डॉ वंदना शर्मा
गांव के बड़े वाले मैदान में आज बड़ी चहल-पहल थी। चुनाव का मौसम था। एक क्षेत्रीय नेताजी मंच से गरज-गरज कर भाषण दे रहे थे। पूरा मैदान भीड़ से खचाखच भरा था, नारे लग रहे थे।
उसी भीड़ से थोड़ा दूर, एक नीम के पेड़ के नीचे एक हट्टा कट्टा सा लड़का खड़ा था – रघु। उम्र यही कोई 22-23 साल। हाफ पैंट पहने, कंधे पर एक मैला सा गमछा। उसकी आँखों में भाषण के लिए कोई उत्साह नहीं था, बस एक चिंता थी – नौकरी की।
रघु बेरोजगार था। घर पर कर्ज का पहाड़ था। बापू बीमार रहते थे, छोटे भाई-बहन स्कूल जाते थे। घर में कभी-कभी एक वक्त का चूल्हा भी नहीं जलता था। रघु दिनभर मजदूरी करता, पर उससे घर का पेट भी मुश्किल से भरता।
भाषण सुनते-सुनते उसके दिमाग में एक विचार कौंधा। वह भीड़ को चीरता हुआ सीधे मंच पर नेताजी के पास पहुंच गया और हिम्मत करके बोला, “साहब, मेरे घर में दस वोट हैं, पूरे गांव के वोट मैं आपको दिलवा दूंगा। आप मेरी एक नौकरी लगवा दीजिए।”
नेताजी ने पहले तो इस हट्टे-कट्टे, भोले से दिखने वाले लड़के को ऊपर से नीचे तक देखा। फिर मुस्कुराए। चुनाव में एक-एक वोट कीमती होता है। उन्होंने कहा, “ठीक है, अपनी अर्जी लिख कर दे दो।”
रघु की तो जैसे लॉटरी लग गई। वह खुशी-खुशी घर भागा, टूटी-फूटी लिखावट में एक अर्जी लिखी और दौड़कर फिर सभा में आया। नेताजी ने अर्जी ली और जेब में रख ली।
संयोग देखिए, नेताजी चुनाव जीत गए। कुछ महीनों बाद वह फिर उसी गांव में धन्यवाद सभा करने आए। रघु को याद आया। वह गुस्से में उनके पास पहुंचा, “साहब आपने मेरा काम नहीं किया, मैंने पूरे गांव के वोट आपको दिलवाए थे।”
नेताजी इस अचानक हमले के लिए तैयार नहीं थे। भीड़ के सामने बेइज्जती न हो, इसलिए बात टालने के लिए उन्होंने कह दिया, “अरे रघु, मैं तो तुम्हें भूला ही नहीं। मेरा ऑफिस लखनऊ में है। परसों सुबह दस बजे आ जाना, तुम्हारा नियुक्ति पत्र तैयार मिलेगा।”
नेताजी ने सोचा था, ये देहाती लड़का इतनी दूर लखनऊ कहाँ आएगा। कह कर वह गाड़ी में बैठकर चले गए।
पर नेताजी रघु को जानते नहीं थे। रघु के लिए ये सिर्फ नौकरी नहीं, उसके पूरे परिवार की उम्मीद थी।
वह नियत समय पर पहुँचने के लिए निकल पड़ा। उसके पास पहनने को ढंग के कपड़े नहीं थे – वही खाली हाफ पैंट, कंधे पर गमछा, और थैले में एक समय के खाने के लिए दो सूखी रोटियां। वह जनरल डब्बे में खड़े-खड़े, धक्के खाते हुए लखनऊ पहुंच गया।
अगले दिन सुबह ठीक दस बजे वह नेताजी के बड़े से दफ्तर के बाहर खड़ा था। नेताजी किसी मीटिंग में व्यस्त थे। चपरासी ने उसे बाहर एक बेंच पर बैठा दिया। रघु दो घंटे तक वहीं बैठा रहा।
आखिर नेताजी दो अफसरों के साथ बाहर निकले। रघु तुरंत उठकर उनके सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। नेताजी ने उसे पहचान लिया। उसकी आँखों में सच्ची लगन देखकर उन्हें थोड़ी शर्म भी आई और तरस भी। उन्होंने साथ खड़े अफसर से कहा, “इसे आबकारी विभाग में सिपाही की नौकरी दे दो। हमें एक ईमानदार लड़के की जरूरत है जो रात में भी ड्यूटी कर सके।”
रघु को हाथ में नियुक्ति पत्र मिला तो उसकी आँखें भर आईं। वेतन सिर्फ तीन सौ रुपये था, पर उसके लिए तो वह तीन लाख के बराबर था। वह फूला नहीं समा रहा था।
उसने अफसर से कहा, “साहब मैं आज से ही काम शुरू करना चाहता हूँ।”
अफसर ने कहा, “तुम्हारे पास न रहने को जगह है, न कपड़े। कहाँ रहोगे?”
रघु ने झेंपते हुए कहा, “साहब मैं तो फकीर आदमी हूँ, यहीं दफ्तर के किसी कोने में पड़ा रहूंगा।”
अफसर को उसकी सादगी पर दया आ गई। उसने रघु को अतिथि कक्ष में सुला दिया और कहा कि फिलहाल यहीं रहो।
रघु की मेहनत और लगन देखकर जैसे ऊपर वाले ने भी उसकी उंगली पकड़ ली थी और मदद के लिए तैयार था।
रात में जब रघु अतिथि कक्ष में सो रहा था, तभी थके हारे दरोगा जी आए। उन्हें भूख लगी थी। और थोड़ा बुखार भी था। रघु ने बिना कुछ सोचे अपने थैले में रखी सुबह की बची हुई दो रोटियां उन्हें खिला दीं और अपने पास ही सुला दिया।
सुबह जब दरोगा की आँख खुली तो वह रघु की इस निस्वार्थ सेवा से बहुत खुश हुआ। उसने रघु को अपने घर बुलाया। पहली मंजिल पर एक खाली कमरा था, वह उसने किराए पर रघु को रहने के लिए दे दिया।
एक दिन दरोगा ने रघु को पास बुलाकर समझाया, “रघु, तुम बहुत सीधे हो। दुनिया में थोड़ी चालाकी भी सीखनी पड़ती है। ऐसा करो, कल ठेकेदार के पास जाना। वो मुझे रोज एक शराब की बोतल देता है। कल उससे दो बोतल ले आना। एक मेरे लिए, एक अपने लिए। वो पूछेगा कि तुम पीते हो, तो हाँ कह देना। फिर अपनी वाली बोतल बेचकर अपने लिए कपड़े और बिस्तर ले आना।”
रघु का दिल तो नहीं मान रहा था, पर उसने सोचा गरीबी का जहर तो वह रोज पी ही रहा है, ये भी सही।
अगले दिन वह ठेकेदार के पास गया। ठेकेदार ने वही सवाल पूछा – “पीते हो?” और परखने के लिए उसे वहीं पीने को कहा। रघु पहले तो बहुत घबराया, फिर उसने भगवान को याद किया और सोचा, अपने परिवार की गरीबी दूर करने के लिए अगर जहर भी पीना पड़े तो पी लूंगा। उसने आँख बंद करके शराब पी ली।
ठेकेदार को विश्वास हो गया और उसने उसे तीन बोतलें दे दीं – एक दरोगा के लिए और दो उसके लिए।
रघु ने अपनी दोनों बोतलें बेच दीं। उस पैसे से उसने अपने रहने के लिए एक पतला सा बिस्तर और पहनने के लिए दो जोड़ी कपड़े खरीदे। उस रात उसे पहली बार लगा कि वह भी इंसानों की तरह जी सकता है।
उस दिन के बाद रघु दरोगा का सबसे विश्वासपात्र सिपाही बन गया। जब भी किसी गांव में छापा मारने जाना होता, दरोगा रघु को ही साथ ले जाता। धीरे-धीरे उसे ऑफिस की गोपनीय डाक एक जिले से दूसरे जिले ले जाने का काम भी मिलने लगा।
जो भी उसे किराया-भत्ते के लिए पैसे मिलते, वह उसे जेब में बचा लेता और खुद बिना टिकट जनरल डिब्बे में खड़े-खड़े सफर करता। उसके लिए एक-एक रुपया कीमती था। वह एक-एक पैसा जोड़कर गांव भेजता था।
ईश्वर ने उसकी ईमानदारी का फल दिया। कुछ सालों में उसका प्रमोशन हो गया और उसकी पोस्टिंग उसके अपने गृह जनपद में हो गई।
फिर तो रघु ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। धीरे-धीरे उसने घर का सारा कर्ज उतार दिया। अपने छोटे भाई-बहनों की धूमधाम से शादी की। करीब दस साल की कड़ी मेहनत के बाद उसने शहर में अपने लिए एक छोटा सा, पर अपना पक्का घर खरीदा और अपनी बीवी-बच्चों को गांव से शहर ले आया।
एक शाम वह अपने नए घर के आंगन में बैठा था। परिवार साथ था। वह अपने बच्चों को अपने संघर्ष के दिन सुना रहा था – वो हाफ पैंट, वो दो रोटियां, वो जनरल डब्बे का सफर, वो बेबसी।
उसकी कहानी सुनकर उसके पंद्रह साल के बेटे सूरज की आँखों में आंसू आ गए। वह अपने पापा से लिपट गया और बोला, “पापा, आपने बहुत संघर्ष किया। आपने हमें गरीबी से बाहर निकाला। मैं वादा करता हूँ, मैं आपके सारे सपने पूरे करूंगा। अब आपके साथ आपका बेटा भी है।”
रघु ने अपने बेटे को गले से लगा लिया। दोनों की आँखों से खुशी के आंसू बह रहे थे। वे आंसू दर्द के नहीं, जीत के थे। एक बेरोजगार से सिपाही और सिपाही से एक खुशहाल परिवार के मुखिया तक का सफर, रघु ने सच में पूरा कर लिया था।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली





