प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
न्याय की धीमी रफ्तार लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना है। जब इंसाफ की प्रतीक्षा में पीढ़ियाँ गुजर जाएँ, तो अधिकार महज आश्वासन बन जाते हैं। भोपाल मध्यप्रदेश में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नए आपराधिक कानूनों के पूर्ण क्रियान्वयन के बाद एफआईआर से सुप्रीम कोर्ट तक आपराधिक मामलों के निपटारे के लिए तीन वर्ष का लक्ष्य रखा है। उन्होंने पूर्ण क्रियान्वयन में करीब डेढ़ साल और लगने की बात कही। भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के जरिए औपनिवेशिक कानूनी विरासत बदलने की पहल हुई है। ये कानून 1 जुलाई 2024 से लागू हैं। लेकिन कानून बदलने से न्याय की रफ्तार बदलने की गारंटी नहीं है। सवाल है कि क्या नई संहिताएँ उस जड़ व्यवस्था को बदल पाएँगी, जहाँ तारीखें बढ़ती हैं, मुकदमे खिंचते हैं और इंसाफ की प्रतीक्षा अंतहीन रहती है?
लंबित मुकदमों का अंबार इस लक्ष्य की सबसे बड़ी बाधा है। अधीनस्थ न्यायालयों में लगभग पाँच करोड़, उच्च न्यायालयों में करीब 63-64 लाख और सुप्रीम कोर्ट में करीब नब्बे हजार मामले लंबित हैं। हजारों न्यायिक पद रिक्त हैं। पुलिस विवेचना, अभियोजन, फॉरेंसिक जाँच और कारागार व्यवस्था की खामियाँ भी देरी बढ़ाती हैं। नए कानूनों में चार्जशीट सहित विभिन्न प्रक्रियाओं की समयसीमा तय हुई है और कुछ राज्यों में अनुपालन तेज हुआ है। लेकिन एक चरण की तेजी पूरी न्यायिक प्रक्रिया में तेजी का प्रमाण नहीं है। पुलिस से अदालत तक पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षित कर्मचारी और जवाबदेही के बिना तीन वर्ष का लक्ष्य हासिल करना कठिन है।
न्याय का नया प्रतिमान दंड नहीं, नागरिक को समयबद्ध न्याय देने में निहित है। अमित शाह ने नए कानूनों का मूल मंत्र सजा नहीं, न्याय बताया है। इसका आशय है कि पीड़ित को समय पर राहत मिले, निर्दोष अभियोजन से बचे और अभियुक्त को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार मिले। फैसले की लंबी प्रतीक्षा पीड़ित से न्याय के साथ सामान्य जीवन भी छीन सकती है, जबकि जमानत की आस में बंद विचाराधीन कैदी के लिए देरी ही सजा बन जाती है। लेकिन शीघ्र न्याय का अर्थ जल्दबाजी में दंड नहीं है। साक्ष्यों की विश्वसनीयता, गवाहों की सुरक्षा और अभियुक्त के बचाव का अधिकार भी अनिवार्य हैं। जल्दबाजी फैसले की गति बढ़ा सकती है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता घटा सकती है।
औपनिवेशिक कानूनों से आधुनिक न्याय व्यवस्था की ओर संक्रमण नए कानूनों का अहम पक्ष है। ब्रिटिशकालीन कानून औपनिवेशिक प्रशासन की जरूरतों पर केंद्रित थे, जबकि नई संहिताएँ नागरिक-केंद्रित न्याय और आधुनिक अपराधों की चुनौतियों को संबोधित करती हैं। महिला-बाल अपराधों, मॉब लिंचिंग और आतंकवाद से जुड़े प्रावधान इस बदलाव के प्रमुख आयाम हैं। डिजिटल साक्ष्य, वीडियो रिकॉर्डिंग और इलेक्ट्रॉनिक प्रक्रियाएँ विवेचना व सुनवाई को पारदर्शी बना सकती हैं। करीब सोलह लाख कर्मियों का प्रशिक्षण इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन तकनीक की प्रभावशीलता दक्ष पुलिसकर्मियों, प्रशिक्षित न्यायिक कर्मचारियों और ग्रामीण क्षेत्रों में पर्याप्त डिजिटल सुविधाओं पर निर्भर है। इसलिए तकनीकी बदलाव के साथ क्षेत्रीय विषमताएँ दूर करना भी जरूरी है।
तीन वर्षों के लक्ष्य की असली कसौटी आम नागरिक की उम्मीदें हैं। गरीब अभियुक्त को जमानत में देरी, गवाहों का बार-बार अदालत पहुँचना और पीड़ित परिवारों का वर्षों तक मुकदमे लड़ना न्याय व्यवस्था की जमीनी चुनौतियाँ हैं। न्याय तभी सार्थक है, जब वह सुलभ हो, केवल फैसला सुनाने तक सीमित न रहे। इसके लिए जिला और अधीनस्थ न्यायालयों को मजबूत करना प्राथमिकता होनी चाहिए, क्योंकि आम नागरिक का सबसे अधिक सामना इन्हीं से होता है। रिक्त न्यायिक पद भरना, बुनियादी सुविधाएँ बढ़ाना, कानूनी सहायता देना और अभियोजन को सक्षम बनाना अनिवार्य है। अन्यथा तीन वर्ष का आश्वासन भी उन वंचितों के लिए एक और प्रतीक्षा बन जाएगा, जिनके पास न्याय पाने के पर्याप्त आर्थिक और सामाजिक साधन नहीं हैं।
गति और निष्पक्षता का संतुलन न्यायिक सुधार की सबसे अहम शर्त है। हर मुकदमे की प्रकृति, साक्ष्यों की जटिलता और गवाहों की परिस्थितियाँ अलग-अलग होती हैं। ऐसे में समयसीमा का अनावश्यक दबाव सुनवाई की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है। साक्ष्यों की अधूरी जाँच या अभियुक्त को बचाव का पर्याप्त अवसर न मिलना शीघ्र न्याय को अन्याय में बदल सकता है। इसलिए न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायाधीशों का विवेक पूरी तरह सुरक्षित रहना जरूरी है। तीन वर्षों का लक्ष्य सुधार की प्रेरणा बने, न कि निष्पक्षता से समझौते का दबाव। तेज और निष्पक्ष न्याय के बीच उचित संतुलन से ही दोनों संवैधानिक अधिकार सुनिश्चित हो सकते हैं।
क्रियान्वयन की असली परीक्षा कानूनों के प्रावधानों को जमीन पर प्रभावी ढंग से उतारने में है। डिजिटल रिकॉर्ड, वीडियो साक्ष्य और पुलिस-अदालत के बीच बेहतर समन्वय तभी कारगर होंगे, जब फॉरेंसिक प्रयोगशालाएँ सक्षम हों, विवेचना समय पर पूरी हो और अभियोजन प्रभावी बने। सरकार को नियमित सार्वजनिक आँकड़ों के जरिए बताना चाहिए कि कितने मुकदमे तय समयसीमा में निपटे, कितने लंबित हैं और किन चरणों में देरी हो रही है। इससे प्रगति की स्वतंत्र समीक्षा और जवाबदेही सुनिश्चित होगी। सुधार की जिम्मेदारी केवल न्यायपालिका की नहीं, बल्कि पुलिस, अभियोजन, प्रशासन और सरकार की भी है। पर्याप्त बजट, प्रशिक्षित मानवबल और निरंतर निगरानी के बिना नई संहिताओं से अपेक्षित बदलाव अधूरे रहेंगे।
तीन वर्षों में न्याय का लक्ष्य केवल समयसीमा तय करने का विषय नहीं, बल्कि दशकों से जड़ जमा चुकी न्यायिक देरी से निर्णायक मुक्ति की कसौटी है। नए कानूनों की सार्थकता तभी सिद्ध होगी, जब उनका प्रभाव अदालतों की चारदीवारी से निकलकर आम नागरिक के जीवन में दिखाई दे। न्याय की गति ऐसी हो कि पीड़ित का भरोसा न टूटे और निष्पक्षता ऐसी कि निर्दोष का अधिकार न कुचले। अंततः न्याय व्यवस्था की सफलता इस बात में नहीं कि कितने मुकदमों का निपटारा हुआ, बल्कि इसमें है कि कितने नागरिकों को समय रहते इंसाफ मिला। क्योंकि न्याय जब तक समय पर नहीं मिलता, तब तक कानून का शासन अपने पूर्ण अर्थों में स्थापित नहीं हो सकता।





