ज़िंदगी के रेतिले टीलों में जीवन का एकाकीपन

The solitude of life amidst the sandy dunes of existence

नीलम महाजन सिंह

कभी-कभी अपनों के बुरे बर्ताव से होने वाला दुख शरीर के अंगों को हमेशा के लिए नुकसान पहुँचा सकता है। ज़िंदगी सभी के लिए एक मुश्किल सफ़र है। इसीलिए, राजकुमार सिद्धार्थ को ज्ञान की प्राप्ति हुई; जब (बुद्ध बनने से पहले) उन्होंने अपना महल छोड़ा, तो उन्हें ‘चार दृश्य’ यानी इंसानी ज़िंदगी की चार सच्चाइयाँ दिखाई दीं, जिनसे उनके पिता ने उन्हें दूर रखा था। वे चार दृश्य थे: एक बूढ़ा आदमी की झुर्रियां, सफ़ेद बालों और झुकी हुई पीठ वाला कमज़ोर इंसान, जिसने उन्हें दिखाया कि बुढ़ापा हर किसी को आता है। एक बिमार आदमी; बिमारी से जूझता हुआ इंसान, जिसने उन्हें दिखाया कि दर्द व बिमारी ज़िंदगी का हिस्सा हैं। एक मृत आदमी—अंतिम संस्कार के लिए ले जाया जा रहा शव, जिसने उन्हें दिखाया कि मौत सभी के लिए तय है। एक घूमता हुआ साधु, शांत और सुकून भरा साधक जिसने दु:खों की सच्चाई जानने के लिए दुनियादारी छोड़ दी थी, जिससे राजकुमार को उम्मीद मिली कि इसका कोई जवाब मौजूद है। इन दृश्यों ने सिद्धार्थ को अंदर तक हिला दिया और उन्हें एहसास कराया कि दौलत और ऐशो-आराम किसी को भी दु:ख, बुढ़ापे या मौत से नहीं बचा सकते। इस गहरी समझ ने उन्हें अपनी शाही ज़िंदगी छोड़कर आध्यात्मिक सच्चाई की तलाश करने के लिए प्रेरित किया। हालाँकि ‘मैं हिंदू हूँ’, फिर भी मेरी ज़िंदगी पर बुद्ध के जीवन का बहुत असर पड़ा। मेरा जन्म अविभाजित जम्मू-कश्मीर के सराफ़ और महाजन परिवार में हुआ था। 1947 में भारत के बँटवारे की भयानक त्रासदी का उन लोगों पर गहरा असर पड़ा जो कश्मीर की तरफ़ से आए थे। मेरी माँ श्रीमती लज्जा देवी और पिता श्री जसवंत राय जी ने मीरपुर [जो अब पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में है] में खरबों की कीमत का सोना-चाँदी छोड़ दिया था। वे बहादुर और हिम्मत वाले थे, जिन्होंने जम्मू और फिर दिल्ली में अपनी ज़िंदगी नए सिरे से शुरू की। मेरे पिता अरबपति थे, लेकिन सादा जीवन जीते थे। उन्होंने युद्ध में बेघर हुए शरणार्थियों का एक मुख्य कार्य समूह बनाया। प्रधान मंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और तत्कालीन आवास मंत्री मेहर चंद खन्ना के साथ कई बैठकों के बाद, दिल्ली के पटेल नगर, राजेंद्र नगर, लाजपत नगर और अन्य इलाकों में घर आवंटित किए गए। प्यार और ज़िंदा रहने की अटूट भावना ने 1947 की पीढ़ी को अपनी ज़िंदगी नए सिरे से शुरू करने, आगे बढ़ने और कामयाब होने के लिए प्रेरित किया! इसलिए बचपन से ही हमने भारत के भयानक बँटवारे की अनगिनत कहानियाँ सुनीं। ‘ब्रिटिश साम्राज्यवाद की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति’ ने एशिया की जियोपॉलिटिक्स पर असर डाला। दोस्तों, मेरे नाना जी, श्री बोधराज सराफ, एक दार्शनिक संत थे। मेरे दादा जी जस्टिस मेहर चंद महाजन थे, जो महाराजा हरि सिंह के भारत सरकार के साथ विलय के बाद जम्मू-कश्मीर के पहले अंतरिम प्रधान मंत्री बने। मैं ऐसे ही शानदार लोगों के परिवार में पैदा हुई। कम संसाधनों के बावजूद कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। जो कुछ भी पुश्तैनी था, वह मीरपुर में ही छूट गया। मेरे पिता कांग्रेस समर्थक थे। उन्होंने लाखों विस्थापित लोगों के पुनर्वास में मदद की और अपनी हिम्मत, संघर्ष और कड़ी मेहनत से दो सफल पीढ़ियाँ तैयार कीं। मेरा परिवार भी जजों, नौकरशाहों, वकीलों, सॉलिसिटरों और शिक्षाविदों का परिवार रहा है। मैं 20 साल की उम्र में दिल्ली यूनिवर्सिटी में सबसे कम उम्र की लेक्चरर बनी। कभी-कभी खामोशी भी बहुत कुछ कह जाती है। लेकिन जब भौंकने वाले कुत्ते खामोशी को बुज़दिली समझने लगते हैं, तो उन्हें उनकी अपनी ज़हरीली बातों से ही चुप कराना ज़रूरी हो जाता है। इंसान को आवाज़ उठानी पड़ती है और सच बोलना ही चाहिए। असल में, मैं पिछले पैंतीस सालों से एक जुनूनी पत्रकार रही हूँ। मैंने हाई स्कूल बोर्ड परीक्षा में पूरे भारत में टॉप किया था। मैं सेंट स्टीफंस कॉलेज में दाखिला लेने वाली चुनिंदा युवा महिलाओं में से एक थी। मैं मास्टर्स में एक बेहतरीन छात्रा, (M.Phil.) एम.फिल. रिसर्चर, लेखिका, ब्रॉडकास्टर और दूरदर्शन न्यूज़ डिवीज़न टेलीकास्टर रही हूँ। मेरा सपना महिलाओं को सशक्त बनाना था। मैं उन शुरुआती महिलाओं में से हूँ जिन्होंने अपना नाम बनाने के लिए अपने सुरक्षित घरों की सीमाओं को छोड़ा। इसका श्रेय मेरे प्यारे पिता और मेरी बहुत प्यारी माँ को जाता है। वह जेंडर बायस (लिंग-भेद) का दौर था, जब लड़कियों की शादी अक्सर हाई स्कूल या ग्रेजुएशन के तुरंत बाद कर दी जाती थी। मैंने अपने माता-पिता से कहा कि मैं अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती हूँ और शादी मेरी प्राथमिकता नहीं है। भारत के बड़े-बड़े उद्योगपति और बिज़नेस टाइकून मुझसे शादी करना चाहते थे। मैंने न तो ‘हाँ’ कहा और न ही ‘ना’, क्योंकि वे मेरे दोस्त थे और मुझे पढ़ाई और अपना करियर बनाने के अलावा किसी और चीज़ में दिलचस्पी नहीं थी। मैंने दिल्ली यूनिवर्सिटी में 12 साल तक पढ़ाया। मैं अपनी रिसर्च करती रही, पेपर पब्लिश करती रही और आर्टिकल लिखती रही। स्टूडेंट्स और साथियों के बीच मेरी बहुत अच्छी फैन फॉलोइंग थी। मैंने इन्फॉर्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग मिनिस्ट्री में शामिल होने के लिए UPSC परीक्षा पास की और पुणे के फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया में ट्रेनिंग ली। इसके बाद मैं सीनियर पॉलिटिकल कॉरेस्पोंडेंट के तौर पर दूरदर्शन से जुड़ी। ज़ाहिर है, मैंने मीडिया और जर्नलिज़्म में करियर आज़माने के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी से ‘लीयन’ (lien) लिया था। दूरदर्शन ही एकमात्र ऐसा ब्रॉडकास्टर था जिसे सभी पॉलिटिकल लीडर, ब्यूरोक्रेट्स, बिज़नेसमैन वगैरह बहुत पसंद करते थे। मैंने पूरे जोश के साथ काम किया और मेरा नाम ‘दूरदर्शन’ का पर्याावाची बन गया। कड़ाके की ठंड में गणतंत्र दिवस के प्रोग्राम का सीधा प्रसारण (लाइव टेलीकास्ट) मेरे मुस्कुराते हुए चेहरे और देश को अभिवादन करने के साथ शुरू होता था, जिसमें मेरे पुरुष साथी भी साथ होते थे! मुझे कभी पता नहीं चला कि एक बड़ा वर्ग मेरी कामयाबियों से जलता था और मेरे प्रति ज़हर और नफ़रत से भरा हुआ था। मेरा कम्युनिकेशन एकतरफ़ा था, मैं कभी बहुत ज़्यादा मिलनसार इंसान नहीं रही। मैंने अपने लिए एक सिद्धांत बनाया था, ‘खुद के लिए कुछ न चाहना, बल्कि जो कुछ भी मैंने सीखा है उसे दूसरों को देना’, जैसे पेड़ कभी अपने फल खुद नहीं खाता, नदी कभी अपना पानी खुद नहीं पीती। अगर मैं अपने ज्ञान को बाँटती नहीं और अपने स्टूडेंट्स को नहीं देती, तो मेरे ज्ञान का कोई फ़ायदा नहीं था। 16 वर्ष की आयु में, ऐक्टर प्रोड्यूसर देव आनंद ने मुझे हरे रामा हरे कृष्णा के लिए सिलेक्ट कर लिया था। मैं देव आनंद, द्वारा बुक किए होटल सुन एंड सेंड में रह रही थी। देव साहब ने मुझे बहुत समय दिया। मैं ‘ओरिजिनल हरे रामा हरे क्रिश्ण गर्ल रही। परंतु मेरी माता जी, इस निर्णय से प्रभावित नहीं थी। देव साहब ने, मुझे वापिस दिल्ली भिजवा दिया। ज़ीनत अमन या टीना मुनीम नहीं, नीलम ही उस रोल के लिए बनीं थीं।
(जारी रहेगा)

नीलम महाजन सिंह (सीनियर जर्नलिस्ट, लेखिका, दूरदर्शन न्यूज़ पर्सनैलिटी व सॉलिसिटर)