लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए गंभीर चिंता का विषय

A matter of serious concern for democratic institutions

सौरभ वार्ष्णेय

चुनाव आयोग के फैसलों पर 14 बार लिखित आपत्ति की अनदेखी का मतलब है कि कें्रदीय चुनाव आयोग में सब कुछ सही नहीं चल रहा है। लोकतंत्र केवल चुनाव कराने की प्रक्रिया का नाम नहीं है। लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती इस बात से तय होती है कि चुनाव कितने पारदर्शी, निष्पक्ष और विश्वसनीय तरीके से कराए जाते हैं। ऐसे में चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के भीतर उठने वाली किसी भी असहमति को महज प्रशासनिक प्रक्रिया मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। मतदाता सूची से जुड़े फैसलों पर चुनाव आयोग के दो आयुक्तों की ओर से बार-बार यानी १४ बार लिखित आपत्ति दर्ज किए जाने की खबर ने इसी कारण गंभीर सवाल खड़े किए हैं। राजनीतिज्ञों को भी सोचने को मजबूर कर दिया है कि इसका हल कैसे निकाले ? वहीं ऐसी बातों से मतदाताओं के बीच भी लोकतंत्र की इस संवैधानिक संस्था के प्रति सोचना पड़ता है। यह ऐसे संस्था है कि जहां कुछ भी हो तुरंत प्रभावी कार्य हो जिससे पारदर्शिता सबके सामने आये।

देश के प्रतिष्ठित अखबार में प्रकाशित एक रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद देश में राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब दस महीनों में आयोग के विभिन्न फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराईं। बताया गया है कि इन आपत्तियों का संबंध केवल तकनीकी या प्रक्रियागत विषयों तक सीमित नहीं था, बल्कि मतदाता सूची में नाम जोडऩे और हटाने, फॉर्म-6 में बदलाव, मतदाता डेटा के केंद्रीकरण तथा चुनावी सूचना प्रौद्योगिकी प्रणाली तक अधिकारियों की पहुंच जैसे संवेदनशील मुद्दों से था। यहां मूल चिंता यह नहीं है कि किसी संवैधानिक संस्था में अलग-अलग राय क्यों सामने आईं। लोकतांत्रिक संस्थाओं में असहमति अपने आप में कोई कमजोरी नहीं है। बल्कि स्वस्थ संस्थागत व्यवस्था में अलग राय रखना और उसे रिकॉर्ड पर दर्ज करना एक आवश्यक प्रक्रिया मानी जाती है। चिंता तब पैदा होती है जब यह सवाल उठे कि क्या उन आपत्तियों पर पर्याप्त विचार किया गया और क्या निर्णय प्रक्रिया वास्तव में सभी संबंधित सदस्यों की भागीदारी से आगे बढ़ी?

चुनाव आयोग तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी इसके सदस्य हैं। यदि दो सदस्यों की ओर से महत्वपूर्ण मामलों में बार-बार लिखित आपत्तियां दर्ज की गई हैं, तो इन आपत्तियों की प्रकृति, उनका निस्तारण और अंतिम निर्णय तक पहुंचने की प्रक्रिया सार्वजनिक विमर्श का विषय बनना स्वाभाविक है। विशेष रूप से मतदाता सूची का मामला अत्यंत संवेदनशील है। मतदाता सूची केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं होती। यही वह आधार है जो तय करती है कि चुनाव के दिन कौन नागरिक अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकेगा। इसलिए मतदाता सूची में किसी नाम का जुडऩा, हटना या बहाल होना सीधे तौर पर नागरिक के लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ा प्रश्न है।

फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर सामने आई आपत्ति इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है। फॉर्म-6 नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला वैधानिक फॉर्म है। रिपोर्ट के अनुसार, विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान इसमें ऐसा घोषणा-पत्र जोड़ा गया, जिसमें आवेदक से यह बताने को कहा गया कि उसका या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली मतदाता सूची में था या नहीं। यदि किसी प्रक्रिया में इस तरह का महत्वपूर्ण बदलाव किया जा रहा हो और उससे पहले आयोग के ही दो सदस्यों की आपत्ति सामने आई हो, तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि उस आपत्ति पर क्या विचार हुआ और बदलाव का अंतिम आधार क्या था।

मामला केवल कागजी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। मतदाता सूची के डिजिटल प्रबंधन को लेकर भी सवाल उठे हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कुछ राज्यों में स्थानीय स्तर के निर्वाचन अधिकारियों की मतदाता डेटा से जुड़े फैसलों को सिस्टम में दर्ज करने की क्षमता प्रभावित हुई। पश्चिम बंगाल में कुछ ऐसे मामलों का भी उल्लेख है, जहां दस्तावेजों की जांच के बाद लोग पात्र पाए गए, लेकिन सॉफ्टवेयर में उनके नाम जोडऩे की प्रक्रिया को लेकर तकनीकी बाधाएं सामने आईं। गोवा में 97 पात्र मतदाताओं का मामला भी इसी तरह की तकनीकी समस्या से जुड़ा बताया गया है।

यह स्थिति एक बुनियादी सवाल खड़ा करती है कि चुनावी प्रक्रिया में अंतिम निर्णय किसका होगा, मैदानी स्तर पर काम कर रहा निर्वाचन अधिकारी या केंद्रीकृत डिजिटल सिस्टम ? तकनीक चुनावी प्रक्रिया को तेज और पारदर्शी बनाने का माध्यम हो सकती है, लेकिन वह लोकतांत्रिक निर्णय का विकल्प नहीं बन सकती। किसी तकनीकी प्रणाली में हुई त्रुटि के कारण यदि पात्र मतदाता का नाम सूची में शामिल नहीं हो पाता, तो इसका सीधा असर उसके मताधिकार पर पड़ सकता है। हालांकि, इस पूरे विवाद का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। चुनाव आयोग ने रिपोर्ट में बताए गए कथित आंतरिक मतभेद के निष्कर्ष को खारिज किया है। आयोग का कहना है कि सदस्यों की ओर से नोटिंग, टिप्पणियां, सुझाव और अलग-अलग राय देना सामान्य संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग के अनुसार, अनुच्छेद 324, वैधानिक नियमों और स्थापित प्रक्रियाओं के तहत विचार-विमर्श के बाद अंतिम फैसले लिए जाते हैं और एसआईआर सहित महत्वपूर्ण निर्णय तीनों आयुक्तों की मंजूरी से हुए हैं। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि लिखित आपत्तियां अपने आप में आयोग के भीतर किसी निर्णायक विभाजन का प्रमाण हैं। लेकिन यह भी उतना ही सही है कि ऐसी आपत्तियों को पूरी तरह सामान्य प्रशासनिक टिप्पणी कहकर सार्वजनिक चिंता को समाप्त नहीं किया जा सकता। यदि 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज हुई हैं, तो लोकतांत्रिक पारदर्शिता की मांग यही होगी कि कम से कम यह स्पष्ट किया जाए कि किन मुद्दों पर असहमति थी, उन पर क्या विचार हुआ और अंतिम निर्णय किस प्रक्रिया के तहत लिया गया।

विपक्ष ने इन घटनाओं को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। कांग्रेस ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सुप्रीम कोर्ट से स्वत: संज्ञान लेने की मांग की है, जबकि राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कार्रवाई और विशेष गहन पुनरीक्षण रोकने की मांग उठाई है। राहुल गांधी ने भी मतदाता सूची से जुड़े मुद्दे को लोकतांत्रिक अधिकारों और संविधान से जोड़ा है। इन राजनीतिक दावों की अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि है, इसलिए इनका मूल्यांकन स्वतंत्र तथ्यों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर ही किया जाना चाहिए। असल चुनौती किसी एक व्यक्ति या राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि चुनावी संस्थाओं पर जनता के भरोसे की है। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता लोकतंत्र की बुनियादी पूंजी है। इसलिए आयोग के भीतर असहमति सामने आए तो उसका समाधान अधिक पारदर्शिता, स्पष्ट जवाबदेही और सार्वजनिक स्पष्टीकरण से होना चाहिए, न कि केवल विवाद को खारिज कर देने से।
जरूरत इस बात की है कि मतदाता सूची से जुड़े सभी महत्वपूर्ण बदलावों का स्पष्ट ऑडिट ट्रेल उपलब्ध हो। किस अधिकारी ने क्या निर्णय लिया, किस आधार पर लिया, किस स्तर पर उसे बदला गया और तकनीकी प्रणाली ने उस निर्णय को कैसे दर्ज किया। इन सवालों के जवाब लोकतांत्रिक व्यवस्था में अस्पष्ट नहीं रहने चाहिए। साथ ही, आयोग के भीतर दर्ज असहमति और उसके निस्तारण की संस्थागत प्रक्रिया भी स्पष्ट होनी चाहिए।

चुनाव लोकतंत्र का उत्सव तभी बन सकता है, जब हर पात्र नागरिक को यह भरोसा हो कि उसका नाम मतदाता सूची में सुरक्षित है और चुनावी प्रक्रिया किसी अदृश्य तकनीकी या प्रशासनिक हस्तक्षेप से प्रभावित नहीं होगी। चुनाव आयोग के दो सदस्यों की 14 लिखित आपत्तियों का मामला इसी भरोसे की कसौटी है। असहमति लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं होती; असहमति को सुनने और उसका पारदर्शी समाधान न करने की व्यवस्था जरूर लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए गंभीर चिंता का विषय बन सकती है।