अशफाक उल्ला खां: वतन की मिट्टी को कफन में पाने की आरजू रखने वाला अमर क्रांतिकारी

Ashfaq Ullah Khan: Immortal revolutionary who aspired to return to the soil of his country in a shroud.

अशफाक उल्ला खां केवल काकोरी कांड के महानायक नहीं बल्कि अदम्य साहस, अटूट राष्ट्रभक्ति और हिंदू-मुस्लिम एकता के अमर प्रतीक थे। राम प्रसाद बिस्मिल के साथ उनकी दोस्ती ने साबित किया कि वतन का प्रेम हर मजहबी दीवार से ऊंचा है। महज 27 वर्ष की उम्र में फांसी का फंदा चूमने वाले इस वीर शहीद का बलिदान सदैव राष्ट्र को प्रेरित करता रहेगा। 22 अक्तूबर को अशफाक उल्ला खां की जयंती है।

योगेश कुमार गोयल

‘कुछ आरजू नहीं है, है आरजू तो ये है, रख दे कोई जरा-सी खाक-ए-वतन कफन में।’

ये पंक्तियां उस अमर क्रांतिकारी की देशभक्ति, त्याग और मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम का सजीव प्रमाण हैं, जिसने हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लिया था लेकिन अंग्रेजी हुकूमत के सामने घुटने नहीं टेके। वह महान क्रांतिकारी थे अशफाक उल्ला खां, जिनके लिए भारत की आजादी किसी राजनीतिक आकांक्षा का नाम नहीं बल्कि जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य थी। उनका संपूर्ण जीवन इस बात का प्रमाण है कि जब राष्ट्र की स्वतंत्रता का प्रश्न सामने हो, तब धर्म, जाति और मजहब की दीवारें स्वतः छोटी पड़ जाती हैं। 22 अक्तूबर को उनकी जयंती पर उन्हें स्मरण करना उस राष्ट्रीय चेतना को पुनर्जीवित करना है, जिसने भारत की स्वतंत्रता की नींव अपने रक्त से सींची थी।

22 अक्तूबर 1900 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में जन्मे अशफाक उल्ला खां बचपन से ही साहसी, स्वाभिमानी और स्वतंत्र विचारों वाले थे। उनका परिवार सरकारी नौकरियों से जुड़ा था लेकिन अशफाक का मन अंग्रेजी शासन की नौकरी करने के बजाय देश की गुलामी की बेड़ियां काटने में लगता था। उन्हें घुड़सवारी, तैराकी और निशानेबाजी का शौक था। साहित्य के प्रति भी उनकी गहरी रुचि थी। वे उर्दू में कविताएं लिखते थे और अपनी रचनाओं में ‘हसरत’ उपनाम का प्रयोग करते थे। उनकी शायरी में प्रेम, मानवीय संवेदना और वतन के प्रति समर्पण का अनूठा संगम दिखाई देता है। उनके लिए कलम और क्रांति, दोनों ही देशसेवा के माध्यम थे। अशफाक उल्ला खां के जीवन का सबसे प्रेरणादायक अध्याय पंडित राम प्रसाद बिस्मिल के साथ उनकी मित्रता है। दोनों की विचारधाराओं और धार्मिक पृष्ठभूमियों में अंतर था लेकिन मातृभूमि के प्रति प्रेम ने उन्हें एक सूत्र में बांध दिया था। शाहजहांपुर में विकसित हुई उनकी मित्रता भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हिंदू-मुस्लिम एकता की अविस्मरणीय मिसाल बन गई। दोनों क्रांतिकारी देश को स्वतंत्र कराने के लिए योजनाएं बनाते, युवाओं को प्रेरित करते और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष की रणनीति तैयार करते थे। बिस्मिल और अशफाक का संबंध इस सत्य को उजागर करता है कि राष्ट्रभक्ति किसी धर्म की बपौती नहीं बल्कि साझा राष्ट्रीय भावना है।

महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस लिए जाने के बाद अनेक युवा क्रांतिकारियों की तरह अशफाक उल्ला खां भी निराश हुए। उन्हें महसूस हुआ कि केवल अहिंसक जनांदोलन से तत्काल स्वतंत्रता प्राप्त करना कठिन हो सकता है। वे राम प्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद और अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन को मजबूत करने के पक्षधर बने। इसी क्रम में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के क्रांतिकारियों ने अपने संगठन को मजबूत करने तथा हथियारों और क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाने की योजना बनाई।

9 अगस्त 1925 का काकोरी कांड भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का निर्णायक अध्याय बन गया। उस दिन सहारनपुर-लखनऊ रेलगाड़ी से ले जाए जा रहे ब्रिटिश सरकार के खजाने को लखनऊ के निकट काकोरी में क्रांतिकारियों ने लूट लिया। इस कार्रवाई का उद्देश्य निजी संपत्ति हथियाना नहीं बल्कि औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष के लिए संसाधन जुटाना और ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देना था। अशफाक उल्ला खां ने इस क्रांतिकारी अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस घटना ने अंग्रेजी हुकूमत को झकझोर दिया और पूरे देश का ध्यान क्रांतिकारियों की ओर आकर्षित किया।

काकोरी कांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने व्यापक धरपकड़ शुरू कर दी। अनेक क्रांतिकारियों को गिरफ्तार किया गया और उनके विरुद्ध मुकद्दमा चलाया गया। अशफाक उल्ला खां तत्काल पुलिस के हाथ नहीं आए। वे कुछ समय तक गिरफ्तारी से बचते रहे और देश से बाहर जाकर तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने तथा क्रांतिकारी गतिविधियों को आगे बढ़ाने की संभावनाएं भी तलाशते रहे। अंततः दिल्ली में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। अंग्रेजी शासन ने उन पर मुकद्दमा चलाया और उन्हें मृत्युदंड सुनाया। फैजाबाद जेल में 19 दिसंबर 1927 को अशफाक उल्ला खां को फांसी दे दी गई। उस समय उनकी आयु महज 27 वर्ष थी। इसी दिन राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल और ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद में फांसी दी गई थी। राजेंद्रनाथ लाहिड़ी को इससे पहले 17 दिसंबर 1927 को गोंडा जेल में फांसी दी गई थी। इन बलिदानों ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा दी और देश के युवाओं के हृदय में आजादी की लौ और प्रखर कर दी।

फांसी से पहले अशफाक उल्ला खां ने जिस निर्भीकता और आत्मविश्वास का परिचय दिया, वह उनकी अडिग राष्ट्रनिष्ठा का प्रमाण है। अपनी मां के प्रति उनका स्नेह और देश के प्रति उनका समर्पण एक-दूसरे के विरोधी नहीं थे। वे जानते थे कि उनका बलिदान परिवार के लिए असहनीय पीड़ा लेकर आएगा लेकिन मातृभूमि की स्वतंत्रता उनके लिए सर्वोपरि थी। उनका जीवन बताता है कि सच्चा देशभक्त अपने निजी सुखों से ऊपर उठकर राष्ट्र के भविष्य के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर सकता है। आज जब समाज को धार्मिक सद्भाव, आपसी विश्वास और राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता है, अशफाक उल्ला खां का जीवन विशेष प्रासंगिकता रखता है। उनकी और बिस्मिल की मित्रता हमें सिखाती है कि देश को जोड़ने वाली सबसे बड़ी शक्ति साझा उद्देश्य और परस्पर सम्मान है। स्वतंत्रता संग्राम के इन महानायकों ने अपने आचरण से सिद्ध किया कि भारत की आत्मा उसकी विविधता में निहित एकता है।

अशफाक उल्ला खां की जयंती पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके बलिदान को केवल स्मरण दिवस तक सीमित न रखें बल्कि उनके आदर्शों को अपने व्यवहार में उतारें। नई पीढ़ी को उनके साहस, साहित्यिक संवेदनशीलता, सांप्रदायिक सौहार्द और राष्ट्रसमर्पण से परिचित कराना समय की आवश्यकता है। जिस वीर ने फांसी के फंदे पर झूलने से पहले अपने कफन में वतन की मिट्टी पाने की आरजू व्यक्त की थी, उसकी स्मृति भारत की राष्ट्रीय चेतना में सदैव जीवित रहेगी। अशफाक उल्ला खां का बलिदान हमें याद दिलाता रहेगा कि आजादी की कीमत केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं होती, वह उन अमर शहीदों के रक्त, सपनों और संकल्पों में बसती है, जिन्होंने राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।