कानून कठोर लेकिन बेटियां अब भी असुरक्षित क्यों?

Laws are strict, yet why are daughters still unsafe?

ग्रेटर नोएडा से दिल्ली के बीच चलती स्लीपर बस में 16 वर्षीय छात्रा से सामूहिक दुष्कर्म ने एक बार फिर महिला सुरक्षा के तमाम दावों को कठघरे में खड़ा कर दिया है। रात के अंधेरे में करीब 47 किलोमीटर तक बस चलती रही मगर कहीं प्रभावी निगरानी नहीं हुई। निर्भया कांड के बाद कठोर कानून बने लेकिन अपराधियों का दुस्साहस बताता है कि कानून से ज्यादा जरूरी उसके भय का वास्तविक असर है। सवाल केवल गिरफ्तारी का नहीं, जवाबदेही का है।

योगेश कुमार गोयल

दिल्ली-एनसीआर में एक स्लीपर बस के भीतर 16 वर्षीय छात्रा के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म की घटना हमारी सुरक्षा-व्यवस्था, सार्वजनिक परिवहन की निगरानी, पुलिसिंग और सामाजिक चेतना, चारों की एक साथ विफलता का आईना है। 4 अगस्त की रात ग्रेटर नोएडा के परी चौक से एक नाबालिग छात्रा को कथित तौर पर गलत जानकारी देकर स्लीपर बस में बैठाया गया और कश्मीरी गेट तक चालक तथा परिचालक पर उसके साथ यौन हिंसा करने का आरोप है। लगभग 47 किलोमीटर के इस सफर के बाद उसे कश्मीरी गेट के निकट रिंग रोड पर छोड़ दिया गया। इस घटना की सबसे भयावह बात केवल अपराध की क्रूरता नहीं बल्कि वह पूरा सुरक्षा-शून्य ह,ै जिसमें यह अपराध संभव हुआ। एक नाबालिग लड़की रात में एक अनजान बस में बैठती है, बस लंबी दूरी तय करती है, उसके भीतर अपराध होता है और रास्ते में किसी स्तर पर ऐसी प्रभावी निगरानी नहीं हो पाती, जो इस अपराध को रोक सके। रिपोर्टों के अनुसार बस में पर्दे लगे थे और सीसीटीवी की उपलब्धता को लेकर भी गंभीर सवाल सामने आए हैं। यदि सार्वजनिक परिवहन के किसी वाहन का अंदरूनी हिस्सा इस तरह बाहरी निगरानी से लगभग कट जाए कि उसमें बैठे यात्रियों की सुरक्षा ही संदिग्ध हो जाए तो ऐसे वाहनों को सड़कों पर चलने की अनुमति देने वाली व्यवस्था से जवाब मांगना स्वाभाविक है।

यहां एक और असहज सवाल है कि घटना 4 अगस्त की बताई जा रही है लेकिन पुलिस ने इसकी जानकारी 31 अगस्त को सार्वजनिक की। इतने लंबे अंतराल में क्या हुआ? क्या जांच की गोपनीयता इसका कारण थी? क्या पीड़िता की निजता और सुरक्षा के कारण जानकारी सीमित रखी गई? या फिर किसी प्रशासनिक स्तर पर सूचना प्रबंधन में चूक हुई? इन प्रश्नों का स्पष्ट और विश्वसनीय उत्तर सार्वजनिक होना चाहिए क्योंकि अपराध की गंभीरता के साथ-साथ पुलिस की जवाबदेही भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का अनिवार्य हिस्सा है। यह जरूर उल्लेखनीय है कि शिकायत मिलने के बाद कश्मीरी गेट पुलिस ने कार्रवाई की, सीसीटीवी के जरिए बस की पहचान की और आरोपित चालक-परिचालक को गिरफ्तार किया, बस भी बरामद कर ली गई यानी अपराध के बाद पुलिस की जांच क्षमता पर सवाल उठाने से पहले यह भी स्वीकार करना होगा कि अपराधियों तक पहुंचने में तकनीकी निगरानी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन असली कसौटी गिरफ्तारी के बाद शुरू होती है। पुलिस का काम केवल अपराध होने के बाद अपराधी पकड़ना नहीं है, आधुनिक पुलिसिंग का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य अपराध होने से पहले उसे रोकना है। यदि सीसीटीवी अपराध के बाद बस का पता लगा सकता है तो सवाल यह है कि वही तकनीक संदिग्ध गतिविधि को पहले क्यों नहीं पकड़ सकी?
निर्भया कांड के बाद देश ने यही माना था कि अब व्यवस्था बदलेगी। दिसंबर 2012 में 23 वर्षीय युवती के साथ चलती बस में हुई बर्बरता ने पूरे देश को आंदोलित किया। कानून कठोर हुए, यौन अपराधों की कानूनी परिभाषाएं विस्तृत हुई, नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों के लिए अलग कानूनी ढ़ांचा मजबूत हुआ और सार्वजनिक परिवहन में सुरक्षा के सवाल को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाया गया। निर्भया मामले के चार दोषियों को 2020 में फांसी दी गई लेकिन 13 वर्ष बाद यदि एक नाबालिग लड़की फिर चलती बस में ऐसी ही दरिंदगी का शिकार होती है तो यह सवाल पूछना जरूरी है कि हमने कानून तो बदल दिए लेकिन व्यवस्था कितनी बदली? कानून की कठोरता जरूरी है लेकिन कानून का डर केवल सजा की कठोरता से पैदा नहीं होता। अपराधी के मन में सबसे बड़ा भय पकड़े जाने की निश्चितता का होता है। यदि उसे लगता है कि वह रात के अंधेरे में, सुनसान रास्ते पर, निगरानी से बाहर किसी वाहन में अपराध कर सकता है और उसे रोकने वाला कोई नहीं होगा तो कानून की किताब में लिखी कठोरतम सजा भी तत्काल निवारक शक्ति नहीं बन पाती। इसलिए चुनौती केवल कठोर कानून की नहीं, निश्चित निगरानी, त्वरित गिरफ्तारी और समयबद्ध न्याय की है।

दिल्ली और नोएडा पुलिस के बीच घटना को लेकर सामने आए कथित विरोधाभास भी चिंता बढ़ाते हैं। दिल्ली-एनसीआर आज एक ऐसा महानगरीय क्षेत्र है, जहां शहरों की सीमाएं आम नागरिक के लिए लगभग अदृश्य हैं लेकिन अपराध होने पर वही सीमाएं पुलिस के अधिकार क्षेत्र का प्रश्न बन जाती हैं। यदि कोई लड़की नोएडा में बस में चढ़ती है, दिल्ली की ओर आती है और दिल्ली में उतारी जाती है तो पुलिस की विभिन्न इकाइयों के बीच वास्तविक समय में समन्वय क्यों नहीं हो सकता? इस घटना का एक और पहलू सार्वजनिक परिवहन की जवाबदेही से जुड़ा है। स्लीपर बसों में पर्दों का इस्तेमाल, वाहन के भीतर निगरानी, यात्रियों की पहचान, ड्राइवर-परिचालक का सत्यापन, निर्धारित मार्ग से विचलन, रात में अकेले या नाबालिग यात्रियों की सुरक्षा, इन सभी बिंदुओं पर नियम होने भर से काम नहीं चलेगा। नियमों का वास्तविक अनुपालन सुनिश्चित करना होगा। परिवहन विभाग, पुलिस और बस संचालकों की संयुक्त जवाबदेही तय करनी होगी। ऐसी बसों का नियमित सुरक्षा ऑडिट हो, सीसीटीवी और आपातकालीन अलर्ट प्रणाली अनिवार्य रूप से काम करे, चालक-परिचालक का सत्यापन हो और उल्लंघन पर केवल जुर्माना नहीं, परमिट और संचालन अधिकार पर भी कठोर कार्रवाई हो।

हालांकि हम इस घटना को केवल पुलिस की विफलता कहकर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। एक ओर 16 वर्ष की बच्ची रात में अकेले यात्रा करते हुए अपराधियों के निशाने पर आ जाती है और दूसरी ओर उम्रदराज महिलाएं अपने ही परिवारों द्वारा छोड़ दी जाती हैं। प्रश्न केवल कानून का नहीं है, प्रश्न उस सामाजिक मानस का है, जिसमें कमजोर व्यक्ति सबसे आसान लक्ष्य बन जाता है। जब परिवार में संवेदना कमजोर होती है, जब शक्ति को सम्मान और अपराधी प्रवृत्ति को प्रभाव समझा जाने लगता है, जब धन और बाहुबल सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार बनने लगते हैं, तब कानून अकेला समाज को नहीं बचा सकता। हमारी सबसे बड़ी विडंबना यह है कि अपराध के बाद राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो जाती है। विपक्ष सरकार को घेरता है, सत्ता पक्ष गिरफ्तारी को अपनी उपलब्धि बताता है और बहस कुछ दिनों बाद किसी दूसरे मुद्दे में दब जाती है लेकिन पीड़िता का भय, उसका भविष्य और उसके मन पर पड़ा आघात किसी राजनीतिक बयान से समाप्त नहीं होता। महिला सुरक्षा चुनावी नारा नहीं, शासन की बुनियादी कसौटी होनी चाहिए।

‘महिलाएं रात में कितनी सुरक्षित हैं’ जैसे सवालों का उत्तर विज्ञापनों या राजनीतिक दावों से नहीं दिया जा सकता। उत्तर सड़कों पर दिखना चाहिए, बसों में दिखना चाहिए, पुलिस की प्रतिक्रिया में दिखना चाहिए और उन व्यवस्थाओं में दिखना चाहिए, जो किसी अकेली लड़की को संकट में पड़ने से पहले सुरक्षा उपलब्ध कराएं। वर्तमान घटना से दिल्ली-एनसीआर के लिए कुछ स्पष्ट सबक निकलते हैं। रात में चलने वाली बसों की अनिवार्य निगरानी हो, सभी स्लीपर बसों में कार्यशील सीसीटीवी और आपातकालीन संचार प्रणाली हो। चालक-परिचालक के पुलिस सत्यापन और प्रशिक्षण को नियमित किया जाए, बस के निर्धारित मार्ग और ठहराव की डिजिटल निगरानी हो, नाबालिग या अकेली महिला यात्री के साथ संदिग्ध स्थिति में चालक दल को विशेष प्रोटोकॉल का पालन करना पड़े, नोएडा, गाजियाबाद और दिल्ली पुलिस के बीच साझा रियल-टाइम निगरानी तंत्र विकसित हो। सबसे महत्वपूर्ण, किसी भी महिला या बच्ची की शिकायत को ‘क्षेत्राधिकार’ के नाम पर एक थाने से दूसरे थाने तक न दौड़ाया जाए।

निर्भया के बाद हमने बहुत कुछ बदला लेकिन शायद उतना नहीं, जितना बदलना चाहिए था। कठोर कानून बनाना आसान है लेकिन कानून को जमीन पर उतारना कठिन। सीसीटीवी लगाना आसान है; उसे चौबीस घंटे सक्रिय रखना कठिन। पुलिस वाहन खड़े करना आसान है, वास्तविक गश्त सुनिश्चित करना कठिन। महिला सुरक्षा के दावे करना आसान है लेकिन ऐसी व्यवस्था बनाना कठिन, जिसमें कोई लड़की रात के अंधेरे में अकेली होने के बावजूद असुरक्षित महसूस न करे। इसलिए इस घटना को केवल एक और अपराध मानकर भूल जाना सबसे बड़ी भूल होगी। यह चेतावनी है कि अपराधी तभी बेखौफ होते हैं, जब व्यवस्था में कहीं न कहीं भय का अभाव पैदा हो जाता है। उन्हें कानून से नहीं, कानून के निश्चित और निष्पक्ष क्रियान्वयन से डरना होगा। समाज को भी यह तय करना होगा कि वह अपराध के बाद मोमबत्ती जलाने वाला समाज बनेगा या अपराध से पहले अपनी बेटियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाला समाज।