कानून का राज पुलिसिंग की बुनियाद हो, राजनीतिक नियंत्रण या हिंसा नहीं: न्यायमूर्ति भुइयां

The rule of law, not political control or violence, should be the foundation of policing: Justice Bhuyan

रत्नज्योति दत्ता

नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने शुक्रवार को पुलिस व्यवस्था में जवाबदेही और सुधार की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि पुलिस की प्रतिबद्धता और जवाबदेही केवल कानून के शासन के प्रति होनी चाहिए, न कि राजनीतिक सत्ता के प्रति।

पुलिस हिरासत में मौतों, फर्जी मुठभेड़ों, राजनीतिक हस्तक्षेप और मणिपुर में जारी हिंसा का जिक्र करते हुए न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि प्रभावी पुलिसिंग और मानवाधिकारों की रक्षा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।

पूर्व आईपीएस अधिकारी यशोवर्धन आजाद की पुस्तक Policing the Republic के विमोचन के अवसर पर उन्होंने पुलिस की भूमिका पर व्यापक सवाल उठाए।

पुलिस हिरासत में मौतों के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि संसद में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 में देश में 170 हिरासत में मौतें हुईं, जबकि 2024-25 में यह संख्या 140 थी।

उन्होंने सवाल किया, “क्या किसी नागरिक को पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने के क्षण उसका जीवन का मौलिक अधिकार छोड़ देना पड़ता है? क्या गिरफ्तारी के साथ ही किसी नागरिक के जीवन के अधिकार को स्थगित किया जा सकता है?”

डी.के. बसु मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि कानून के शासन वाले सभ्य समाज में हिरासत में मौत “सबसे जघन्य अपराधों में से एक” है।

न्यायमूर्ति भुइयां ने फर्जी मुठभेड़ों को लेकर भी पुलिस को कड़ा संदेश दिया। प्रकाश कदम बनाम रामप्रसाद विश्वनाथ गुप्ता मामले का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी मुठभेड़ों को कानून के शासन की मूल भावना के विरुद्ध माना है।

उन्होंने कहा, “मुठभेड़ की विचारधारा एक आपराधिक विचारधारा है।” उनके अनुसार, फर्जी मुठभेड़ कानून के शासन की बुनियाद को ही कमजोर करती हैं।

मणिपुर की स्थिति पर चिंता जताते हुए न्यायमूर्ति भुइयां ने राज्य को “भारत का रत्न” बताया और कहा कि यह प्रतिभाशाली कलाकारों, विद्वानों और खिलाड़ियों की भूमि है। इसके बावजूद लंबे समय से जारी हिंसा और अशांति पर उन्होंने दुख व्यक्त किया।

उन्होंने कहा कि पुलिस, अर्धसैनिक बलों, असम राइफल्स और सेना की बड़ी मौजूदगी के बावजूद मणिपुर में शांति कायम नहीं हो पाना गंभीर चिंता का विषय है।

“सुरक्षाबलों की मौजूदगी के लिहाज से शायद सबसे अधिक सुदृढ़ राज्यों में से एक होने के बावजूद शांति अब भी दूर है। मणिपुर की त्रासदी हम सभी के लिए एक सबक है,” उन्होंने कहा।

पुलिस सुधारों की आवश्यकता पर जोर देते हुए न्यायमूर्ति भुइयां ने 2006 के प्रकाश सिंह फैसले का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पुलिस पर राजनीतिक कार्यपालिका का अत्यधिक नियंत्रण उसे कानून की प्रक्रिया को प्रभावित करने का माध्यम बना सकता है और इससे अधिनायकवाद को बढ़ावा मिलने तथा लोकतंत्र की नींव कमजोर होने का खतरा रहता है।

उन्होंने स्पष्ट कहा, “पुलिस की प्रतिबद्धता, कर्तव्यनिष्ठा और जवाबदेही केवल कानून के शासन के प्रति होनी चाहिए।”

हालांकि, न्यायमूर्ति भुइयां ने पुलिस बल की कठिन परिस्थितियों को भी स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि कई पुलिसकर्मी सीमित संसाधनों, अपर्याप्त बुनियादी ढांचे और कर्मचारियों की कमी के बावजूद पूरी ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाते हैं।

व्यापक संस्थागत गिरावट का जिक्र करते हुए उन्होंने असम के पूर्व मुख्यमंत्री शरत चंद्र सिन्हा के 1991 के भाषण को याद किया और कहा कि सामाजिक पतन का असर किसी एक संस्था तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका भी उससे प्रभावित होती हैं।

न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि मानवाधिकारों की रक्षा और प्रभावी पुलिसिंग साथ-साथ चल सकती हैं।

“पुलिसिंग और मानवाधिकारों की रक्षा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। बिना किसी अतिरेक या मानवाधिकारों के उल्लंघन के भी प्रभावी पुलिसिंग संभव है,” उन्होंने कहा।

उन्होंने पुलिस बल से औपनिवेशिक दौर की मानसिकता और कार्यशैली से बाहर निकलकर एक आधुनिक, संवेदनशील और नागरिक-केंद्रित बल के रूप में विकसित होने का आह्वान किया।