अजय कुमार बियानी
डिजिटल इंडिया ने देश की जनता को मोबाइल से भुगतान करना सिखाया है, लेकिन लगता है कि राजनीति के कुछ पुराने खिलाड़ियों को इसी सुविधा ने गहरी चिंता में डाल दिया है। कभी जेब में नोटों की गड्डियाँ देखकर चुनावी आत्मविश्वास उफान मारता था, अब मोबाइल की स्क्रीन पर भुगतान की पुष्टि का इंतजार करना पड़ता है। पहले बटुआ भारी हो तो रुतबा बढ़ता था, अब संकेत-संख्या याद न हो तो रुतबा भी अटक जाता है!
इसी बदले दौर में राजघाट का एक काल्पनिक दृश्य देखिए। कुछ दिग्गज नेता गंभीर चेहरे और चिंतित मुद्रा में बैठे हैं। आसपास रणनीतिकारों की बैठक है, कार्यकर्ताओं के हाथ में झंडे हैं और सबकी नजरें महात्मा गांधी की समाधि पर टिकी हैं। लगता है, देश की सबसे बड़ी समस्या का समाधान अब यहीं से निकलेगा। बस फर्क इतना है कि इस बार सत्याग्रह किसी कानून के खिलाफ नहीं, बल्कि नकदी के घटते प्रभाव के खिलाफ दिखाई दे रहा है!
कल्पना कीजिए, बापू चश्मा ठीक करते हुए पूछते हैं, “भाइयो, मेरी तस्वीर वाले नोटों से तुम्हें इतना लगाव था। अब मेरी तस्वीर मोबाइल की स्क्रीन पर भी मौजूद है। फिर यह उदासी कैसी? तस्वीर वही है, भुगतान का तरीका बदला है!”
नेताओं के पास जवाब कम और चिंता ज्यादा है। पुराने दौर में चुनावी चर्चाओं में नकदी, बंद कमरों और सूटकेसों के किस्से खूब सुनाई देते थे। अब डिजिटल भुगतान ने हिसाब-किताब की नई दुनिया खड़ी कर दी है। भुगतान हुआ तो सूचना आई, राशि दर्ज हुई और लेन-देन का रिकॉर्ड बन गया। यानी पहले जहाँ बात को याद रखने की जिम्मेदारी थी, अब हिसाब भी याद रखता है!
राजनीति के कुछ पुराने खिलाड़ी शायद इसी बदलाव से परेशान हों। आखिर जहाँ हिसाब दर्ज होने लगे, वहाँ हिसाब माँगने वालों के सवाल भी बढ़ जाते हैं। और राजनीति में सवालों से बड़ी असुविधा क्या हो सकती है—विशेषकर तब, जब जवाब देने की आदत से अधिक वादा करने की आदत विकसित हो चुकी हो!
एक रणनीतिकार माथा पकड़कर कहता है, “साहब, भाषण तैयार है, नारे तैयार हैं, झंडे भी तैयार हैं। लेकिन खर्च का हिसाब कैसे समझाएँ?” दूसरा सलाह देता है, “खर्च का हिसाब साफ रखिए।” तीसरा धीरे से पूछता है, “और यदि जनता हिसाब के साथ वादों का भी लेखा माँगने लगी तो?”
बस, इसी प्रश्न पर बैठक में सन्नाटा छा जाता है। लगता है, असली संकट मोबाइल के भुगतान में नहीं, जवाबदेही के भुगतान में है!
बापू शायद मुस्कराकर कहते, “मेरे नाम का सहारा लेने से पहले मेरे विचारों को भी पढ़ लिया करो। सत्य और ईमानदारी केवल भाषणों के सजावटी शब्द नहीं हैं।” यह सुनकर कुछ चेहरे गंभीर हो जाते हैं। आखिर गांधीजी का नाम लेना आसान है, लेकिन उनके सिद्धांतों के सामने अपना आचरण रखकर देखना उतना आसान नहीं।
आज तकनीक ने छोटे दुकानदार से लेकर बड़े व्यापारी तक भुगतान के तरीके बदल दिए हैं। आम आदमी चाय पीकर मोबाइल से भुगतान कर सकता है। सब्जी खरीदकर भी हिसाब चुका सकता है। उसे हर बार बटुए में छुट्टे पैसे तलाशने की जरूरत नहीं। लेकिन राजनीति के लिए असली परीक्षा केवल भुगतान की सुविधा नहीं, धन के स्रोत और चुनावी खर्च की पारदर्शिता है।
यह भी सच है कि डिजिटल भुगतान अपने आप ईमानदारी का प्रमाणपत्र नहीं है। गलत मंशा रखने वाला व्यक्ति तकनीक का दुरुपयोग भी कर सकता है। इसलिए न नकदी अपने आप बेईमानी है, न मोबाइल अपने आप ईमानदारी। फर्क व्यवस्था, निगरानी और जवाबदेही से पड़ता है। तकनीक हिसाब दर्ज कर सकती है, लेकिन नीयत का हिसाब समाज और कानून को ही लेना होगा।
व्यंग्य की विडंबना यही है कि गांधीजी की तस्वीर कभी नोट पर थी, अब मोबाइल की स्क्रीन पर भी है; लेकिन उनके विचारों को अपनाने का मामला आज भी लंबित है। तस्वीर हर जगह पहुँच गई, सत्य और अहिंसा का संदेश भी खूब प्रचारित हुआ, मगर जब ईमानदारी को अपने व्यवहार में उतारने की बारी आती है, तो अनेक लोग रास्ता बदल लेते हैं।
कल्पना कीजिए, राजघाट पर बैठे नेता अंततः एक संकल्प-पत्र तैयार करते हैं—चुनावी खर्च का हिसाब पारदर्शी रखेंगे, धन के स्रोत स्पष्ट करेंगे और जनता से किए वादों का लेखा भी देंगे। कार्यकर्ता उत्साह से तालियाँ बजाते हैं। तभी एक बुजुर्ग पूछ बैठता है, “साहब, इस संकल्प पर अमल कब से होगा?” सभा में फिर सन्नाटा छा जाता है। शायद संकल्प की तारीख तय करने के लिए एक और बैठक आवश्यक है!
आखिर गांधीजी की तस्वीर नोट पर हो या मोबाइल की स्क्रीन पर, राजनीति की साख किसी भुगतान पद्धति से नहीं, नीयत और आचरण से बनती है। डिजिटल बटुआ पुराने तौर-तरीकों को चुनौती दे सकता है, लेकिन असली बदलाव तब आएगा, जब नेताओं को जनता के सामने केवल धन का नहीं, अपने वादों और कर्मों का हिसाब भी देना पड़ेगा।




