जम्मू-कश्मीर में पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग हुई तेज

Demand for full statehood for Jammu and Kashmir intensifies

महेन्द्र तिवारी

जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने 28 सितंबर 2026 को केंद्र शासित प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा तत्काल बहाल करने की मांग वाला प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित कर दिया। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला द्वारा प्रस्तुत इस प्रस्ताव के पारित होने के समय सदन में तीखा राजनीतिक टकराव देखने को मिला। भारतीय जनता पार्टी के विधायकों ने प्रस्ताव का विरोध किया और मतदान से पहले सदन से बाहर चले गए। प्रस्ताव में भारत सरकार से जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा तत्काल और आवश्यक रूप से बहाल करने का आग्रह किया गया तथा इसे केंद्र सरकार को भेजने का निर्णय लिया गया।

यह घटनाक्रम केवल एक राजनीतिक प्रस्ताव पारित होने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक स्थिति, निर्वाचित सरकार के अधिकार, केंद्र और केंद्र शासित प्रदेश के बीच शक्तियों का संतुलन तथा वर्ष 2019 के बाद बनी प्रशासनिक व्यवस्था जैसे कई महत्वपूर्ण प्रश्न जुड़े हुए हैं। अगस्त 2019 में तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य का पुनर्गठन करके जम्मू-कश्मीर और लद्दाख नाम के दो केंद्र शासित प्रदेश बनाए गए थे। जम्मू-कश्मीर को विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया, जबकि लद्दाख को बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। इसके बाद 2024 में जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव हुए और उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में निर्वाचित सरकार का गठन हुआ।

वर्तमान स्थिति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि जम्मू-कश्मीर में निर्वाचित विधानसभा और सरकार तो मौजूद है, लेकिन उसे अभी पूर्ण राज्य के समान संवैधानिक और प्रशासनिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं। इसी अंतर को मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने विधानसभा में अपने तर्क का आधार बनाया। उनका कहना है कि यदि जनता द्वारा चुनी गई सरकार मौजूद है तो उसे व्यापक प्रशासनिक अधिकार भी मिलने चाहिए। उन्होंने केंद्र से यह भी सवाल उठाया कि राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए जिस उचित समय की बात की जाती रही है, उस उचित समय का निर्धारण कब होगा। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय की उस टिप्पणी का भी उल्लेख किया जिसमें जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा जल्द बहाल करने की बात कही गई थी।

प्रस्ताव की भाषा ही विधानसभा में विवाद का प्रमुख कारण बनी। प्रस्ताव में वर्ष 2000 और वर्ष 2024 में विधानसभा द्वारा पारित पूर्व प्रस्तावों का उल्लेख किया गया है। वर्ष 2000 का प्रस्ताव जम्मू-कश्मीर के लिए अधिक स्वायत्तता की मांग से जुड़ा था, जबकि वर्ष 2024 में विधानसभा ने विशेष संवैधानिक दर्जे की बहाली से संबंधित प्रस्ताव पारित किया था। वर्तमान प्रस्ताव में इन पुराने प्रस्तावों का संदर्भ आने पर भारतीय जनता पार्टी के विधायकों ने आपत्ति जताई। विपक्ष का कहना था कि वह जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के पक्ष में है, लेकिन प्रस्ताव की भाषा और पुराने संवैधानिक संदर्भों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इस विवाद को समझने के लिए यह अंतर महत्वपूर्ण है कि पूर्ण राज्य का दर्जा और वर्ष 2019 से पहले की संवैधानिक स्थिति एक ही विषय नहीं हैं। पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने का अर्थ जम्मू-कश्मीर को राज्य की प्रशासनिक और संवैधानिक स्थिति देना है, जबकि विशेष दर्जे से संबंधित प्रश्न अलग संवैधानिक और न्यायिक पृष्ठभूमि से जुड़े हैं। विधानसभा की बहस में इन दोनों मुद्दों के संदर्भ एक साथ आने के कारण राजनीतिक मतभेद और तीखे हो गए। कुछ सदस्यों ने प्रस्ताव में अनुच्छेद 370, अनुच्छेद 35ए तथा वर्ष 2019 की घटनाओं का उल्लेख करने के लिए संशोधन भी सुझाए, लेकिन मुख्यमंत्री ने इन संशोधनों को वापस लेने का आग्रह किया।

28 सितंबर की कार्यवाही के दौरान विधानसभा में विरोध का स्तर काफी बढ़ गया। भारतीय जनता पार्टी के विधायक सदन के बीचोंबीच पहुंच गए और नारेबाजी की। उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष अब्दुल रहीम राथर के विरुद्ध भी विरोध जताया। विपक्षी विधायकों ने अध्यक्ष को हटाने से संबंधित प्रस्ताव पेश करने की कोशिश की। अध्यक्ष ने संबंधित नियमों का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे प्रस्ताव के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन आवश्यक है। इसके बाद विपक्षी विधायक सदन से बाहर चले गए और उनकी अनुपस्थिति में प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित हुआ।

इस पूरे घटनाक्रम का एक असामान्य पहलू प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से विधानसभा को भेजे गए पत्र भी रहे। जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव अटल डुल्लू और विधि सचिव अचल सेठी ने विधानसभा सचिवालय को अलग-अलग पत्र भेजकर प्रस्ताव को सदन में आगे न बढ़ाने की बात कही। इन पत्रों में प्रस्ताव से जुड़े न्यायिक विचाराधीन विषय का उल्लेख किया गया था। विधानसभा अध्यक्ष ने इस प्रकार के प्रशासनिक हस्तक्षेप पर आपत्ति जताई और इसे सदन के कामकाज में असामान्य हस्तक्षेप बताया। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी कहा कि उन्हें इन पत्रों की पहले से जानकारी नहीं थी।

यही प्रसंग केंद्र शासित प्रदेश की वर्तमान व्यवस्था से जुड़े एक बड़े प्रश्न को सामने लाता है। पूर्ण राज्य में निर्वाचित सरकार और प्रशासनिक तंत्र के बीच अधिकारों का स्वरूप अलग होता है, जबकि केंद्र शासित प्रदेश में उपराज्यपाल और केंद्र सरकार की भूमिका अधिक व्यापक होती है। जम्मू-कश्मीर में निर्वाचित सरकार और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच अधिकारों को लेकर समय-समय पर मतभेद सामने आते रहे हैं। मुख्यमंत्री ने विधानसभा में राजस्व विभाग और कुछ अन्य संस्थाओं के नियंत्रण का मुद्दा उठाते हुए सवाल किया कि निर्वाचित सरकार को जनता से जुड़े प्रशासनिक विषयों पर पर्याप्त अधिकार क्यों नहीं मिल रहे हैं।

हालांकि विधानसभा द्वारा पारित प्रस्ताव को लेकर एक संवैधानिक तथ्य स्पष्ट समझना आवश्यक है। विधानसभा का प्रस्ताव अपने आप जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान नहीं करता। यह निर्वाचित विधानसभा की ओर से केंद्र सरकार के सामने रखी गई औपचारिक राजनीतिक मांग है। राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से आवश्यक संवैधानिक और विधायी प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इसलिए 28 सितंबर को पारित प्रस्ताव का तत्काल प्रभाव जम्मू-कश्मीर की वर्तमान संवैधानिक स्थिति को बदलना नहीं है, बल्कि पूर्ण राज्य का दर्जा की मांग को औपचारिक रूप से केंद्र के सामने रखना है।

इस प्रस्ताव का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि जम्मू-कश्मीर में निर्वाचित सरकार के गठन के बाद राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग लगातार उठती रही है। सरकार का तर्क है कि विधानसभा चुनाव हो चुके हैं और जनता ने अपने प्रतिनिधि चुन लिए हैं, इसलिए अब पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। दूसरी ओर केंद्र और भारतीय जनता पार्टी की ओर से पूर्ण राज्य का दर्जा के प्रश्न पर अलग-अलग समय में यह कहा जाता रहा है कि उचित परिस्थितियों में इस दिशा में निर्णय लिया जाएगा। यही अंतर वर्तमान राजनीतिक बहस का प्रमुख आधार है।

जम्मू-कश्मीर की स्थिति सामान्य राज्यों से अलग और अत्यंत संवेदनशील रही है। इसकी भौगोलिक स्थिति, सीमावर्ती क्षेत्र, लंबे समय से चली आ रही सुरक्षा चुनौतियां और पाकिस्तान के साथ संबंध इसे अन्य राज्यों से अलग बनाते हैं। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने विधानसभा में यह तर्क भी रखा कि यदि राज्य का दर्जा बहाल करने को सुरक्षा स्थिति सामान्य होने से जोड़ा जाता है तो निर्णय अनिश्चित समय तक टल सकता है। दूसरी ओर विपक्षी पक्ष सुरक्षा परिस्थितियों और संवैधानिक विषयों को अलग दृष्टि से देखता है। इस मतभेद का समाधान राजनीतिक संवाद और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से ही संभव है।

इस पूरे विवाद में जम्मू-कश्मीर की जनता की अपेक्षाएं भी महत्वपूर्ण हैं। लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक अस्थिरता के बाद 2024 में विधानसभा चुनाव और निर्वाचित सरकार की स्थापना एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक परिवर्तन था। अब राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग जनता के प्रतिनिधियों के माध्यम से विधानसभा में रखी गई है। यदि केंद्र सरकार इस प्रस्ताव पर सकारात्मक राजनीतिक संवाद शुरू करती है तो इससे केंद्र और जम्मू-कश्मीर सरकार के बीच संबंधों में नई दिशा बन सकती है। यदि इस पर लंबे समय तक कोई स्पष्ट निर्णय नहीं होता है तो यह मुद्दा आगे भी राजनीतिक बहस का प्रमुख केंद्र बना रह सकता है।

अंततः 28 सितंबर 2026 का प्रस्ताव जम्मू-कश्मीर की संवैधानिक यात्रा में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पड़ाव है। इससे राज्य का दर्जा तत्काल बहाल नहीं हुआ है, लेकिन निर्वाचित विधानसभा ने अपनी मांग स्पष्ट रूप से केंद्र सरकार के सामने रख दी है। प्रस्ताव पर हुए विवाद ने यह भी दिखाया कि जम्मू-कश्मीर में पूर्ण राज्य के दर्जे का प्रश्न केवल प्रशासनिक अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ वर्ष 2019 के बाद की संवैधानिक व्यवस्था, पुराने राजनीतिक प्रस्ताव, केंद्र और निर्वाचित सरकार के संबंध तथा सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी जुड़ी हुई हैं। अब आगे की दिशा केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया, संवैधानिक प्रक्रिया और दोनों पक्षों के बीच होने वाले राजनीतिक संवाद पर निर्भर करेगी।