यूसीसी पर तेज होती सियासत और संवैधानिक विमर्श

Intensifying politics and constitutional discourse surrounding the UCC

महेन्द्र तिवारी

समान नागरिक संहिता एक बार फिर भारतीय राजनीति और संवैधानिक विमर्श के केंद्र में आ गई है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा यह घोषणा किए जाने के बाद कि वर्ष 2029 से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन शासित 21 राज्यों में समान नागरिक संहिता लागू करने का लक्ष्य है, देशभर में इस विषय पर नई बहस शुरू हो गई है। उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, असम और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में राजनीतिक गतिविधियां तेज हो चुकी हैं, जबकि विपक्षी दल इसे सामाजिक विविधता और धार्मिक स्वतंत्रता के संदर्भ में चुनौतीपूर्ण मुद्दा बता रहे हैं। यह विवाद केवल कानून का नहीं, बल्कि भारतीय समाज की बहुलता, संविधान की भावना और संघीय व्यवस्था की भी परीक्षा है।

समान नागरिक संहिता का विचार नया नहीं है। भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 44 राज्य को यह प्रयास करने की प्रेरणा देता है कि देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित की जाए। इसका संबंध विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और पारिवारिक अधिकारों जैसे नागरिक विषयों से है। वर्तमान व्यवस्था में विभिन्न धार्मिक समुदायों के लिए अलग अलग व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं। यूसीसी का मूल उद्देश्य इन मामलों में धर्म आधारित भिन्नताओं के स्थान पर सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी व्यवस्था स्थापित करना बताया जाता है।

सरकार का पक्ष यह है कि समान नागरिक संहिता महिलाओं और पुरुषों के बीच समान अधिकारों को मजबूत करेगी तथा नागरिकों को धर्म के आधार पर अलग कानूनी श्रेणियों में बांटने की प्रवृत्ति समाप्त करेगी। भाजपा लंबे समय से इसे अपने प्रमुख वैचारिक संकल्पों में शामिल करती रही है। हाल की घोषणा के बाद पार्टी ने स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय कानून की बजाय राज्यों के माध्यम से चरणबद्ध ढंग से इस दिशा में आगे बढ़ा जाएगा। इसके पीछे संवैधानिक आधार भी है क्योंकि विवाह, परिवार और उत्तराधिकार जैसे विषय समवर्ती सूची में आते हैं, जिन पर केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं।

राज्य आधारित मॉडल अपनाने की रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि भारत की सामाजिक संरचना अत्यंत विविध है। अनेक राज्यों में जनजातीय समुदायों की अपनी पारंपरिक सामाजिक व्यवस्थाएं और रीति रिवाज हैं। उत्तराखंड में लागू कानून में अनुसूचित जनजातियों को छूट दी गई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि एक समान कानून बनाते समय स्थानीय सांस्कृतिक पहचान को भी ध्यान में रखा जा रहा है। यही कारण है कि केंद्र सरकार फिलहाल एक ही राष्ट्रीय कानून की बजाय राज्यों के अनुभवों को आधार बनाकर आगे बढ़ने की नीति अपनाती दिखाई दे रही है।

उत्तराखंड इस दिशा में सबसे आगे है, जहां समान नागरिक संहिता लागू हो चुकी है। इसके अतिरिक्त गुजरात, असम और मध्य प्रदेश में भी संबंधित विधेयक पारित किए जा चुके हैं, हालांकि विभिन्न राज्यों में उनकी लागू होने की प्रक्रिया अलग अलग चरणों में है। इन कानूनों में बहुविवाह पर रोक, विवाह पंजीकरण की अनिवार्यता, उत्तराधिकार के समान नियम तथा लिव इन संबंधों के पंजीकरण जैसे प्रावधान प्रमुख रूप से चर्चा में रहे हैं। इन अनुभवों को अब अन्य राज्यों के लिए संभावित मॉडल के रूप में देखा जा रहा है।

सबसे अधिक राजनीतिक चर्चा उत्तर प्रदेश को लेकर हो रही है। राज्य के वरिष्ठ मंत्री भूपेंद्र चौधरी ने संकेत दिया है कि सरकार शीघ्र ही यूसीसी विधेयक विधानसभा में प्रस्तुत करने की तैयारी कर रही है। हालांकि अभी तक विधेयक का आधिकारिक मसौदा सार्वजनिक नहीं हुआ है और न ही इसकी निश्चित समय सीमा घोषित की गई है। फिर भी आगामी विधानसभा चुनावों के पहले इस विषय का राजनीतिक महत्व काफी बढ़ गया है। यदि उत्तर प्रदेश इस दिशा में आगे बढ़ता है तो देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य में इसका व्यापक सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव देखने को मिल सकता है।

दूसरी ओर बिहार की स्थिति अधिक जटिल दिखाई देती है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सहयोगी जनता दल यूनाइटेड ने इस विषय पर सतर्क रुख अपनाया है। पार्टी के भीतर विभिन्न मत सामने आए हैं और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सांसदों, विधायकों तथा विधान परिषद सदस्यों की बैठक बुलाकर इस मुद्दे पर विचार विमर्श किया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि सभी सामाजिक और संवैधानिक आशंकाओं पर विचार करने के बाद ही अंतिम रुख तय किया जाएगा। इससे स्पष्ट होता है कि गठबंधन के भीतर भी यूसीसी पर पूर्ण एकरूपता नहीं है।

विपक्ष की ओर से सबसे तीखी प्रतिक्रिया एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि समान नागरिक संहिता का उद्देश्य गैर हिंदू समुदायों पर हिंदू कानून थोपना है और सरकार मुसलमानों को निशाना बना रही है। भोपाल की एक रैली में उन्होंने सरकार को चुनौती दी कि वह आदिवासी समुदायों को भी यूसीसी के दायरे में लाकर दिखाए। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ये राजनीतिक आरोप और आपत्तियां हैं, जिन्हें संबंधित नेता के दृष्टिकोण के रूप में ही देखा जाना चाहिए। सरकार ने इन आरोपों से सहमति नहीं जताई है और उसका दावा है कि यूसीसी समान नागरिक अधिकारों का विषय है।

यही विरोध और समर्थन भारतीय लोकतंत्र की स्वाभाविक विशेषता भी है। एक ओर सरकार समानता और लैंगिक न्याय की बात करती है, दूसरी ओर विरोधी दल सांस्कृतिक विविधता, धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों की चिंता व्यक्त करते हैं। दोनों पक्ष अपने अपने संवैधानिक तर्क प्रस्तुत करते हैं। बहस का वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या समानता का अर्थ सभी के लिए एक ही नियम होना चाहिए, या विविध समाज में कुछ सांस्कृतिक भिन्नताओं को भी संवैधानिक संरक्षण मिलना चाहिए। यही प्रश्न यूसीसी को केवल कानूनी नहीं बल्कि सामाजिक विमर्श का विषय बनाता है।

इस बहस में विधि आयोग का उल्लेख भी बार बार होता है। वर्ष 2018 में 21वें विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि उस समय समान नागरिक संहिता न तो आवश्यक थी और न ही वांछनीय। बाद में 22वें विधि आयोग ने इस विषय पर नए सिरे से सुझाव आमंत्रित किए। इसका अर्थ यह है कि स्वयं संवैधानिक संस्थाओं के भीतर भी समय के साथ इस विषय पर पुनर्विचार की प्रक्रिया चलती रही है। इसलिए यूसीसी को किसी एक स्थिर निष्कर्ष की बजाय विकसित होते संवैधानिक विमर्श के रूप में समझना अधिक उपयुक्त होगा।

भारतीय संघीय व्यवस्था भी इस पूरे विवाद का महत्वपूर्ण पक्ष है। यदि अलग अलग राज्य अपनी सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार कानून बनाते हैं, तो इससे प्रयोग और अनुभव की संभावना बढ़ती है। वहीं दूसरी ओर अलग राज्यों में अलग मॉडल होने से समान नागरिक संहिता की अवधारणा ही आंशिक रूप से बदल सकती है। यही कारण है कि अनेक विधि विशेषज्ञ राज्यवार अनुभवों का गहन अध्ययन करने की आवश्यकता पर बल देते हैं, ताकि भविष्य में किसी व्यापक व्यवस्था के लिए व्यावहारिक आधार तैयार हो सके।

यूसीसी का सामाजिक प्रभाव केवल धार्मिक समुदायों तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर महिलाओं के संपत्ति अधिकार, विवाह पंजीकरण, तलाक की प्रक्रिया, बच्चों के संरक्षण, उत्तराधिकार और पारिवारिक न्याय व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। यदि कानून वास्तव में समान अधिकार सुनिश्चित करता है तो उसका प्रभाव करोड़ों नागरिकों के दैनिक जीवन तक पहुंचेगा। इसी कारण इस विषय पर व्यापक जन संवाद, कानूनी स्पष्टता और सामाजिक विश्वास अत्यंत आवश्यक माने जा रहे हैं।

आज की स्थिति में इतना स्पष्ट है कि समान नागरिक संहिता भारत की राजनीति का प्रमुख राष्ट्रीय मुद्दा बन चुकी है। अमित शाह की घोषणा ने इसे नई गति दी है, उत्तर प्रदेश में इसकी संभावनाओं ने राजनीतिक तापमान बढ़ाया है, बिहार में सहयोगी दलों की सावधानी ने गठबंधन की जटिलता उजागर की है और ओवैसी जैसे नेताओं के विरोध ने इस बहस को वैचारिक आयाम दिया है। अंतिम निर्णय चाहे जिस दिशा में जाए, लोकतांत्रिक समाज में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि कानून बनाने की प्रक्रिया संवाद, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक सहभागिता के आधार पर आगे बढ़े। समानता और विविधता के बीच संतुलन ही इस बहस की सबसे बड़ी कसौटी रहेगा।