बालेश्वर त्यागी
कल राहुल गांधी जी नेता प्रतिपक्ष ने संसद में अपने धुँआ धार भाषण में बिना किसी लागलपेट के सत्ता पक्ष विशेष रूप से गृह मंत्री जी पर हमला बोला. उनके भाषण से भूचाल तो नहीं आया लेकिन उनके कुछ शब्दों ने जरूर हिला दिया.पहली बार लोगों ने अनुभव किया कि अब राहुल गांधी ने संसदीय नियमों और मर्यादाओं की भी कुछ ज्यादा चिंता नहीं करते हैं. उनका पूरा भाषण कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन से निपटने के लिए सरकार के तरीकों पर ही केंद्रित रहा.परीक्षाओं में नकल रोकने के लिए लाए गए संशोधन कानून पर उन्होंने न तो कोई सुझाव दिए और न इस कानून की कमियों पर कोई चर्चा की. उन्होंने इस कानून पर केवल इतना ही कहा कि ये कानून नहीं केवल सजा बढ़ाने का प्रस्ताव है. ये बात शायद वे भूल गए कि बड़ी सजा अपराध को रोकने का एक प्रभावी कदम है.
देश में परीक्षाओं में नकल रोकने को कौन कितना गम्भीर है , अब इसकी पोल खुलने लगी है. स्वयं नीट की परीक्षाओं में नकल रोकने के लिए संसद को घेरने का प्रयास करने वाले कॉकरोच जनता पार्टी ने न तो नकल राेकने के लिए प्रधान मंत्री जी द्वारा गठित देशके प्रसिद्ध विशेषज्ञों की कमेटी पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है और न संसद में कानून संशोधन विधेयक पर कोई प्रतिक्रिया दी है.न अच्छा , न बुरा , न पर्याप्त और न अपर्याप्त कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. हां प्रतिक्रिया दी है , सर्वोच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश पर , जिसमें न्यायालय में fir की जांच जारी रखने के लिए कहा है जो प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध दर्ज की गई थीं. उन्होंने सरकार को चेतावनी दी है कि अगर समझौते के अनुसार सभी प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध दर्ज केस वापिस नहीं हुए तो फिर आंदोलन करेंगे. बस उनकी चिंता इतनी है कि प्रदर्शन में शामिल किसी के विरुद्ध भी कोई कार्यवाही न हो.न हिंसा करने वालों के विरुद्ध , न अराजकता फैलाने के प्रयास करने वालों के विरुद्ध और न असामाजिक तत्वों के विरुद्ध जिन्होंने आंदोलन के दौरान हिंसा फैलायी थी.वैसे भी कॉकरोच जनता पार्टी के किसी नेता ने ये नहीं कहा है कि उनके शांतिपूर्ण प्रदर्शन में अराजकतत्वों ने घुस कर हिंसा फैलाई है.इस तरह से वे हिंसा करने वालों के कारनामों का दायित्व अपने ऊपर लेते हैं. और उन्हें अपने आंदोलन का हिस्सा स्वीकार करते हैं.
प्रतिपक्ष के नेताओं ने भी संसद में संशोधन विधेयक पर चर्चा में भाग लेते हुए अपने भाषण को प्रदर्शनकारियों पर सरकार द्वारा बल प्रयोग को ही मुद्दा बनाने का प्रयास करते दिखे.अधिकतर विपक्षी नेताओं ने जिन्होंने चर्चा में भाग लिया उन्होंने अपने भाषण को सरकार की आलोचना तक सीमित कर लिया . नकल विरोधी कानून में और क्या जोड़ना या क्या घटाना जिससे नकल रुके ऐसे कोई सुझाव नहीं दिए.
जब उत्तर प्रदेश में नकल विरोधी कानून भाजपा सरकार द्वारा बनाया गया था , उस समय मुलायम सिंह यादव जी ने नकल विरोधी कानून के विरुद्ध बच्चों को भड़काते हुए कहा था कि देखो हाई स्कूल इंटर पास करके कोई आईएएस और आईपीएस तो बनने से रहा . हां अगर हाई स्कूल या इंटर पास कर लिया तो आप चपरासी बन सकते हो. आप चपरासी भी न बनो , इस षड्यंत्र के तहत आपको हाई स्कूल इंटर पास करने से रोकने के लिए ,ये नकल विरोधी कानून बनाया है.इतना ही नहीं घोषणा की कि अगर मेरी सरकार आई तो इस कानून को रद्द कर दूंगा. और ऐसा किया भी. जब देश के नेता परीक्षाओं में नकल को लेकर ऐसे विचारों के हों तो देश में नकल विरोध की चर्चा उनके लिए केवल एक राजनैतिक मुद्दा है.
अपनी प्रतिष्ठा के लिए भाजपा सरकार को स्वयं से परीक्षाओं में नकल रोकने की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए. ये विषय देश की प्रतिभाओं से जुड़ा है. सभी को समान अवसर मिलें ये आवश्यक है. इस दिशा में विचार करते समय एनटीए की भूमिका पर भी पुनर्विचार आवश्यक है. अगर नीट की परीक्षाओं में नकल को लेकर शिक्षा मंत्री का त्यागपत्र हो सकता है , शिक्षा सचिव विनीत जोशी को हटाया जा सकता है तो फिर एनटीए के चेयरमैन प्रदीप जोशी पर उदारता अनुचित है. नकल रोकने में अगर कोई संस्था सीधे तौर पर जिम्मेदार है तो उस संस्था का नाम एनटीए है.इसलिए एनटीए के अध्यक्ष को सबसे पहले हटाना आवश्यक होना चाहिए.





