टैरिफ का नया तूफान: भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों की अग्निपरीक्षा

A New Tariff Storm: A Trial by Fire for India-US Trade Relations

डॉ. मोनिका राज

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट 2026 पर हस्ताक्षर करके वैश्विक व्यापार जगत में एक नई हलचल पैदा कर दी है। यह कानून तीस दिनों के भीतर प्रभावी होने जा रहा है और इसकी सबसे बड़ी मार भारत जैसे देशों पर पड़ने वाली है, जो रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदते रहे हैं। इस नए कानून के तहत अमेरिका को यह अधिकार मिल गया है कि वह रूसी तेल और गैस के पांच शीर्ष खरीदार देशों पर सौ प्रतिशत तक शुल्क लगा सके, जिनमें भारत के अलावा चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान भी शामिल हैं। भारत के लिए यह खबर ऐसे समय आई है जब वह पहले से ही अमेरिका के साथ एक संतुलित और न्यायसंगत व्यापार समझौते की तलाश में जूझ रहा था। बीते कुछ महीनों से चल रही बातचीत में दोनों पक्षों के बीच कई बार उतार-चढ़ाव देखने को मिले हैं, मगर इस नए कानूनी हथियार ने पूरी स्थिति को फिर से उलझा दिया है। भारत सरकार ने अमेरिकी प्रतिनिधियों को यह स्पष्ट रूप से बता दिया है कि इस कानून का द्विपक्षीय व्यापार संबंधों पर क्या असर पड़ सकता है, और साथ ही यह भी दोहराया है कि ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए वह अपने व्यापारिक और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाएगा।

भारत के लिए यह कोई नई परेशानी नहीं है, बल्कि एक लंबे सिलसिले की अगली कड़ी भर है। पिछले अगस्त में ही भारत को पच्चीस प्रतिशत के अतिरिक्त शुल्क का सामना करना पड़ा था, जो पहले से लागू पच्चीस प्रतिशत के पारस्परिक टैरिफ के ऊपर थोपा गया था। भारत ने हमेशा यह तर्क दिया है कि किसी भी देश से ऊर्जा खरीदना उसका संप्रभु अधिकार है, फिर भी दबाव के आगे झुकते हुए उसने रूस से आयात में कटौती करना शुरू कर दिया। इसी वर्ष फरवरी में रूस से आने वाली ताजा तेल खेप दो मिलियन बैरल प्रतिदिन से घटकर लगभग सवा एक मिलियन बैरल तक सिमट गई थी। इस समायोजन के बदले में एक अंतरिम समझौते की रूपरेखा भी बनी, जिसके तहत भारत पर लगने वाला शुल्क पचास प्रतिशत से घटाकर अठारह प्रतिशत करने की बात हुई थी। लेकिन यह व्यवस्था अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से रद्द हो गई। इसके बाद ट्रम्प प्रशासन ने एक सौ पचास दिनों के लिए दस प्रतिशत का एकसमान शुल्क लागू किया, जो चौबीस जुलाई को समाप्त हो गया। इतना ही नहीं, अपनी सौदेबाजी की ताकत बनाए रखने के लिए अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय ने ट्रेड एक्ट 1974 की धारा 301 के तहत जांच शुरू की और यह आरोप लगाते हुए दस प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगा दिया कि भारतीय निर्यात में बलात श्रम से जुड़े उत्पाद शामिल हैं।

कानून और कार्यकारी आदेश का अंतर

इस नए घटनाक्रम को समझने के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि यह पिछले सभी दंडात्मक शुल्कों से कहीं अधिक गंभीर और स्थायी क्यों है। बीते वर्ष जो पचास प्रतिशत का पारस्परिक शुल्क रूसी तेल आयात पर लगाया गया था, वह एक कार्यकारी आदेश के जरिए लागू हुआ था, और उसी तरह के आदेश से उसे वापस भी लिया जा सकता था। यानी वह व्यवस्था राष्ट्रपति की इच्छा पर टिकी हुई थी और किसी भी क्षण बदली जा सकती थी। मगर अब जो कानून पारित हुआ है, वह अमेरिकी कांग्रेस से गुजरा है, इसलिए इसकी कानूनी स्थिरता और अधिकार कहीं अधिक मजबूत हो गए हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि अब राष्ट्रपति ट्रम्प को यदि किसी देश को इस शुल्क से छूट देनी है, तो उन्हें कांग्रेस को लिखित रूप में इसका औचित्य समझाना होगा। यह प्रावधान अमेरिकी राष्ट्रपति की मनमानी शक्ति पर एक प्रकार का अंकुश तो लगाता है, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करता है कि यह शुल्क व्यवस्था अस्थायी सनक न होकर एक दीर्घकालिक नीति बन जाए। इसी वजह से विशेषज्ञ इसे अब तक के सबसे गंभीर व्यापारिक टकराव के रूप में देख रहे हैं, जिसका असर आने वाले वर्षों तक महसूस किया जा सकता है।

निर्यातकों और लघु उद्योगों पर संकट

पिछले पचास प्रतिशत शुल्क ने भी भारतीय निर्यातकों की कमर तोड़ दी थी, हालांकि उस समय कुछ राहत इस बात से मिली कि निर्यातकों ने अपने अमेरिकी ग्राहकों के साथ मिलकर इस बोझ को साझा करने का प्रयास किया। लेकिन यह रणनीति भी बहुत महंगी साबित हुई और वित्तीय रूप से टिकाऊ नहीं रही, क्योंकि इससे निर्यातकों के मुनाफे में भारी कमी आई। अब अगर सौ प्रतिशत तक का शुल्क वास्तव में लागू हो जाता है, तो इसे साझा करना भारत के लघु, सूक्ष्म और मध्यम उद्यमों के लिए लगभग असंभव हो जाएगा। यह भी ध्यान रखने योग्य बात है कि यह प्रस्तावित शुल्क पहले से लागू दस प्रतिशत के बलात श्रम शुल्क और इस्पात-एल्युमिनियम पर धारा 232 के तहत लगे पचास प्रतिशत शुल्क के ऊपर होगा, यानी कुल मिलाकर बोझ कई गुना बढ़ जाएगा। ऐसी स्थिति में भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में पूरी तरह अप्रतिस्पर्धी हो जाएंगे। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है और भारत के कुल वस्तु निर्यात का लगभग बीस प्रतिशत हिस्सा वहीं जाता है, इसलिए यह संकट केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि लाखों रोजगारों और छोटे कारोबारों के अस्तित्व से जुड़ा गंभीर मसला बन जाता है।

भारत के सामने तीन कठिन विकल्प

इस स्थिति में भारत के सामने मूलतः तीन रास्ते खुले हैं, और तीनों में अपनी-अपनी चुनौतियां छिपी हुई हैं। पहला विकल्प यह है कि भारत रूसी तेल का आयात पूरी तरह से घटा दे या बंद कर दे, जिससे अमेरिकी नाराजगी शांत हो सके, लेकिन इससे ऊर्जा की लागत बढ़ेगी और वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता बढ़ जाएगी। दूसरा विकल्प यह है कि भारत रूस से आयात जारी रखे और इस भारी शुल्क का बोझ सहन कर ले, जिसका सीधा असर निर्यात क्षेत्र और लघु उद्योगों पर पड़ेगा। तीसरा और सबसे व्यावहारिक विकल्प यह है कि भारत अमेरिका को इस बात के लिए राजी करे कि वह कानून में दी गई “सौ प्रतिशत तक” की लचीली भाषा का उपयोग करते हुए वास्तव में एक कम शुल्क लागू करे। ऐतिहासिक रूप से देखा जाए तो भारत ने आमतौर पर अमेरिकी दबाव के आगे झुकते हुए विशेष देशों से तेल आयात घटाया है, भले ही सार्वजनिक रूप से रणनीतिक स्वायत्तता की दुहाई दी जाती रही हो। ऐसे में तीसरा विकल्प ही सबसे संभावित रास्ता प्रतीत होता है, बशर्ते भारतीय कूटनीति अपनी सौदेबाजी क्षमता को प्रभावी ढंग से इस्तेमाल कर सके।

रूसी तेल पर बढ़ती निर्भरता की सच्चाई

जुलाई 2026 तक के आंकड़े बताते हैं कि रूस भारत के कुल तेल आयात का इक्यावन प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा पूरा कर रहा था, जो इस बात का प्रमाण है कि सस्ते रूसी क्रूड ने भारतीय ऊर्जा अर्थव्यवस्था में कितनी गहरी जड़ें जमा ली हैं। यह निर्भरता युद्ध के बाद के वर्षों में इसलिए बढ़ी क्योंकि पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के चलते रूस को भारी छूट पर तेल बेचना पड़ा, और भारत ने इस अवसर का पूरा लाभ उठाया। लेकिन अब स्थिति बदल रही है। मॉस्को की ऊर्जा अवसंरचना पर यूक्रेन युद्ध के दौरान लगातार हमले हो रहे हैं, जिससे आपूर्ति में बाधाएं पैदा हो रही हैं और छूट का दायरा भी सिकुड़ रहा है। एस एंड पी ग्लोबल के अनुसार आठ सितंबर से भारत को मिलने वाला यूराल्स क्रूड प्रीमियम पर बिकना शुरू हो गया है, जो इस बात का संकेत है कि सस्ते रूसी तेल का दौर धीरे-धीरे समाप्त हो सकता है। ऐसे में भारत के पास सस्ती ऊर्जा और अमेरिकी नाराजगी के बीच संतुलन बनाना कठिन होता जा रहा है, क्योंकि दोनों ही विकल्पों की अपनी आर्थिक और रणनीतिक कीमत है।

वैकल्पिक तेल स्रोतों की तलाश की चुनौती

रूसी तेल का विकल्प खोजना भारत के लिए आसान काम नहीं है, क्योंकि वैश्विक तेल बाजार खुद कई तरह के दबावों से गुजर रहा है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों को पहले से ही सीमित कर दिया है, और इसके साथ ही तेल की कीमतें भी ऊंची बनी हुई हैं। इस महीने ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत लगभग एक सौ नौ दशमलव आठ डॉलर प्रति बैरल के आसपास रही है, जो साफ बताती है कि नए आपूर्तिकर्ताओं के साथ अनुकूल सौदे तलाशना दिनोंदिन मुश्किल होता जा रहा है। इसके अतिरिक्त, होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाली आपूर्ति भी बाधित रहती है, जिससे खाड़ी देशों से आयात बढ़ाने की गुंजाइश सीमित हो जाती है। ऐसी परिस्थिति में भारत को ओमान जैसे देशों को प्रेरित करना होगा कि वे अपने वैकल्पिक बंदरगाहों के विस्तार में तेजी लाएं, ताकि आपूर्ति शृंखला में विविधता आ सके। कुल मिलाकर यह स्पष्ट है कि रूसी तेल पर निर्भरता जारी रखना जितना जोखिम भरा है, उतना ही चुनौतीपूर्ण उससे पूरी तरह मुक्त होना भी है, और भारत को इन दोनों छोरों के बीच एक व्यावहारिक मध्यम मार्ग निकालना होगा।

डी-रिस्किंग बनाम डी-कपलिंग की रणनीति

इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए अमेरिका-चीन संबंधों का उदाहरण बेहद उपयोगी है। 2017 में जब ट्रम्प पहली बार सत्ता में आए थे, तब उन्होंने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को चीन से पूरी तरह अलग करने यानी डी-कपलिंग की बात कही थी। लेकिन समय के साथ वाशिंगटन के नीति निर्माताओं को यह एहसास हुआ कि पूर्ण पृथक्करण एक अव्यावहारिक कल्पना मात्र है, क्योंकि इससे दोनों अर्थव्यवस्थाओं को भारी नुकसान होगा। इसी सोच के चलते अमेरिका ने धीरे-धीरे “डी-रिस्किंग” यानी जोखिम कम करने की रणनीति अपनाई, जिसका अर्थ है महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निर्भरता घटाना, न कि संबंध पूरी तरह समाप्त करना। भारत भी बीते वर्षों में ठीक यही रणनीति अपना रहा है। वह रक्षा, ऊर्जा, व्यापार और जनशक्ति जैसे क्षेत्रों में अमेरिका पर से निर्भरता कम करने का प्रयास कर रहा है, और साथ ही चीन से भी सतर्कता बरत रहा है। भारत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि उसकी नीति विविधीकरण की है, पूर्ण पृथक्करण की नहीं। यही संतुलित दृष्टिकोण भारत को दोनों महाशक्तियों के साथ व्यावहारिक संबंध बनाए रखने में सहायक सिद्ध हो सकता है, खासकर तब जब एक शक्ति उभर रही हो और दूसरी अपेक्षाकृत कमजोर पड़ रही हो।

वैसे अमेरिका इन प्रस्तावित शुल्कों को लागू करने से पहले अभी तीस दिनों का समय शेष है और इस अवधि में सघन कूटनीतिक प्रयासों की गुंजाइश बनी हुई है। इसी महीने के अंत में जी-ट्वेंटी व्यापार मंत्रिस्तरीय बैठक के लिए वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की अमेरिका यात्रा प्रस्तावित है, जो इस दिशा में एक महत्वपूर्ण अवसर साबित हो सकती है। साथ ही, ट्रम्प प्रशासन की अतिरिक्त क्षमता से जुड़ी एक और जांच पहले से ही चल रही है, जो व्यापार समझौते की तस्वीर को और उलझा देती है। व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रस्तावित तेल शुल्क वास्तव में एक सौदेबाजी का हथियार भर है, जिसका मकसद भारत को रूसी तेल खरीद घटाने और एक असमान व्यापार समझौते को स्वीकार करने के लिए विवश करना है। ऐसे में भारत के हित इसी में हैं कि वह जल्दबाजी में कोई समझौता न करे, क्योंकि इन शुल्कों का भविष्य काफी हद तक अमेरिका के मध्यावधि चुनावों के नतीजों पर भी निर्भर करेगा। भारत-अमेरिका मैत्री की असली परीक्षा अब इसी बात में होगी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रम्प के व्यक्तिगत संबंध इस आर्थिक तूफान में भारत के लिए कितनी राहत ला पाते हैं।