अमित कुमार अम्बष्ट ‘ आमिली ‘
हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा आयोजित जंतर-मंतर का आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर NEET पेपर लीक, पेपर लीक के कारण आत्महत्या करने वाले छात्रों को मुआवजा, पूर्व शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, परीक्षा प्रणाली में सुधार, प्रश्नपत्र लीक की घटनाओं पर जवाबदेही और शिक्षा व्यवस्था में व्यापक बदलाव की मांग को लेकर शुरू हुआ। लेकिन उस आंदोलन में प्रधानमंत्री और उनकी मां को गाली, देश की सेना को अपशब्द, सीआरपीएफ एवं पुलिस के जवानों के साथ दुर्व्यवहार, मीडिया के साथ अभद्रता, पत्थरबाजी , अपराधियों और टुकड़े-टुकड़े गैंग के साथ ने न सिर्फ देश अपितु विदेशों में भी भारत का सर शर्म से झुका दिया, जिस युवाओं और जेन -जीमको प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सदैव देश का भविष्य बताते रहे हैं, उनका अचार – विचार बिल्कुल शर्मिंदा करने वाला था, हालांकि आंदोलन के कई सप्ताह तक चलने के बाद अंततः केंद्र सरकार तथा आंदोलनकारियों के बीच वार्ता हुई। इसके बाद सरकार ने सभी मांगों को मान लिया ।
जंतर-मंतर के उस आंदोलन के बाद एक और छात्र आंदोलन चर्चा के केंद्र में है । झारखंड की राजधानी रांची का जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम इन दिनों केवल एक धरना स्थल नहीं, बल्कि लाखों प्रतियोगी छात्रों की उम्मीदों का प्रतीक बन गया है। जुलाई 2026 के अंतिम सप्ताह में शुरू हुआ यह अनिश्चितकालीन आंदोलन देखते-ही-देखते पूरे राज्य के युवाओं की आवाज बन गया। प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, भर्ती प्रक्रियाओं में लगातार हो रही देरी, रिक्त सरकारी पदों पर नियुक्ति नहीं होने और पारदर्शिता की मांग को लेकर हजारों छात्र रांची पहुंचे और अनिश्चितकालीन सत्याग्रह आरंभ किया। शुरुआत में यह आंदोलन कुछ छात्र संगठनों और प्रतियोगी अभ्यर्थियों तक सीमित था, लेकिन सोशल मीडिया के माध्यम से इसकी गूंज पूरे झारखंड में फैल गई। देखते ही देखते राज्य के लगभग सभी जिलों से छात्र इसमें शामिल होने लगे। खास बात यह रही कि आंदोलन के दौरान छात्रों ने स्पष्ट किया कि उनका संघर्ष किसी सरकार या राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं, बल्कि एक ऐसी भर्ती व्यवस्था के पक्ष में है, जिस पर युवाओं का भरोसा कायम रह सके। उनकी प्रमुख मांगों में झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की भर्ती प्रक्रियाओं में पूर्ण पारदर्शिता, कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच, दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई, समयबद्ध भर्ती कैलेंडर और रिक्त सरकारी पदों पर शीघ्र नियुक्ति शामिल रही।
जैसे-जैसे आंदोलन आगे बढ़ा, उसका स्वर और व्यापक होता गया। छात्र नेताओं ने भूख हड़ताल शुरू की, विभिन्न सामाजिक संगठनों, शिक्षकों और अभिभावकों ने समर्थन दिया तथा देश के अन्य राज्यों के प्रतियोगी छात्रों ने भी एकजुटता व्यक्त की। आंदोलनकारियों ने यह भी घोषणा की कि यदि उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया गया तो वे तिरंगा मार्च निकालेंगे और विधानसभा का शांतिपूर्ण घेराव करेंगे। इस घटनाक्रम ने झारखंड छात्र आंदोलन को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया।
वास्तव में यह आंदोलन किसी एक परीक्षा या एक आयोग तक सीमित नहीं है। यह उन लाखों युवाओं की पीड़ा का प्रतीक है जो वर्षों से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन भर्ती प्रक्रियाओं की अनिश्चितता के कारण उनका भविष्य अधर में लटका हुआ है। कई अभ्यर्थियों की आयु सीमा समाप्त होने की स्थिति में पहुँच गई है, अनेक परिवार आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं और युवाओं का व्यवस्था पर विश्वास लगातार कमजोर हुआ है। ऐसे में झारखंड का छात्र आंदोलन केवल विरोध का आंदोलन नहीं, बल्कि व्यवस्था में विश्वास बहाल करने का आंदोलन बन गया है।
भारतीय लोकतंत्र में छात्र आंदोलनों का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1974 के बिहार छात्र आंदोलन, असम आंदोलन और शिक्षा सुधारों से जुड़े अनेक आंदोलनों तक, युवाओं ने समय-समय पर समाज और राजनीति को नई दिशा दी है। झारखंड का वर्तमान छात्र आंदोलन भी उसी परंपरा का विस्तार है। अंतर केवल इतना है कि आज का छात्र सोशल मीडिया, डिजिटल संवाद और संवैधानिक लोकतांत्रिक तरीकों के माध्यम से अपनी बात अधिक प्रभावी ढंग से रख रहा है।
यह आंदोलन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीय पहचान से ऊपर उठकर छात्र एक साझा उद्देश्य के लिए एकजुट हुए हैं। उनकी मांग केवल रोजगार नहीं, बल्कि पारदर्शी अवसर है। वे चाहते हैं कि प्रतियोगिता समान हो, परीक्षा निष्पक्ष हो और चयन योग्यता के आधार पर हो। यह मांग केवल छात्रों की नहीं, बल्कि एक स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था की भी आवश्यकता है। ऐसे में सुखद है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा है कि सरकार आंदोलनकारी छात्रों के साथ बातचीत और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए तैयार है, जिसके तहत प्रशासनिक स्तर पर प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया और प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी के मामलों में सीआईडी जांच तेज कर दी गई है तथा अब तक कई आरोपियों की गिरफ्तारियां भी की जा चुकी हैं। लेकिन, छात्र परीक्षा रद्द करने और सीबीआई या उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की निगरानी में स्वतंत्र जांच की मांग पर अड़े हुए हैं, और दोनों पक्षों के बीच संवाद की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
ऐसे में देश के सभी महत्वपूर्ण चेहरे , सभी राजनीतिक दल एवं राजनेताओं , देश की तमाम मीडिया और खासकर आम जनता को इस आंदोलन के साथ जरूर खड़ा होना चाहिए, क्योंकि इन छात्रों ने उदहारण पेश किया है कि देश के संविधान को मानते हुए, एक
चुनी हुई सरकार का पूरी सकारात्मकता से विरोध कर अपनी जायज मांगों से कैसे अवगत करवाया जा सकता है ।





