जब इंसानियत ने कैमरा ऑन किया और जमीर ऑफ

When humanity turned on the camera and turned off the conscience

अजय कुमार

जमुई की सड़क पर उस शाम जो हुआ, वह सिर्फ दो नाबालिगों के साथ हुई बदसलूकी का मामला नहीं था, बल्कि हमारी सामूहिक अंतरात्मा की चीख थी। तारीख 19 सितंबर थी, जब अंधेरा होने से पहले ही कुछ लोगों ने कानून को अपनी जेब में रख लिया और राह चलते बच्चों को अपमानित करना शुरू कर दिया। लेकिन इस पूरी घटना का सबसे खौफनाक पहलू वह मोबाइल स्क्रीन थी, जिससे यह तमाशा कैद किया जा रहा था। किसी ने रोकने की जहमत नहीं उठाई, किसी ने आगे बढ़कर उन बच्चों को बचाने की कोशिश नहीं की, बल्कि सबकी उंगलियां रिकॉर्डिंग का बटन दबाने में व्यस्त थीं। कुछ ही घंटों में वह वीडियो हवा की तरह तैरता हुआ फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स के सर्वर तक पहुंच गया। बिहार पुलिस ने जब इस मामले की तहकीकात की और विशेष अनुसंधान दल यानी एसआईटी का गठन किया, तो यह चौंकाने वाला सच सामने आया कि करीब 120 ऐसे सोशल मीडिया प्रोफाइल्स थे जिन्होंने उस पीड़ित बच्ची और बच्चे की पहचान उजागर करने वाले वीडियो को धड़ल्ले से वायरल किया था। यह आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं हैं, बल्कि इस बात का पुख्ता सबूत हैं कि हम डिजिटल भीड़तंत्र की उस आग में सुलग रहे हैं जहां तमाशा देखना और उसे बेचना ही नया धर्म बन चुका है।

यह कोई पहली बार नहीं हुआ है जब तकनीक इंसानियत पर भारी पड़ी हो। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़े और विभिन्न साइबर सेल की रिपोर्ट्स गवाह हैं कि भारत में पिछले पांच वर्षों में आपत्तिजनक वीडियो, मॉब लिंचिंग के फुटेज और पॉक्सो एक्ट के दायरे में आने वाले संवेदनशील मामलों के वीडियो वायरल होने की घटनाओं में तीन सौ प्रतिशत से ज्यादा का उछाल आया है। डिजिटल इंडिया के इस दौर में आज देश के नब्बे प्रतिशत से अधिक युवाओं के हाथ में स्मार्टफोन है। एक सेकंड में मैसेज भेजने की ताकत हमारे पास है, लेकिन उसी एक सेकंड में यह सोचने की क्षमता खत्म हो गई है कि स्क्रीन के उस पार कोई खून-पसीने का इंसान जी रहा है। जमुई की इस घटना के बाद जब पुलिस ने आरोपियों की पहचान कर कार्रवाई की, तब जाकर कुछ लोगों को कानून का डर दिखा, लेकिन उन बच्चों के जेहन में जो जख्म हमेशा के लिए छोड़ दिए गए, उसकी भरपाई कौन करेगा? जब किसी नाबालिग की पहचान सोशल मीडिया पर सार्वजनिक कर दी जाती है, तो वह बच्चा समाज के बीच जीने लायक नहीं रहता। उसे हर नजर शक और उपहास से देखती है। कानून साफ कहता है कि किशोर न्याय अधिनियम और पॉक्सो कानून के तहत किसी भी पीड़ित बच्चे का नाम, चेहरा या पहचान उजागर करना एक गंभीर अपराध है, जिसके लिए जेल की हवा तक हो सकती है। इसके बावजूद, लाइक्स, व्यूज और रीच के भूखे हमारे तथाकथित सोशल मीडिया योद्धाओं ने उस कानून को पैरों तले रौंद डाला।

इस पूरी परिघटना के पीछे एक गहरा मनोवैज्ञानिक संकट काम कर रहा है। आज का इंसान वर्चुअल दुनिया की लाइमलाइट का इस हद तक आदी हो चुका है कि उसे हर दुखद घटना में अपना कंटेंट नजर आने लगा है। सड़क पर एक्सीडेंट हुआ हो, किसी के साथ मारपीट हो रही हो या कोई सामाजिक हिंसा हो, हमारा पहला रिएक्शन अब मदद करना नहीं, बल्कि वीडियो बनाना रह गया है। यह ट्रेंड समाजशास्त्रियों के लिए भी गहरी चिंता का विषय बनता जा रहा है। लोग यह मानकर बैठ गए हैं कि वीडियो बनाकर अपलोड कर देने से वे किसी बड़े सामाजिक बदलाव का हिस्सा बन रहे हैं। उन्हें लगता है कि वे भ्रष्टाचार या अन्याय के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं। लेकिन यह सरासर भ्रम है। जब आप किसी पीड़िता का वीडियो बिना उसका चेहरा धुंधला किए, बिना उसकी निजता का ख्याल रखे वायरल करते हैं, तो आप उस अपराध में बराबर के साझीदार बन जाते हैं। जमुई कांड में जिन 120 प्रोफाइल्स की पहचान की गई, वे सिर्फ दर्शक नहीं थे, बल्कि वे उस डिजिटल मॉब के हिस्से थे जो परोक्ष रूप से उस अपराध को बार-बार दोहरा रहा था। सोचिए, उस पीड़ित बच्ची पर क्या बीती होगी जब उसने इंटरनेट के समंदर में अपनी ही बर्बादी का वीडियो हजारों लोगों को शेयर करते देखा होगा। क्या यह किसी और बड़े जुर्म से कम है?

तकनीक अपने आप में न तो अच्छी होती है और न बुरी, उसका चरित्र इस बात से तय होता है कि उसे इस्तेमाल करने वाला इंसान कैसा है। आज हमारे पास दुनिया की सबसे तेज इंटरनेट स्पीड है, 5G की कनेक्टिविटी है और हर हाथ में एक ऐसा मिनी कंप्यूटर है जो पूरी दुनिया की जानकारी सेकंडों में ला सकता है। लेकिन इसी तकनीक के साथ हमारी संवेदनाएं लगातार क्षीण होती जा रही हैं। हम स्क्रीन पर चैटिंग करते वक्त जितने इमोजी भेजते हैं, असल जिंदगी में हमारे भीतर उतनी ही भावनाएं मर चुकी हैं। जमुई की घटना ने इस कड़वे सच को एक बार फिर हमारे सामने लाकर रख दिया है। हमें यह समझना होगा कि सोशल मीडिया कोई अदालत नहीं है। यहां फैसले सुनाने का हक किसी को नहीं दिया गया है। देश में संविधान है, पुलिस है, न्यायपालिका है जो साक्ष्यों के आधार पर काम करती है। यदि आपको कहीं कोई अन्याय होते दिखे, तो आपका कर्तव्य यह नहीं है कि आप कैमरा ऑन करके उसे वायरल कर दें। आपका पहला और सबसे बड़ा कर्तव्य यह है कि आप उस पीड़ित की रक्षा करें, पुलिस को सूचना दें और यदि संभव हो तो बिना अपनी जान जोखिम में डाले उसे सुरक्षित निकालें।

अब वक्त आ गया है कि हम अपनी डिजिटल आदतों की समीक्षा करें। अगली बार जब आपके फोन की स्क्रीन पर कोई ऐसा वीडियो फ्लैश हो जो किसी की मर्यादा को तार-तार कर रहा हो, तो उसे आगे बढ़ाने से पहले तीन सेकंड रुककर खुद से यह सवाल जरूर पूछें कि क्या इस शेयर से किसी की जिंदगी सुधरेगी या वह किसी गहरे गर्त में चली जाएगी? अगर जवाब ना में है, तो उस उंगली को रोक लीजिए जो शेयर का बटन दबाने के लिए मचल रही है। बच्चों को केवल कोडिंग और ऐप्स चलाना सिखाना काफी नहीं है, उन्हें यह भी पढ़ाना होगा कि डिजिटल दुनिया में इंसानियत की लक्ष्मण रेखा को कैसे पार नहीं करना है। जमुई की घटना एक चेतावनी है कि अगर हमने अभी भी अपनी सामूहिक चेतना को नहीं जगाया, तो वह दिन दूर नहीं जब हमारी मानवीय संवेदनाएं सिर्फ डिजिटल स्क्रीन के पिक्सल बनकर रह जाएंगी। हमें सिर्फ सोशल दिखने का ढोंग छोड़ने की जरूरत है, बल्कि असल मायनों में संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनने की आवश्यकता है, तभी एक स्वस्थ और सुरक्षित समाज की कल्पना की जा सकती है।