महेन्द्र तिवारी
भारत के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में आरक्षण एक ऐसा विषय है जिसकी तपिश कभी पूरी तरह शांत नहीं होती। यह एक ऐसा मुद्दा है जो समय-समय पर अपनी राख झटककर फिर से धधक उठता है। वर्तमान समय में एक बार फिर आरक्षण की बहस ने जोर पकड़ लिया है और यह पूरे देश में विमर्श के केंद्र में आ गया है। सड़कों से लेकर संसद तक और चौपालों से लेकर समाचार स्टूडियो तक हर जगह आरक्षण की ही चर्चा है। यह कोई अचानक उठी मांग नहीं है बल्कि इसके पीछे कई तात्कालिक और ऐतिहासिक कारण मौजूद हैं। आज के परिदृश्य में यह बहस सिर्फ इस बात पर नहीं हो रही है कि आरक्षण होना चाहिए या नहीं बल्कि विवाद का केंद्र यह बन गया है कि इसका स्वरूप कैसा हो इसके दायरे में कौन-कौन आए और इसका वास्तविक लाभ समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति तक कैसे पहुंचे। यह विषय अब केवल अधिकारों की मांग तक सीमित नहीं है बल्कि यह सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने का एक बड़ा राजनीतिक हथियार भी बन चुका है।
आजादी के बाद जब भारतीय संविधान की रचना हो रही थी तब संविधान निर्माताओं ने एक ऐसे समतामूलक समाज की कल्पना की थी जिसमें सदियों से पिछड़े और शोषित वर्गों को मुख्यधारा में लाया जा सके। उस समय आरक्षण की व्यवस्था को एक अस्थायी उपाय के रूप में देखा गया था जिसका मूल उद्देश्य सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों का उत्थान करना था। लेकिन समय बीतने के साथ यह व्यवस्था भारतीय राजनीति की एक स्थायी धुरी बन गई। मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद भारतीय राजनीति में जो भूचाल आया उसने देश की सामाजिक संरचना को गहरे तक प्रभावित किया। तब से लेकर आज तक आरक्षण की परिधि का लगातार विस्तार हुआ है और नई-नई जातियां इस छतरी के नीचे आने की जद्दोजहद कर रही हैं। आज की स्थिति यह है कि आरक्षण का मुद्दा केवल दलितों या आदिवासियों तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि अन्य पिछड़ा वर्ग और अब आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग भी इस व्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं।
हाल के दिनों में इस मुद्दे के फिर से तूल पकड़ने का सबसे बड़ा कारण जातीय जनगणना की मुखर होती मांग है। विभिन्न राजनीतिक दल और सामाजिक संगठन यह तर्क दे रहे हैं कि जब तक देश में यह स्पष्ट नहीं होगा कि किस जाति की कितनी आबादी है तब तक संसाधनों और अवसरों का न्यायसंगत वितरण संभव नहीं है। उनका मानना है कि जिसकी जितनी हिस्सेदारी उसकी उतनी भागीदारी के सिद्धांत पर ही नीतियां बननी चाहिए। यह मांग इतनी प्रबल हो चुकी है कि कई राज्य सरकारों ने अपने स्तर पर इस दिशा में कदम भी बढ़ाए हैं। जातीय जनगणना की इस मांग ने देश की राजनीति में एक नया विमर्श खड़ा कर दिया है और यह स्थापित राजनीतिक समीकरणों को चुनौती दे रहा है। इसके साथ ही कोटे के भीतर कोटे यानी आरक्षण के वर्गीकरण को लेकर भी एक नई बहस छिड़ गई है। यह तर्क दिया जा रहा है कि आरक्षण का लाभ कुछ चुनिंदा प्रभावशाली जातियों तक ही सिमट कर रह गया है और उसी वर्ग के भीतर मौजूद अति पिछड़ी जातियों को आज भी इसका समुचित लाभ नहीं मिल पा रहा है।
आरक्षण के इस मुद्दे को गरमाने में न्यायिक फैसलों और टिप्पणियों की भी बड़ी भूमिका रही है। समय-समय पर अदालतों द्वारा दिए गए निर्देशों ने इस बहस को एक नई दिशा दी है। जब भी आरक्षण की सीमा को बढ़ाने या इसके भीतर नए वर्गीकरण की बात उठती है तो कानूनी और संवैधानिक अड़चनें सामने आती हैं। यह द्वंद्व समाज में एक अजीब सी बेचैनी पैदा करता है। एक तरफ वह वर्ग है जिसे लगता है कि सदियों के वंचन के बाद उसे जो अधिकार मिले हैं वे छीने जा रहे हैं या उन्हें कमजोर किया जा रहा है। दूसरी तरफ वह वर्ग है जो यह मानता है कि लगातार बढ़ते आरक्षण के कारण योग्यता की अनदेखी हो रही है और उनके लिए अवसर कम होते जा रहे हैं। यह वैचारिक टकराव समाज को दो स्पष्ट ध्रुवों में बांटता हुआ दिखाई देता है। ऐसे में यह मुद्दा सिर्फ सरकारी नौकरियों या शिक्षा में प्रवेश का नहीं रह जाता बल्कि यह सामाजिक अस्मिता और अस्तित्व की लड़ाई बन जाता है।
आज के युवाओं के बीच आरक्षण को लेकर एक अलग ही स्तर की बहस चल रही है। एक तरफ आरक्षित वर्ग के युवा हैं जो मानते हैं कि यह उनके ऐतिहासिक अधिकारों की प्राप्ति का साधन है और सामाजिक संरचना में उनके प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने का एकमात्र जरिया है। उनका संघर्ष उन अदृश्य बाधाओं से है जो समाज ने उनके सामने खड़ी की हैं। दूसरी तरफ अनारक्षित वर्ग के युवा हैं जो भारी प्रतिस्पर्धा के इस दौर में खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। जब कोई मेधावी छात्र केवल इसलिए किसी परीक्षा या प्रवेश से वंचित रह जाता है क्योंकि वह एक विशेष वर्ग में पैदा हुआ है तो उसके भीतर पनपने वाली निराशा को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह स्थिति समाज में एक मौन दरार पैदा कर रही है जो अक्सर सोशल मीडिया पर चलने वाले अभियानों और कभी-कभी सड़कों पर होने वाले उग्र प्रदर्शनों के रूप में बाहर आती है। यह टकराव केवल युवाओं की मानसिक शांति को ही भंग नहीं कर रहा है बल्कि यह देश की उस सामूहिक ऊर्जा को भी विभाजित कर रहा है जिसे राष्ट्र निर्माण में लगना चाहिए था।
राजनीतिक दलों के लिए आरक्षण हमेशा से एक मुफीद मुद्दा रहा है। चुनाव चाहे पंचायत के हों या लोकसभा के जातियों का गणित हमेशा अहम भूमिका निभाता है। राजनीतिक पार्टियां अपने वोट बैंक को सुरक्षित करने और नए मतदाताओं को जोड़ने के लिए इस मुद्दे को बहुत सलीके से हवा देती हैं। जब विकास रोजगार और महंगाई जैसे मुद्दों पर जवाब देना मुश्किल होने लगता है तब आरक्षण और जातीय पहचान जैसे भावनात्मक मुद्दे बहुत काम आते हैं। यह एक ऐसी बिसात है जिस पर हर दल अपनी सुविधा के अनुसार गोटियां बिछाता है। आज हम देख रहे हैं कि जो दल कल तक आरक्षण के किसी विशेष स्वरूप का विरोध करते थे वे आज राजनीतिक मजबूरियों के चलते उसी का समर्थन कर रहे हैं। यह राजनीतिक अवसरवाद इस बात का परिचायक है कि आरक्षण के मुद्दे में कितनी अपार चुनावी संभावनाएं छिपी हैं। इस पूरी प्रक्रिया में मूल समस्या कहीं पीछे छूट जाती है और पूरा जोर सिर्फ तात्कालिक लाभ उठाने पर रहता है।
इस मुद्दे का एक और महत्वपूर्ण पहलू आर्थिक बनाम सामाजिक पिछड़ेपन की बहस है। एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि आरक्षण का आधार जाति न होकर आर्थिक स्थिति होनी चाहिए क्योंकि गरीबी किसी एक जाति तक सीमित नहीं है। उनका तर्क है कि एक गरीब सवर्ण को भी उसी मदद की जरूरत है जो किसी अन्य वर्ग के गरीब को है। आर्थिक आधार पर दिए गए आरक्षण ने इस बहस को और भी जटिल बना दिया है। वहीं सामाजिक न्याय के पैरोकारों का स्पष्ट मत है कि भारतीय समाज में जाति एक ऐसी कड़वी सच्चाई है जिसे नकारा नहीं जा सकता। उनका मानना है कि पिछड़ापन केवल पैसे की कमी नहीं है बल्कि यह पीढ़ियों से चले आ रहे सामाजिक बहिष्कार और हीन भावना का परिणाम है जिसे केवल आर्थिक मदद से दूर नहीं किया जा सकता।
संस्थागत नीतियों और निजीकरण के बढ़ते प्रभाव ने भी इस बहस को एक नया आयाम दे दिया है। आज सरकारी क्षेत्र लगातार सिकुड़ रहा है और ज्यादातर रोजगार निजी क्षेत्र में पैदा हो रहे हैं। ऐसे में यह सवाल जोर शोर से उठाया जा रहा है कि क्या निजी क्षेत्र में भी आरक्षण लागू किया जाना चाहिए। कुछ संगठन खुले तौर पर इसकी वकालत कर रहे हैं और उनका तर्क है कि जब देश के संसाधन सभी के हैं तो निजी क्षेत्र को भी सामाजिक न्याय के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। इसके विपरीत उद्योग जगत का मानना है कि निजी क्षेत्र पूरी तरह से योग्यता और दक्षता पर आधारित होता है और वहां आरक्षण लागू करने से वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारतीय कंपनियां पिछड़ सकती हैं। यह एक बेहद जटिल प्रश्न है जिस पर आम सहमति बनाना फिलहाल कठिन प्रतीत होता है।
हमें यह भी सोचना होगा कि क्या केवल आरक्षण ही समाज के सभी वर्गों के उत्थान का एकमात्र उपाय है। जब तक शिक्षा व्यवस्था को इतना मजबूत और सुलभ नहीं बनाया जाता कि समाज के हाशिए पर खड़ा बच्चा बिना किसी बैसाखी के प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार हो सके तब तक समानता का लक्ष्य अधूरा है। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक गुणवत्ता और समान अवसर सुनिश्चित किए बिना आरक्षण का वास्तविक लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि इसका लाभ वास्तव में उन्हें मिले जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है न कि उन लोगों को जो पहले से ही साधन संपन्न हो चुके हैं। आरक्षण एक औजार है साध्य नहीं और अंतिम लक्ष्य एक समरस और समतामूलक समाज का निर्माण ही होना चाहिए।





