल की दस माह की बच्ची अलिन शेरिन अब्राहम के निधन के बाद उसके माता-पिता द्वारा अंगदान के निर्णय का उल्लेख किया गया। ऐसी कहानियां कार्यक्रम के सामाजिक आयाम को रेखांकित करती हैं।

रेडियो से डिजिटल युग तक
‘मन की बात’ की यात्रा केवल रेडियो तक सीमित नहीं रही। आकाशवाणी और दूरदर्शन के साथ इसके अंश और प्रसारण डिजिटल माध्यमों पर भी उपलब्ध होते रहे हैं। इससे एक पारंपरिक संचार माध्यम सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के दौर से जुड़ता दिखाई देता है। लेकिन इस कार्यक्रम का मूल्यांकन केवल इसकी पहुंच से नहीं किया जा सकता। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जिन नागरिक पहलों की चर्चा होती है, वे दूसरे लोगों तक किस तरह पहुंचती हैं और क्या वे स्थानीय स्तर पर नए प्रयासों को प्रेरित करती हैं।

यही ‘मन की बात’ की मूल अवधारणा है—एक जगह हुआ अच्छा काम दूसरी जगह के लिए उदाहरण बने। जालौर की बावड़ी से जैसलमेर के पौधरोपण तक, अलवर के मिट्टी के दीयों से राजस्थान की लीची की खेती तक, स्थानीय अनुभव राष्ट्रीय बातचीत का हिस्सा बनते रहे हैं।
आखिरकार, राष्ट्र निर्माण केवल संसद, मंत्रालयों और सरकारी कार्यालयों में दिखाई देने वाली प्रक्रिया नहीं है। वह खेत में भी है, स्कूल में भी, तालाब के किनारे भी, खेल के मैदान में भी और उस घर में भी जहां कोई परिवार किसी दूसरे जीवन को बचाने के लिए अंगदान का निर्णय करता है।

‘मन की बात’ की यात्रा को इसी दृष्टि से देखा जा सकता है—एक ऐसा संचार मंच, जहां प्रधानमंत्री की आवाज के माध्यम से देश के अलग-अलग हिस्सों में काम कर रहे नागरिकों की कहानियां एक-दूसरे तक पहुंचती हैं। इन कहानियों का महत्व इस बात में है कि वे बताती हैं कि बदलाव हमेशा किसी बड़े संस्थान से शुरू नहीं होता। कई बार उसकी शुरुआत किसी गांव, किसी परिवार, किसी किसान, किसी युवा या किसी सामान्य नागरिक के छोटे-से प्रयास से होती है और रेडियो की वह आवाज उस छोटे प्रयास को देश के एक बड़े संवाद का हिस्सा बना देती है।

(लेखक वासुदेव देवनानी राजस्थान विधानसभा के माननीय अध्यक्ष हैं)