महेन्द्र तिवारी
कोलकाता में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बांग्लादेशी मूल की निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन ने जिन मुद्दों पर अपनी राय रखी, उन्होंने केवल साहित्यिक जगत ही नहीं बल्कि राजनीति, मानवाधिकार, लोकतंत्र और दक्षिण एशिया के सामाजिक विमर्श को भी नई चर्चा का विषय बना दिया। लगभग दो दशक बाद कोलकाता लौटने के बाद उनका यह सार्वजनिक संवाद कई कारणों से महत्वपूर्ण माना गया। उन्होंने कवि जय गोस्वामी के साथ मंच पर हुई घटना पर दुख व्यक्त किया, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन किया, समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर जोर दिया, बांग्लादेश की वर्तमान परिस्थितियों पर चिंता व्यक्त की और भारत तथा बांग्लादेश के संबंधों पर भी अपने विचार रखे। उनके वक्तव्यों ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा किया कि लोकतांत्रिक समाज में विचारों की असहमति और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
सबसे पहले चर्चा उस घटना की हुई जिसमें प्रसिद्ध बंगाली कवि जय गोस्वामी को मंच पर बुलाए जाने के बाद दर्शकों के एक वर्ग के विरोध के कारण उन्हें बोलने का अवसर नहीं मिल सका। तसलीमा नसरीन ने इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति के विचारों से असहमति है तो उसका उत्तर संवाद से दिया जाना चाहिए, न कि उसे बोलने से रोककर। उनके अनुसार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन तभी सार्थक है जब वह केवल अपने विचारों तक सीमित न रहकर विरोधी विचारों के लिए भी समान रूप से लागू हो। उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी लेखक, कवि या बुद्धिजीवी को केवल वैचारिक मतभेद के आधार पर मंच से दूर रखना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण बन गई क्योंकि तसलीमा नसरीन स्वयं पिछले तीन दशकों से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रश्न से जुड़ी रही हैं। अपने लेखन के कारण उन्हें बांग्लादेश छोड़ना पड़ा और लंबे समय तक विभिन्न देशों में निर्वासन का जीवन बिताना पड़ा। उन्होंने कई बार यह कहा है कि किसी भी लोकतंत्र की पहचान इस बात से होती है कि वहां असहमति रखने वाले लोगों को किस प्रकार का स्थान मिलता है। उनके अनुसार विचारों का मुकाबला विचारों से होना चाहिए, न कि प्रतिबंधों या भय के वातावरण से। यही कारण है कि उन्होंने जय गोस्वामी प्रकरण को केवल एक व्यक्ति का नहीं बल्कि व्यापक लोकतांत्रिक संस्कृति का प्रश्न बताया।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने पश्चिम बंगाल की विभिन्न सरकारों के साथ अपने अनुभवों का उल्लेख करते हुए कहा कि अलग अलग समय में उन्हें अलग परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। उनके इस वक्तव्य ने राजनीतिक हलकों में भी चर्चा पैदा की। हालांकि उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि किसी भी सरकार की वास्तविक कसौटी यह है कि वह सभी नागरिकों और लेखकों को बिना वैचारिक भेदभाव के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उपलब्ध कराए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार का दायित्व केवल समर्थकों की सुरक्षा करना नहीं बल्कि आलोचकों की अभिव्यक्ति की भी रक्षा करना है।
तसलीमा नसरीन ने समान नागरिक संहिता के प्रश्न पर भी स्पष्ट समर्थन व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि भारत ही नहीं बल्कि बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों में भी सभी नागरिकों के लिए समान कानून होना चाहिए। उनके अनुसार अलग अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण विशेष रूप से महिलाओं को अनेक प्रकार की असमानताओं का सामना करना पड़ता है। उनका तर्क था कि समान नागरिक संहिता का उद्देश्य किसी धर्म का विरोध करना नहीं बल्कि नागरिकों को समान अधिकार और समान कानूनी संरक्षण प्रदान करना होना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से महिलाओं की संपत्ति, विवाह, तलाक और उत्तराधिकार से जुड़े अधिकारों का उल्लेख करते हुए कहा कि समान कानून लैंगिक समानता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
समान नागरिक संहिता का विषय स्वयं भारत में लंबे समय से सार्वजनिक और राजनीतिक बहस का विषय रहा है। इसके समर्थक इसे समानता और न्याय की दिशा में आवश्यक कदम मानते हैं, जबकि आलोचकों का मत है कि इस विषय पर व्यापक संवाद और सभी समुदायों की भागीदारी आवश्यक है। तसलीमा नसरीन का दृष्टिकोण इस बहस के एक पक्ष का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें महिलाओं के अधिकारों को केंद्र में रखा गया है। उनके वक्तव्य ने इस चर्चा को फिर से प्रमुखता दिलाई है।
बांग्लादेश की वर्तमान स्थिति पर बोलते हुए तसलीमा नसरीन ने चिंता व्यक्त की कि वहां धार्मिक कट्टरता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा जैसे मुद्दे अभी भी गंभीर बने हुए हैं। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत बनाने और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए सभी समुदायों के साथ समान व्यवहार आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी देश की स्थिरता तभी संभव है जब वहां कानून का शासन हो और नागरिकों को बिना भय के अपने अधिकारों का उपयोग करने का अवसर मिले।
उन्होंने शिक्षा व्यवस्था पर भी अपने विचार व्यक्त किए और धार्मिक शिक्षा संस्थानों की भूमिका पर आलोचनात्मक टिप्पणी की। उनका मत था कि आधुनिक, वैज्ञानिक और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए ताकि बच्चों में तार्किक सोच और लोकतांत्रिक मूल्यों का विकास हो सके। यह उनका व्यक्तिगत दृष्टिकोण है और स्वाभाविक रूप से इस विषय पर समाज के विभिन्न वर्गों की अलग अलग राय मौजूद है। शिक्षा, धर्म और राज्य के संबंधों को लेकर दक्षिण एशिया में लंबे समय से बहस चलती रही है और तसलीमा नसरीन के वक्तव्य ने इस बहस को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया।
भारत और बांग्लादेश के संबंधों पर बोलते हुए उन्होंने दोनों देशों के ऐतिहासिक रिश्तों की चर्चा की। उन्होंने 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता के दौरान भारत की भूमिका को याद करते हुए कहा कि दोनों देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध पूरे क्षेत्र की स्थिरता और विकास के लिए आवश्यक हैं। उनका मानना है कि सांस्कृतिक, आर्थिक और मानवीय संबंध राजनीतिक मतभेदों से कहीं अधिक गहरे होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों को कट्टरता और वैमनस्य फैलाने वाली शक्तियों से सावधान रहना चाहिए ताकि क्षेत्रीय सहयोग मजबूत हो सके।
पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के संबंध में भी उन्होंने अपनी राय व्यक्त की। उनका कहना था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्येक राजनीतिक दल और नेता को कानून के दायरे में रहकर चुनाव लड़ने और जनता के बीच जाने का अवसर मिलना चाहिए। उन्होंने लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को स्वस्थ बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। यह भी स्पष्ट है कि बांग्लादेश की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों और विश्लेषकों के अलग अलग दृष्टिकोण हैं, इसलिए तसलीमा नसरीन की टिप्पणियों को उनके व्यक्तिगत राजनीतिक मत के रूप में देखा जाना चाहिए।
तसलीमा नसरीन का सार्वजनिक जीवन लगातार विवादों, समर्थन और विरोध के बीच रहा है। उनके लेखन का प्रमुख विषय महिलाओं के अधिकार, धार्मिक कट्टरता की आलोचना, मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता रहा है। यही कारण है कि उनके प्रत्येक सार्वजनिक वक्तव्य को केवल साहित्यिक टिप्पणी नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक और राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में देखा जाता है। उनके समर्थक उन्हें निर्भीक लेखक मानते हैं जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने विचारों पर कायम रहती हैं, जबकि उनके आलोचक कई मुद्दों पर उनके विचारों को एकपक्षीय बताते हैं। लोकतांत्रिक समाज में ऐसे मतभेद स्वाभाविक हैं और स्वस्थ सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा भी हैं।
कोलकाता की यह प्रेस कॉन्फ्रेंस केवल एक साहित्यकार की वापसी का अवसर नहीं थी, बल्कि उसने यह भी याद दिलाया कि दक्षिण एशिया में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, महिलाओं के अधिकार, धर्म और राजनीति के संबंध, लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती तथा पड़ोसी देशों के संबंध जैसे विषय आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने पहले थे। जय गोस्वामी प्रकरण से लेकर समान नागरिक संहिता और बांग्लादेश की राजनीतिक स्थिति तक तसलीमा नसरीन के वक्तव्यों ने अनेक बहसों को फिर से जीवित कर दिया है। इन मुद्दों पर अंतिम निष्कर्ष भले ही अलग अलग हो सकते हैं, लेकिन इतना स्पष्ट है कि लोकतांत्रिक समाज की मजबूती संवाद, सहिष्णुता और असहमति के सम्मान से ही संभव है। किसी भी विचार से सहमत या असहमत होने का अधिकार लोकतंत्र का हिस्सा है, किंतु उस अधिकार की रक्षा तभी हो सकती है जब हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का समान अवसर मिले। यही संदेश इस पूरे घटनाक्रम से सबसे अधिक महत्वपूर्ण रूप में उभरकर सामने आता है।





