डूंगरपुर की राजनीति में एक नई कहानी—स्वच्छता के मॉडल से जनभागीदारी के मॉडल तक
नीति गोपेन्द्र भट्ट
डूंगरपुर की सुबहों में अब सिर्फ अरावली की पहाड़ियों और गैब सागर और माही नदी एवं वागड़ की हवाओं की कहानी नहीं है। इस ऐतिहासिक शहर की पहचान में स्वच्छता, सुंदरता, जनभागीदारी और नगर प्रबंधन का एक ऐसा अध्याय भी जुड़ा है, जिसने राजस्थान की सीमाओं से बाहर तक अपनी चर्चा बनाई है । इस कहानी के प्रमुख पात्र रहे हैं राजस्थान के स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर के.के. गुप्ता और अब लगता है कि इस कहानी का अगला अध्याय लिखने के लिए उनकी सहधर्मिणी और डूंगरपुर नगर सुशीला गुप्ता तैयार हैं।
राजस्थान सरकार ने 2026 में के.के. गुप्ता को स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) के लिए राज्य का स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर नियुक्त किया। इसके पूर्व की दो सरकारों ने भी उन्हें स्वच्छता ब्रांड एंबेसडर बनाया था और भारत सरकार के जल संसाधन मंत्रालय ने भी उन्हें सम्मान दिया । डूंगरपुर नगर परिषद के पूर्व अध्यक्ष के रूप में उनके कार्य और स्वच्छता के प्रति उनकी सक्रियता एवं जुनून ने उन्हें इस भूमिका तक पहुंचाया वे देश विदेश में भारत के स्वच्छता राजदूत बन गए।लेकिन राजनीति और प्रशासन में किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल उसका अपना कार्यकाल नहीं होता। असली कसौटी यह होती है कि उसके विचार उसके बाद कितनी दूर तक चलते हैं।डूंगरपुर में अब यही सवाल नव निर्वाचित नगरपरिषद अध्यक्ष सुशीला गुप्ता के सामने है।नगर परिषद के वार्ड 29 से चुनाव जीतने के बाद भाजपा ने उन्हें सभापति पद के लिए अधिकृत प्रत्याशी बनाया। 40 सदस्यीय परिषद में भाजपा के 24 पार्षद निर्वाचित हुए हैं। नामांकन के दौरान पार्टी के भीतर दूसरे दावेदार के सामने आने से मुकाबले ने कुछ समय के लिए नया मोड़ लिया, लेकिन बाद में प्रभु पंड्या के नामांकन वापस लेने से सुशीला गुप्ता की राह स्पष्ट हुई।सुशीला गुप्ता के सामने केवल सभापति की कुर्सी नहीं है। उनके सामने एक ऐसी विरासत है, जिसे आगे बढ़ाने की महती जिम्मेदारी भी है।यहीं उनका ‘एक से एक ग्यारह’ का सूत्र महत्वपूर्ण हो जाता है। एक व्यक्ति की मेहनत से बदलाव शुरू हो सकता है, लेकिन उसे स्थायी बनाने के लिए लोगों को साथ जोड़ना पड़ता है। पार्षद, नगर परिषद का प्रशासन, सफाई कर्मचारी, व्यापारी, सामाजिक संगठन, महिलाएं, युवा और आम नागरिक यदि ये सभी एक लक्ष्य के लिए जुड़ें, तो एक की ताकत ग्यारह बन सकती है।
राजस्थान के स्वच्छता ब्राण्ड एम्बेसेडर के.के. गुप्ता की स्वच्छता सोच का मूल भी केवल सफाई तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने स्वच्छता को जनव्यवहार और जनभागीदारी से जोड़ने पर जोर दिया है। प्रदेश के विभिन्न निकायों में उनकी बैठकों और कार्ययोजनाओं में भी निरंतर निगरानी तथा नागरिक भागीदारी पर बल दिखाई देता है।
डूंगरपुर की नई चेयर पर्सन सुशीला गुप्ता के लिए चुनौती यही है कि इस सोच को नई सामाजिक और महिला नेतृत्व की ऊर्जा के साथ आगे बढ़ाया जाए।डूंगरपुर को स्वच्छ रखना, कचरा प्रबंधन को मजबूत करना, हरित क्षेत्र बढ़ाना, जल संरक्षण को गति देना, सड़कों और रोशनी जैसी नागरिक सुविधाओं को बेहतर करना ये सब किसी एक व्यक्ति के बूते की बातें नहीं हैं। इनके लिए व्यवस्था और समाज के बीच भरोसे की जरूरत होती है।यही कारण है कि सुशीला गुप्ता की संभावित राजनीतिक भूमिका को केवल ‘के.के. गुप्ता की पत्नी’ के परिचय से देखना पर्याप्त नहीं होगा। उन्हें सभापति बन कर अपनी स्वतंत्र कार्यशैली और प्राथमिकताएं भी स्थापित करनी होंगी।के.के. गुप्ता ने देश-विदेश के समक्ष डूंगरपुर के जिस स्वच्छता मॉडल की नींव रखी, वह अब उनके लिए एक विरासत है; सुशीला गुप्ता के लिए वही विरासत एक जिम्मेदारी है।
डूंगरपुर की नई कहानी शायद यहीं से शुरू होती है जहां एक व्यक्ति ने सपना देखा, एक शहर ने उसे स्वीकार किया और अब एक महिला उस सपने को सामूहिक संकल्प में बदलने की तैयारी में है।क्योंकि बदलाव का गणित कभी-कभी सचमुच इतना सरल होता है—एक अकेला आगे बढ़े तो शुरुआत होती है, लेकिन एक दूसरे से जुड़ जाएं तो वही ‘एक से ग्यारह’ बन जाता है।





