एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी
वैश्विक स्तरपर दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति, नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक जवाबदेही की बहस के केंद्र में है।मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे और चुनावी सुधारों की मांग को लेकर 10 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन पर पुलिस की कार्रवाई ने ऐसा विवाद खड़ा कर दिया,जो अब सुप्रीम कोर्ट की 11अक्टूबर 2026 को विशेष रविवार सुनवाई और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय की चिंता तक पहुंच गया है।भारत ने संयुक्त राष्ट्र की टिप्पणी को अपने आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप बताते हुए खारिज किया है। अब यह केवल एक प्रदर्शन की अनुमति का विवाद नहीं रह गया है।इसके केंद्र में पांच बड़े सवाल हैं,क़्या शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को पर्याप्त संरक्षण मिला, क्या सार्वजनिक व्यवस्था के नाम पर लगाए गए प्रतिबंध आनुपातिक थे, क्या सार्वजनिक परिवहन और इंटरनेट सेवाओं को प्रभावित करना ज़रूरी था,क्या हिरासत की प्रक्रिया कानूनके अनुरूप रही और क़्या चुनावी संस्थाओं पर उठ रहे सवालों का जवाब सटीकता से संवाद से दिया जाएगा या टकराव से?
साथियों बात अगर हम जंतर-मंतर 1.0 से 2.0 तक: शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद अब चुनाव प्रमुख पर निशाना इसको समझने की करें तो, इस आंदोलन की राजनीतिक पृष्ठभूमि समझना ज़रूरी है।उपलब्ध समाचारों के अनुसार सीजेपी ने पहले भी युवाओं के मुद्दों को लेकर प्रदर्शन किए थे और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद इस आंदोलन को अपनी राजनीतिक ताकत के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया।अब 10 अक्टूबर के प्रदर्शन का केंद्र मुख्य निर्वाचन का इस्तीफा और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में कथित अनियमितताओं की जांच हैआंदोलनकारियों का आरोप है कि मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटने से चुनावी निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।दूसरी ओर,निर्वाचन आयोग और सत्तारूढ़ पार्टी ने आरोपों को खारिज़ किया है।इसलिए इन दावों को सिद्ध तथ्य नहीं, बल्कि जांच और जवाबदेही की मांग से जुड़े आरोपों के रूप में देखना चाहिए।युवाओं के इस आंदोलन को जंतर-मंतर 2.0 इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि यह केवल किसी एक मंत्री या अधिकारी के विरुद्ध प्रदर्शन नहीं,बल्कि संस्थाओं की जवाबदेही और चुनावी प्रक्रिया पर भरोसे से जुड़ी बहस बन गया है।हालांकि,यह कहना कि केंद्र सरकार निश्चित रूप से डर गई है, अभी उपलब्ध तथ्यों से साबित नहीं होता।इतना ज़रूर है कि व्यापक सुरक्षा प्रबंध,नेताओं की हिरासत, परिवहन प्रतिबंध और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई ने विवाद को राष्ट्रीय स्तर से अंतरराष्ट्रीय चर्चा तक पहुंचा दिया।
साथियों बात अगर हम प्रदर्शन की अनुमति क्यों नहीं मिली? सुरक्षा बनाम मौलिक अधिकार को समझने की करें तो, दिल्ली पुलिस ने 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर दिया। पुलिस के अनुसार,आयोजकों ने 7 अक्टूबर को सूचना दी थी,जबकि सामान्य प्रक्रिया के तहत कम-से-कम दस दिन पहले आवेदन अपेक्षित होता है। पुलिस ने पिछले प्रदर्शनों में नियमों और लिखित आश्वासनों के कथित उल्लंघन, यातायात संबंधी कठिनाइयों तथा कानून- व्यवस्था और सार्वजनिक सुरक्षा की आशंकाओं का भी हवाला दिया।केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से भी संभावित कानून-व्यवस्था संबंधी जोखिमों को लेकर सतर्कता बरतने की बात सामने आई।यहां संवैधानिक प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 19(1)(ख) शांतिपूर्वक तथा बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है। लेकिन ये अधिकार पूर्णतः निरंकुश नहीं हैं; सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य संवैधानिक आधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इसका अर्थ यह भी नहीं कि अनुमति न मिलने पर प्रशासन को हर परिस्थिति में असीमित कार्रवाई का अधिकार मिल जाता है।प्रतिबंधों की आवश्यकता, अवधि भौगोलिक सीमा और अनुपात की समीक्षा न्यायिक कसौटी पर की जा सकती है।दिल्ली में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 163 के तहत निषेधात्मक आदेश लागू होने की बात भी सामने आई। यह धारा तत्काल रोकथाम और संभावित खतरे से बचाव के लिए आदेश जारी करने का प्रावधान देती है। किंतु इसका प्रयोग भी कानून के अनुसार होना चाहिए। इसी बिंदु पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की स्वतंत्रता और प्रशासन की सुरक्षा संबंधी जिम्मेदारी आमने- सामने दिखाई दी।
साथियों बात अगर हम हजारों हिरासतों का विवाद, मेट्रो बंदी और सुप्रीम कोर्ट की चिंता को समझने की करें तो 10 अक्टूबर को दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई।समाचार एजेंसियों की रिपोर्टों में दो हजार से अधिक लोगों को हिरासत में लिए जाने का उल्लेख है;कुछ रिपोर्टों में इससे अधिक आंकड़े भी सामने आए। सीजेपी के संस्थापक तथा सह-संयोजक और एक अन्य को दिल्ली पहुंचने पर हिरासत में लिए जाने की खबर आई। एक यूट्यूबर और विपक्षी नेताओं सहित अन्य लोगों की हिरासत का मामला भी चर्चा में रहा।अलग-अलग रिपोर्टों में संख्या और हिरासत की परिस्थितियों के विवरण एक समान नहीं हैं,इसलिए किसी एक अपुष्ट आंकड़े को अंतिम सरकारी संख्या मानना उचित नहीं होगा। विवाद केवल हिरासत तक सीमित नहीं रहा। दिल्ली के कई मेट्रो स्टेशनों पर प्रवेश प्रतिबंधित किए गए और रेल सेवाओं में व्यवधान की खबरें आईं। वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अदालत में दावा किया कि लोगों को प्रदर्शन स्थल से दूर क्षेत्रों और ट्रेनों से भी हिरासत में लिया गया, इंटरनेट सेवाएं बाधित हुईं और वकीलों, महिलाओं,छात्रों तथापत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार हुआ। ये आरोप सुनवाई के दौरान प्रस्तुत किए गए थे; इन्हें सभी मामलों में न्यायिक रूप से सिद्ध निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर को ही सार्वजनिक परिवहन पर पूर्ण प्रतिबंध के बजाय नियंत्रित संचालन और आम जनता की सुविधा का ध्यान रखने पर जोर दिया था।11 अक्टूबर को रविवार होने के बावजूद न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी.मोहना की विशेष पीठ ने संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई की। इस असाधारण सुनवाई ने सटीकता से विवाद को नया मोड़ दिया।
साथियों बात अगर हम रविवार को सुप्रीम कोर्ट की विशेष सुनवाई: सरकार और प्रशासन को कड़े संदेश को समझने की करें तो 11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में दो प्रमुख प्रकार की याचिकाएं सुनवाई के लिए आईं।पहली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका, जिसमें हिरासत में लिए गए व्यक्तियों की स्थिति और हिरासत की वैधता पर सवाल उठाए गए।वरिष्ठ अधिवक्ता ने विपक्षी नेताओं की एहतियाती हिरासत को चुनौती दी। दूसरी,अवमानना याचिका, जिसमें आरोप लगाया गया कि अधिकारियों नेसार्वजनिक परिवहन पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाने संबंधी 9 अक्टूबर के न्यायालयीन निर्देशों का पालन नहीं किया। एक अधिवक्ता की याचिका इसी विवाद से संबंधित थी। सुनवाई के दौरान अनेक वरिष्ठ वकीलों ने हिरासत, बैरिकेडिंग, मेट्रो बंदी और वकीलों की न्याय तक पहुंच बाधित होने के आरोप उठाए।अदालत के सामने पुलिस के कथित दुर्व्यवहार और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के साथ व्यवहार को लेकर भी दलीलें रखी गईं।इन दावों पर संबंधित अधिकारियों का पक्ष और न्यायिक जांच महत्वपूर्ण होगी।सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में मेट्रो सेवाएं सामान्य कार्यक्रम के अनुसार चलाने,इंटरनेट सेवाओं को कानून के विपरीत बाधित न करने,बैरिकेडिंग की समीक्षा करने और बिना वैधानिक प्रक्रिया किसी को हिरासत में नहीं लेने पर जोर दिया।अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 163 के आदेश से प्रभावित क्षेत्र के बाहर लोगों की आवाजाही और शांतिपूर्ण एकत्र होने के अधिकार को अनावश्यक रूपसे नहीं रोका जाना चाहिए।न्यायालय परिसर के बाहर धारा 163 का उल्लेख करने वाला बोर्ड हटाने का निर्देश भी दिया गया, ताकि न्याय तक पहुंच बाधित न हो। संबंधित अधिकारियों से जवाब मांगते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किए गए।
साथियों बात अगर हम तीन आंदोलन कर्ताओं के रहा होने और सीजेपी प्रमुख क़ी दादी के निधन पर क़्या हुआ? इसको समझने की करें तो इस पूरे घटनाक्रम में सबसे भावनात्मक प्रसंग सीजेपी संस्थापक की दादी के निधन का रहा। समाचारों के अनुसार,उनकी 85 वर्षीय दादी का महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में निधन हुआ था। तथा वे दिल्ली में हिरासत में थे,जिसके कारण उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने को लेकर सवाल उठे। दिल्ली पुलिस ने सार्वजनिक रूप से कहा कि उनको निधन की जानकारी संवेदनशीलता के साथ दी गई थी और अंतिम संस्कार के लिए उनके गृह नगर जाने में मानवीय आधार पर सहायता की पेशकश की गई थी।दूसरी ओर सीजेपी और उनके परिवार से जुड़े लोगों ने सूचना और संपर्क को लेकर सवाल उठाए। इस प्रकार पुलिस का पक्ष और परिवार की आपत्ति अलग- अलग सामने आईं;दोनों को स्पष्ट करने के लिए स्वतंत्र पुष्टि महत्वपूर्ण है।11अक्टूबर को कार्यकारी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने के बाद,सीजेपी प्रमुख व अन्य दो को रिहा कर दिया गया।रिपोर्टों के मुताबिक,रिहाई की शर्त एक वर्ष तक शांति बनाए रखने से संबंधित थी।
साथियों बात अगर हम संयुक्त राष्ट्र पहुंचा मामला: मानवा धिकार कार्यालय ने क्या कहा? इसको समझने की करें तो,दिल्ली की कार्रवाई पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया ने विवाद को और व्यापक बनाया।संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (ओएचसीएचआर) के प्रवक्ता थमीम अल-खीथान ने प्रदर्शनकारियों, आंदोलन के नेताओं, नागरिक समाज संगठनों के सदस्यों, वकीलों और पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की खबरों पर चिंता व्यक्त की। कार्यालय ने अधिकारियों से शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का सम्मान करने, कानून लागू करने वाले कर्मियों से अत्यधिक संयम बरतने और मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए लोगों को तत्काल तथा बिना शर्त रिहा करने का आग्रह किया। उसने चिंताओं के समाधान के लिए सार्थक संवाद की जरूरत भी बताई। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र की टिप्पणी मानवाधिकार संबंधी चिंता और अपील थी; इसे भारत के विरुद्ध किसी न्यायिक फैसले या औपचारिक दंडात्मक कार्रवाई के रूप में प्रस्तुत करना गलत होगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस तरह की टिप्पणियां सरकारों की कार्रवाई, नागरिक स्वतंत्रताओं और लोकतांत्रिक मानकों पर सार्वजनिक बहस को सटीकता से प्रभावित कर सकती हैं।
साथियों बात अगर हम भारत का पलटवार:हमारे आंतरिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप न करें इसको समझने की करें तो संयुक्त राष्ट्र की टिप्पणी के जवाब में जिनेवा स्थित संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन ने 10 अक्टूबर की देर रात सोशल मीडिया मंच एक्स पर कड़ा वक्तव्य दिया। भारत ने ओएचसीएचआर की चिंताओं को गलत संदर्भ पर आधारित और देश के आंतरिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप बताया।भारत का तर्क था कि वह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने का अधिकार संविधान द्वारा सुनिश्चित है और मजबूत संस्थाओं, स्वतंत्र न्यायपालिका तथा स्वतंत्र मीडिया से संरक्षित है। साथ ही, भारत ने कहा कि हर लोकतंत्र की तरह यहां भी सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए उचित प्रतिबंध लागू होते हैं, अधिकारी कानून के अनुसार कार्य करते हैं और शिकायतों के निवारण के लिए अदालतें उपलब्ध हैं।भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय से निष्पक्षता तथा गैर-चयनात्मक दृष्टिकोण अपनाने और दुनिया के अन्य हिस्सों में होने वाले बड़े प्रदर्शनों पर भी समान ध्यान देने की अपेक्षा जताई। इस प्रकार विवाद अब केवल दिल्ली पुलिस की कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय संप्रभुता, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार निगरानी और लोकतांत्रिक जवाबदेही के बीच संतुलन की बहस बन गया।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि असली परीक्षा सत्ता की ताकत की नहीं, लोकतंत्र के संतुलन की हैजंतर -मंतर 2.0 ने भारत के सामने एक असहज लेकिनजरूरी सवाल खड़ा किया है,लोकतंत्र में असहमति को किस तरह संभाला जाना चाहिए?हमेशा प्रशासन का दायित्व सार्वजनिक सुरक्षा यातायात और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है।दूसरी ओर,नागरिकों को शांतिपूर्ण विरोध, अपनी बात रखने और न्यायालय तक पहुंचने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है।किसी भी पक्ष की कार्रवाई को इन दोनों जिम्मेदारियों की कसौटी पर परखना होगा।अब असली कसौटी यह होगी कि क्या सरकार, पुलिस और प्रदर्शनकारी संवाद का रास्ता अपनाते हैं; क्या चुनावी अनियमितताओं के आरोपों पर तथ्यपरक जवाब सामने आते हैं; और क्या अदालत की निगरानी में नागरिक अधिकारों तथा सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन सुनिश्चित किया जाता है। लोकतंत्र की मजबूती इस बात से नहीं मापी जाती कि विरोध की आवाज कितनी आसानी से रोकी जा सकती है, बल्कि इससे मापी जाती है कि संस्थाएं उस आवाज का जवाब कितनी पारदर्शिता, निष्पक्षता और संवैधानिक मर्यादा के साथ देती हैं।




