एमपी में जहरीली शराब का सागर और गाँजे की लहलहाती फसल

A sea of ​​toxic liquor and flourishing cannabis crops in MP.

नरेंद्र तिवारी

मध्यप्रदेश नशे के अवैध कारोबारियों का गढ़ बन चूका है। नशे के यह सौदागर अपने लाभ के लिए इंसानी जिंदगी के दुश्मन बन बैठे है। इन सौदागरो को न पुलिस का डर है,न ही कानून की कोई चिंता, यही कारण है की प्रदेश के सागर में जहरीली शराब पिने से 33 इंसानी जिंदगी खत्म हो गयी। वहीं बड़वानी जिले की सेंधवा विधानसभा के जंगलो में पुलिस को वन भूमि पर नशे के सौदागरो द्वारा बुआई, जुताई एवं खाद बीज देकर तैयार किये गए खेतो में गाँजे की फसल लहलहाती मिली। इतना ही नहीं प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में अवैध शराब माफियाओ के संगठित गिरोह आए दिन शराब तस्करी के कार्य को अंजाम दे रहे है। प्रदेश को शर्मिंदगी तब उठानी पड़ी, ज़ब शराब के लिए प्रतिबंधित गुजरात के भावनगर जिले में जहरीली शराब से 13 लोगो की मौत के बाद गुजरात पुलिस ने उज्जैन से आरोपितो को चिन्हित किया।

अपना मध्यप्रदेश भारत का ह्रदय प्रदेश जिसकी तरक्की एवं प्रगति की कामनाएँ हर प्रदेशवासी करता है। प्रदेश विकास की राह पर तेजी से बढ़े, नवीन औद्योगिक इकाईयों की स्थापना हो, जहाँ युवा बेरोजगार काम पा सके, रोजगार के लिए पलायन न हो, अपने ही गाँव, शहर के आसपास काम मिल सके, किसानों को अपनी फ़सल का उचित दाम मिल सके, खेतो में खुशहाली की फसले लहलहाए किसानों के माथे पर चिंता की लकीरो के स्थान पर उनके चेहरे खुशी से खिले रहे, किंतु यह क्या प्रदेश सागर में जहरीली शराब, गुजरात के भावनगर में घटित जहरीली शराब काण्ड के मास्टर माइंड और बड़वानी जिले में खेतो में गाँजे की ख़डी फ़सल से मिली बदनामी का दंश झेल रहा है।

यह विशेष तौर पर ध्यान दिए जाने वाली बात है की एमपी में हर वर्ष शराब के ठेके होते है। इन ठेको से मध्यप्रदेश को बड़े पैमाने पर राजस्व की प्राप्ति होती है। आमजन को शराब आबकारी विभाग की अधिकृत दुकानों से मिलती है, किंतु प्रदेश की वास्तविक तस्वीर बेहद चौकाने वाली है, शराब की उपलब्धता बेहद आसान है , यह प्रदेश के महानगरो, नगरो, गाँवों में संचालित होटेलों, ढाबो पर आसानी से उपलब्ध है। यह जानते हुए ही की आबकारी विभाग की अधिकृत दुकानों के के अलावा अन्य स्थानों पर शराब बेचना अपराध है। इस अवैध गतिविधि का संचालन शराब माफियाओ, आबकारी विभाग और पुलिस के गठजोड़ से जारी है, इस कार्य में जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी बेहद संदिग्ध है।

अभी बीते दिनों नशे से दूरी है, जरुरी 2.0 अभियान 15 जुलाई से 30 जुलाई तक चलाया गया। इस अभियान की शुरुवात करते हुए प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा ‘नशामुक्ति अभियान केवल एक पुलिस अभियान नहीं, बल्कि विकसित मध्य प्रदेश की मजबूत नींव है। नशे की लत न केवल व्यक्ति को बल्कि पुरे परिवार को बर्बाद कर देती है, पुलिस विभाग को निर्देश देते हुए उन्होंने कहा नशा माफिया के प्रति किसी भी तरह की नरमी न बरती जाए और उनके खिलाफ सख्त कार्यवाही की जाए।’ प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों, तहसील मुख्यालयों पर जन प्रतिनिधियों ने नशे के खिलाफ सामाजिक जागरूकता दिखाई, नशा माफियाओ के विरुद्ध सख्त कदम उठाने की बात कही।

जनता प्रदेश के मुखिया सहित जनप्रतिनिधियों बयानों को ध्यान से सुनती है, किंतु नेताओं के बयानों और जमीनी वास्तविकताओं में दिखाई देने वाला अंतर जनता के मन में अपने नेता के प्रति अविश्वास की भावनाओ को जन्म देता है। जनता का व्यवस्था पर से विश्वास कम होता जाता है। मध्य प्रदेश की जनता भी कुछ ऐसे ही हालातों से गुजर रही है। बरसो से अवैध शराब तस्करी के माध्यम से अलीराजपुर, झाबुआ के रास्ते गुजरात, बड़वानी जिले के राजमार्गो और प्रांतीय मार्गो से महाराष्ट्रऔर गुजरात पहुंचाए जाने का सिलसिला जारी है। मुंबई के पत्रकार है, हुसैन जैदी उन्होंने अपनी स्टोरी में बताया की मध्यप्रदेश में 2 से 3 हजार करोड़ रु का सालाना शराब का अवैध कारोबार होता है।

बहुत से पत्रकारों ने अपनी रिपोर्ट में अलीराजपुर और झाबुआ के छोटे-छोटे गाँवों में अंग्रेजी शराब के ठेके ऊँची बोली पर नीलामी को शराब तस्करों की साजिश और गुजरात शराब पहुंचाने की तरकीब बताया, यह सच्चाई है की उक्त दोनों जिले आदिवासी बाहुल्य है, यहाँ गाँव के लोग ऊँची अंग्रेजी शराब का सेवन नहीं करते, फिर यह शराब जा कहा रही है? क्या प्रदेश का आबकारी विभाग का इस जमीनी सच्चाई से वाकिफ नहीं है। आदिवासी बाहुल्य जिले शराब माफियाओ के प्रमुख अड्डे बने हुए है।

शराब के बाद एमपी के खरगोन, बड़वानी और महाराष्ट्र के धुलिया जिले की सीमाओं पर स्थित सतपुड़ा के घने जंगलो में वन भूमि पर संगठित रूप से प्रतिबंधित मादक पढ़ार्थ गाँजे की खेती प्रदेश को कलंकित करने के लिए काफी है। एमपी के बड़वानी, खरगोन और खंडवा के सयुंक्त दल ने ड्रोन कैमरो की मदद से इन पहाड़ियों पर दो कार्यवाहियो में कुल 9 प्रकरणो में 34 क्विंटल करीब ढ़ेड करोड़ रु मूल्य के गाँजे के पौधे जप्त किये। इन पहाड़ियों पर गाँजे की खेती का यह आपराधिक कार्य नया नहीं है। यह सुदूर जंगल के ग्रामीण समुदाय में फैली लालच की भावना का उदाहरण है, जो नेताओं और पुलिस के गठजोड़ से पनपी है। याद रहे इंदौर रेंज के तत्कालीन आईजी संजय राणा के नैतृत्व में वर्ष 2006 में बड़वानी के वरला थाना क्षेत्र में गाँजे के खिलाफ 800 पुलिस कर्मियों के दल ने दुर्गम पहाड़ियों पर गाँजे के खेतो को पकड़ा था। 10 से अधिक पुलिस प्रकरण दर्ज किये गए थै। कहने का आशय गाँजे का गौरख धंधा 50 सालो से रुक-रुक जारी है। यह एक आपराधिक गठजोड़ है। जो अब भी जारी है। गाँजे के खेत को तैयार करने में पांच से छ महीने लगते है, इन खेतो में भी बुआई, जुताई, खाद जैसी मेहनत करना होती है, हाल में पकड़े गए खेत तीन से चार माह पुराने होने का अंदेशा है। जो पुलिस एवं आबकारी विभाग के मुखबिर तंत्र को मुंह चिढ़ाता प्रतीत होता है। सवाल यह है की सागर में 33 लोगो की मौत के बाद सक्रिय प्रदेश प्रशासन ने नशे के विरुद्ध मुहीम को सक्रिय किया। जगह-जगह मुहूए की शराब के खिलाफ कार्यवाही देखी गयी। ऐसी कार्यवाही साल भर जारी रखने की आवश्यकता है। सख़्ती सिर्फ शब्दों की नहीं, जमीनी स्तर पर भी उतारने की आवश्यकता है। आवश्यकता व्यवस्था में पनप रहे भष्ट्र आचरण को खत्म करने की है, अभी बीते बरस की बात है, लोकायुक्त पुलिस ने अलीराजपुर से सेवानिवृत हुए आबकारी अधिकारी धर्मेंद्र सिँह भदौरिया के ठिकानों पर आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में छापेमारी कर 29 करोड़ रु की चल-अंचल सम्पत्ति का खुलासा किया था। यह हालात चौकाने वाले है। धन दौलत और ऐशो आराम की चाह समाज के लोगो को अंधा कर रही है, अपने कर्त्यव्य पथ से विमुख कर रही है, नेता भाषण पिलाए जा रहे है, इन हालातो में एमपी जहरीली शराब का सागर बन गया है और यहाँ गाँजे की फ़सल लहलहाती दिख रही है। प्रदेश के लिए यह चिंता का सबब है। प्रदेश की जनता जमीन पर रहती है, इन परिस्थियो से जनता के मन में व्यवस्था के प्रति नाराजगी जन्म लेती है। नशे के खिलाफ ईमानदार मुहीम की जरूरत है।