अशोक भाटिया
भारत के विश्वविद्यालय केवल शैक्षणिक डिग्रियां बांटने वाले संस्थान नहीं रहे हैं, बल्कि वे देश की राजनीतिक चेतना को दिशा देने वाले वैचारिक ऊर्जा-केंद्र रहे हैं। देश की स्वतंत्रता के संघर्ष से लेकर आपातकाल के विरोध और सामाजिक न्याय के आंदोलनों तक, परिसरों की हलचल ने हमेशा राष्ट्रीय राजनीति का मार्ग प्रशस्त किया है। परंतु, हाल के वर्षों में भारतीय छात्र राजनीति के भीतर जो बुनियादी और ढांचागत बदलाव आया है, वह आधुनिक भारत के राजनीतिक इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय है। दशकों तक जिन विश्वविद्यालयों पर वाम-उदारवादी और पारंपरिक विपक्षी विचारधाराओं का एकाधिकार माना जाता था, आज वहां भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रवादी विचारधारा और उसके छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का दबदबा न केवल संगठनात्मक रूप से स्थापित हुआ है, बल्कि विमर्श के धरातल पर भी उसने केंद्रीय स्थान प्राप्त कर लिया है।
इस बदलाव के सबसे जीवंत प्रतीक और साक्षी देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के परिसर बने हैं। दिल्ली की छात्र राजनीति का मिजाज हमेशा से देश की मुख्यधारा की सत्ता का लिटमस टेस्ट रहा है। हाल ही में संपन्न हुए दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव के नतीजों ने इस वैचारिक बदलाव पर एक बार फिर मुहर लगा दी है, जहां ABVP ने केंद्रीय पैनल के तीन प्रमुख पदों—अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव—पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की है。अध्यक्ष पद पर यश डाबास की यह शानदार विजय केवल एक छात्र संगठन की जीत नहीं है, बल्कि यह दिल्ली के उस व्यापक राजनीतिक बदलाव की गूंज है, जिसने परिसरों में वाम-उदारवादी और विपक्षी छात्र विमर्शों के ताने-बाने को पूरी तरह बिखेर कर रख दिया है। यह वैचारिक कायाकल्प और पुराने आंदोलनों का बिखराव चुनावी प्रभाव से कहीं आगे बढ़कर, भारतीय छात्र के मानस, उसकी प्राथमिकताओं और राष्ट्रीय अस्मिता के प्रति उसके दृष्टिकोण में आए गहरे बदलाव की कहानी कहता है।
दिल्ली की राजनीति और यहाँ के शिक्षण संस्थानों के बीच का अंतर्संबंध हमेशा से बहुत गहरा रहा है। मुख्यधारा की राजनीति में राष्ट्रीय विमर्शों के केंद्र में आने के बाद, दिल्ली के युवा वोटर का मिजाज पूरी तरह बदल गया है। कांग्रेस समर्थित NSUI और वामपंथी छात्र संगठनों (AISA-SFI) ने लंबे समय तक यह प्रचारित करने का प्रयास किया कि देश का युवा मौजूदा व्यवस्था से पूरी तरह विमुख हो चुका है। वे दिल्ली के जंतर-मंतर पर होने वाले विभिन्न विरोध प्रदर्शनों और तात्कालिक आंदोलनों के सहारे परिसरों में एक तीखा सरकार-विरोधी नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश कर रहे थे।लेकिन जब डूसू के ताजा चुनावी नतीजे सामने आए, तो विपक्ष का यह दावा पूरी तरह खोखला साबित हुआ। दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘जेन-जी’ और जागरूक युवा छात्रों ने नकारात्मकता और अनवरत विरोध की राजनीति को पूरी तरह खारिज कर दिया। राष्ट्रीय राजधानी के इन युवा मतदाताओं ने ‘राष्ट्र-प्रथम’ और सकारात्मक राष्ट्रवाद के विचार पर अपना भारी भरोसा जताया है।
राष्ट्रवादी विचारकों का मानना है कि इन आंदोलनों का बिखराव इसलिए हुआ क्योंकि इन्होंने अपनी ‘साख’ खो दी। छात्रों को यह समझने में देर नहीं लगी कि जिस आंदोलन को छात्र-कल्याण का नाम दिया जा रहा था, उसके पीछे देश की मुख्यधारा के कुछ खास राजनीतिक दलों का एजेंडा काम कर रहा था। जब छात्र आंदोलन स्वतःस्फूर्त न रहकर ‘प्रायोजित’ और राजनीतिक बैसाखियों पर टिके दिखने लगे, तो उनका नैतिक आधार समाप्त हो गया। कोई भी आंदोलन तब तक जीवित नहीं रह सकता जब तक आम छात्र उसे पवित्र और न्यायसंगत न मानें। जब आंदोलनों से देशहित का तत्व गायब हुआ, तो उनका ताना-बाना बिखरना तय था।
इस पूरे परिदृश्य में मुख्यधारा के विपक्षी दलों और उनके छात्र संगठनों की भूमिका भी आत्मघाती रही। विपक्ष लंबे समय तक दिशाहीनता का शिकार रहा। परिसरों में जब भी कोई स्थानीय या शैक्षणिक मुद्दा उठा—चाहे वह फीस वृद्धि का हो या प्रशासनिक विसंगतियों का—विपक्ष ने उसे तुरंत राष्ट्रीय स्तर पर सरकार को उखाड़ फेंकने के एक बड़े राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की। परिणाम यह हुआ कि वास्तविक छात्र मुद्दे राजनीतिक नूराकुश्ती की भेंट चढ़ गए।
यदि हम केवल एक पक्ष को देखकर निष्कर्ष न निकालें। यदि वैचारिक और चुनावी स्तर पर भाजपा समर्थित संगठन परिसरों में अग्रिम मोर्चे पर दिखते हैं, तो इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि युवा पूरी तरह संतुष्ट हैं या परिसरों में कोई समस्या नहीं है। राष्ट्रवाद की इस लहर के नीचे आर्थिक और प्रशासनिक मोर्चे पर युवाओं के भीतर एक गहरी, शांत लेकिन तीव्र अंतर्धारा भी बह रही है।हाल के वर्षों में देश ने राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में अनियमितताओं और पेपर लीक के गंभीर संकटों को देखा है। इन घटनाओं ने दिल्ली और देश भर के उन करोड़ों मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों के छात्रों के भरोसे को तोड़ा है जो रात-दिन एक करके सरकारी नौकरियों या प्रतिष्ठित संस्थानों में दाखिले की तैयारी करते हैं। जब प्रशासनिक विफलताओं के कारण युवाओं का भविष्य अधर में लटकता है, तो उनका गुस्सा किसी विचारधारा या दल की सीमा को नहीं मानता। इसके साथ ही, दिल्ली जैसे महंगे शहर में शिक्षा की बढ़ती लागत, हॉस्टल की कमी और सम्मानजनक रोजगार का अभाव ऐसे ज्वलंत मुद्दे हैं जो सरकार के तमाम दावों के सामने एक बड़ा प्रश्नचिह्न बनकर खड़े रहते हैं।
गौरतलब है कि दिल्ली के परिसरों और छात्र राजनीति में भाजपा और उसकी वैचारिक सहयात्रियों का बढ़ता दबदबा कोई तात्कालिक या सतही घटना नहीं है। इसके पीछे एक दशक की निरंतर वैचारिक मेहनत, राष्ट्रवाद का एक ठोस-आकर्षक नैरेटिव और विपक्ष की रणनीतिक विफलताएं हैं। पुराने आंदोलनों का ताना-बाना इसलिए बिखरा क्योंकि वे समय की नब्ज को नहीं पहचान सके, उन्होंने राष्ट्रीय संवेदनाओं की अनदेखी की और वे आम छात्रों की व्यावहारिक प्राथमिकताओं से कट गए।
परंतु, सत्ता पक्ष के लिए भी यह समय आत्ममुग्ध होने का नहीं है। वैचारिक और सांस्कृतिक मुद्दे युवाओं को एक सीमा तक जोड़ सकते हैं, लेकिन अंततः युवा मन अपनी व्यावहारिक समस्याओं का ठोस समाधान चाहता है। दिल्ली विश्वविद्यालय से लेकर जेएनयू तक का छात्र अब यह देखना चाहेगा कि जो वादे चुनाव के समय किए गए थे, वे धरातल पर कितने उतरते हैं। पेपर लीक मुक्त परीक्षा प्रणाली, पारदर्शी चयन प्रक्रिया, गुणवत्तापूर्ण और सस्ती शिक्षा, और सबसे महत्वपूर्ण—सम्मानजनक रोजगार के अवसर; ये वे बुनियादी जरूरतें हैं जिन पर आने वाले समय में देश की छात्र राजनीति की वास्तविक दिशा तय होगी। दिल्ली के हालिया कैंपस नतीजों ने एक नई लकीर खींच दी है, अब यह देखना दिलचस्प होगा कि विपक्ष इस नई हकीकत से क्या सबक लेता है।





