हरित ऊर्जा की नई राह पर भारत

India on a New Path to Green Energy

ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-III से 135 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा के संचरण को मिलेगी गति, 50 जी डब्लु एच बैटरी भंडारण से मजबूत होगा देश का बिजली ग्रिड

विनोद सिंह ‘तकियावाला’

भारत की ऊर्जा यात्रा अब केवल बिजली उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं रह गई है,बल्कि देश ऐसी ऊर्जा व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है जिसमें स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन, उसका भंडारण और देश के विभिन्न हिस्सों तक निर्बाध संचरण एक साथ मजबूत हो। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-III योजना को मंजूरी इसी व्यापक बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह योजना राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के भीतर इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम को मजबूत करने के साथ 135 गीगावॉट तक नवीकरणीय ऊर्जा को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने की क्षमता विकसित करेगी।भारत में सौर और पवन ऊर्जा की संभावनाएँ लगातार बढ़ रही हैं।देश के अनेक राज्यों में बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएँ स्थापित हो रही हैं, लेकिन इस ऊर्जा का वास्तविक लाभ तभी संभव है जब इसे मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क के माध्यम से उन क्षेत्रों तक पहुँचाया जा सके जहाँ इसकी आवश्यकता है। ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-III इसी चुनौती का समाधान प्रस्तुत करता है। राज्यों के भीतर ट्रांसमिशन व्यवस्था को सुदृढ़ करने से नवीकरणीय ऊर्जा के ग्रिड एकीकरण और पावर इवैक्यूएशन को गति मिलेगी तथा स्वच्छ ऊर्जा को बिजली की मुख्यधारा में अधिक प्रभावी ढंग से शामिल किया जा सकेगा।

इस योजना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में 50 गीगावॉट-घंटे की बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम क्षमता का प्रावधान है।नवीकरणीय ऊर्जा की सबसे बड़ी चुनौती उसकी प्रकृति से जुड़ी है। सूर्य की रोशनी हर समय उपलब्ध नहीं होती और हवा की गति भी समान नहीं रहती। ऐसे में सौर और पवन ऊर्जा के उत्पादन में उतार-चढ़ाव स्वाभाविक है। बैटरी आधारित ऊर्जा भंडारण इस चुनौती का महत्वपूर्ण समाधान बन सकता है।जब नवीकरणीय ऊर्जा का उत्पादन अधिक होगा, तब अतिरिक्त बिजली को संग्रहित किया जा सकेगा और आवश्यकता के समय उसका उपयोग किया जा सकेगा। इससे ग्रिड में लचीलापन आएगा और बिजली की आपूर्ति को अधिक स्थिर बनाने में मदद मिलेगी।

बीईएसएस की 50 जी डब्लू एच क्षमता केवल ऊर्जा भंडारण का आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह भारत की बदलती ऊर्जा व्यवस्था में एक नए युग की शुरुआत का संकेत भी है। पीक आवर में बिजली की बढ़ती मांग, ग्रिड में संभावित कंजेशन और नवीकरणीय ऊर्जा की अनियमित उपलब्धता जैसी चुनौतियों से निपटने में यह व्यवस्था उपयोगी होगी। विशेष रूप से उस समय जब सौर ऊर्जा उपलब्ध नहीं होती, संग्रहीत ऊर्जा मांग को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-III को वित्तीय वर्ष 2032-33 तक स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसकी कुल परियोजना लागत 1,86,405 करोड़ रुपये निर्धारित की गई है। इसमें 1,36,378 करोड़ रुपये इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम के विकास के लिए और लगभग 50,000 करोड़ रुपये 50 GWh बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम के लिए निर्धारित हैं। योजना के अंतर्गत कुल 54,082 करोड़ रुपये की केंद्रीय वित्तीय सहायता का प्रावधान है। यह सहायता इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन शुल्क को कम करने में मदद करेगी, जिसका सीधा संबंध बिजली की लागत से है। इसका अंतिम लाभ बिजली उपभोक्ताओं तक पहुँचने की संभावना है।इस योजना की कार्यान्वयन व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है।इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम के अंतर्गत आने वाली ग्रीनफील्ड परियोजनाओं को टैरिफ आधारित प्रतिस्पर्धी बोली के माध्यम से लागू किया जाएगा। वहीं ब्राउनफील्ड अपग्रेडेशन और नेटवर्क को मजबूत करने से जुड़े कार्य कॉस्ट प्लस बेसिस पर किए जाएंगे।राज्य ट्रांसमिशन यूटिलिटीज समग्र कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में भूमिका निभाएँगी,जबकि ट्रांसमिशन सर्विस प्रोवाइडर्स बिल्ड-ओन- ऑपरेट-मेनटेन मॉडल के तहत प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया में भाग लेंगे। इससे परियोजनाओं के निर्माण के साथ उनके दीर्घकालिक संचालन और रखरखाव की व्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-III का महत्व केवल बिजली क्षेत्र तक सीमित नहीं है। इसके प्रभाव ऊर्जा, विनिर्माण और निर्माण क्षेत्र तक पहुँचेंगे। बड़े पैमाने पर ट्रांसमिशन नेटवर्क के निर्माण से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे। बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम के निर्माण और उपयोग से घरेलू ऊर्जा भंडारण उद्योग को प्रोत्साहन मिलेगा।इसके साथ ही संचालन, रखरखाव और आधुनिक ग्रिड प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में दीर्घकालिक कुशल रोजगार की संभावनाएँ बढ़ेंगी।यह योजना भारत के दीर्घकालिक ऊर्जा लक्ष्यों से भी जुड़ी हुई है। 2035 तक 900 गीगावॉट स्थापित गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने के लिए केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। उसके साथ मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क और पर्याप्त ऊर्जा भंडारण क्षमता भी आवश्यक होगी। ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-III इन दोनों आवश्यकताओं को एक साथ संबोधित करता है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।भारत आज एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है जहाँ ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरणीय सुरक्षा को अलग- अलग नहीं देखा जा सकता। बढ़ती अर्थव्यवस्था, तेजी से बढ़ता औद्योगिक उत्पादन, शहरीकरण और डिजिटल अर्थव्यवस्था बिजली की मांग को लगातार बढ़ा रहे हैं। ऐसे में देश को ऐसी ऊर्जा व्यवस्था चाहिए जो पर्याप्त होने के साथ स्वच्छ, विश्वसनीय और भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप हो। नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के साथ मजबूत ट्रांसमिशन और ऊर्जा भंडारण इसी दिशा में आधारभूत आवश्यकता बन चुके हैं।ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-III इसी बदलती आवश्यकता के अनुरूप भारत के ऊर्जा ढाँचे को नई दिशा देता दिखाई देता है। 135 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा के संचरण की क्षमता, 50 जी डब्लु एच ऊर्जा भंडारण और 1,86,405 करोड़ रुपये का कुल निवेश देश की ऊर्जा संरचना के व्यापक विस्तार का संकेत है। इसका उद्देश्य केवल आज की बिजली जरूरतों को पूरा करना नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों के लिए ऐसी व्यवस्था तैयार करना है जिसमें स्वच्छ ऊर्जा देश की आर्थिक प्रगति का मजबूत आधार बने।ऊर्जा आत्मनिर्भरता, हरित विकास और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में भारत की यात्रा अब उत्पादन से आगे बढ़कर संचरण और भंडारण के चरण में पहुँच रही है। ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-III इसी परिवर्तन की महत्वपूर्ण कड़ी है। आने वाले समय में जब देश की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा मांग दोनों तेजी से विस्तार करेंगी, तब मजबूत ग्रिड, पर्याप्त भंडारण और व्यापक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता भारत के विकास की नई ऊर्जा रीढ़ बन सकती है। यही वह आधार है, जिस पर स्वच्छ ऊर्जा से समर्थ, आत्मनिर्भर और पर्यावरण-संतुलित भारत की तस्वीर आकार ले रही है।