विनोद कुमार विक्की
कभी मनुष्य को “सामाजिक प्राणी” कहा जाता था। आज भी कहा जाता है, किंतु इस सामाजिकता का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। विडंबना यह है कि दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले देशों में शामिल होने के बावजूद हम पहले से अधिक अकेले होते जा रहे हैं। शहरों की भीड़ बढ़ी है, मोबाइल के संपर्क बढ़े हैं, सोशल मीडिया पर मित्रों और अनुयायियों की संख्या बढ़ी है, लेकिन आत्मीय संवाद लगातार घट रहा है। तकनीक ने हमारी दूरियाँ मिटाईं अवश्य, पर मन की दूरियाँ भी उतनी ही तेजी से बढ़ा दीं।
तकनीक आधुनिक जीवन की अनिवार्यता है। इंटरनेट, स्मार्टफोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सोशल मीडिया ने शिक्षा, चिकित्सा, बैंकिंग, संचार और व्यापार को अभूतपूर्व गति प्रदान की है। आज घर बैठे विश्व के किसी भी कोने से बात करना, ज्ञान प्राप्त करना या आर्थिक लेन-देन करना कुछ ही क्षणों का कार्य रह गया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि तकनीक ने जीवन को सरल, तेज और सुविधाजनक बनाया है। समस्या तकनीक नहीं है, बल्कि उसके अनियंत्रित और असंतुलित उपयोग की है, जिसने धीरे-धीरे मानवीय संवेदनाओं को पीछे धकेलना शुरू कर दिया है।
आज का बचपन भी डिजिटल हो चुका है। पहले बच्चे मैदानों में खेलते थे, पड़ोस के मित्रों के साथ हँसते-भागते थे और छोटी-छोटी बातों में खुशियाँ खोज लेते थे। अब उनका अधिकांश समय मोबाइल, टैबलेट और वीडियो गेम की स्क्रीन पर बीतता है। माता-पिता भी व्यस्तता के कारण बच्चों को समय देने के बजाय मोबाइल थमा देना अधिक सुविधाजनक समझने लगे हैं। परिणामस्वरूप बचपन तकनीक के निकट और संवेदनाओं से दूर होता जा रहा है।
विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों पर अधिक अंक लाने का दबाव है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं पर रोजगार की चिंता हावी है। नौकरीपेशा लोग समय-सीमा और लक्ष्य पूरे करने की दौड़ में लगे हैं। व्यवसायी प्रतिस्पर्धा में व्यस्त हैं। ऐसे में परिवार के साथ बैठकर दो पल हँसना, किसी मित्र की परेशानी सुनना या पड़ोसी का हाल पूछना धीरे-धीरे हमारी प्राथमिकताओं से बाहर होता जा रहा है। हम सब एक-दूसरे के संपर्क में तो हैं, लेकिन एक-दूसरे के साथ नहीं हैं।
आज का सबसे सामान्य दृश्य यह है कि एक ही कमरे में बैठे परिवार के चार सदस्य चार अलग-अलग स्क्रीन में खोए रहते हैं। भोजन की मेज पर भी बातचीत कम और मोबाइल अधिक दिखाई देता है। घरों में संवाद की जगह नोटिफिकेशन की आवाज़ों ने ले ली है। माता-पिता बच्चों से, बच्चे दादा-दादी से और पति-पत्नी एक-दूसरे से कम बात करते हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर घंटों सक्रिय रहते हैं। धीरे-धीरे परिवार एक छत के नीचे रहने वाले व्यक्तियों का समूह बनता जा रहा है, जहाँ साथ रहने की व्यवस्था तो है, पर साथ जीने की संस्कृति कमजोर पड़ रही है।
तकनीक ने भावनाओं की अभिव्यक्ति को भी औपचारिक बना दिया है। जन्मदिन की शुभकामनाएँ अब हाथ से लिखे पत्रों या आत्मीय मुलाकातों के बजाय तैयार संदेशों और इमोजी के माध्यम से भेजी जाती हैं। किसी के बीमार होने पर उसके घर जाकर हालचाल पूछने के स्थान पर ‘गेट वेल सून’ लिख देना पर्याप्त समझ लिया जाता है। किसी की मृत्यु पर शोकसभा में उपस्थित होने के बजाय सोशल मीडिया पर ‘भावभीनी श्रद्धांजलि’ लिखकर लोग अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं। संवेदना अब शब्दों से अधिक स्टेटस और पोस्ट में दिखाई देने लगी है।
सोशल मीडिया ने तुलना की एक नई संस्कृति भी विकसित की है। लोग अपने जीवन के सुखद क्षणों का प्रदर्शन करते हैं, जबकि दूसरे उन्हें देखकर स्वयं को कमतर समझने लगते हैं। लाइक, कमेंट और फॉलोअर्स की संख्या आत्मविश्वास का पैमाना बनती जा रही है। वास्तविक संबंधों की अपेक्षा आभासी लोकप्रियता अधिक महत्वपूर्ण प्रतीत होने लगी है। इससे मानसिक तनाव, अकेलापन और अवसाद जैसी समस्याएँ भी बढ़ रही हैं।
मोबाइल और इंटरनेट के व्यापक प्रसार से पहले लोग बिना कहे ही एक-दूसरे की मनःस्थिति समझ लेते थे। चेहरे की उदासी, आवाज़ की थकान और आँखों की नमी बहुत कुछ कह देती थी। आज बातचीत इमोजी से होती है, इसलिए भावनाओं की गहराई भी सतही होती जा रही है। हँसते हुए चेहरे वाले इमोजी के पीछे छिपे आँसू और “मैं ठीक हूँ” लिखने वाले व्यक्ति की पीड़ा को पढ़ पाना कठिन होता जा रहा है।
विडंबना देखिए कि पहले हम अपने परिवार, मित्रों और पड़ोसियों को पढ़ते थे, आज तकनीकी कंपनियाँ हमें पढ़ रही हैं। हमारी पसंद, नापसंद, आदतें, खरीदारी, यात्रा, बातचीत और रुचियाँ डिजिटल आँकड़ों में बदल चुकी हैं। हम अपने प्रियजनों की भावनाएँ भले न समझ पाएँ, लेकिन एल्गोरिद्म हमारी पसंद का अगला वीडियो और अगला विज्ञापन पहले से जान लेते हैं। गूगल की सर्च हिस्ट्री और सोशल मीडिया का एल्गोरिद्म हमें शायद उतनी बारीकी से समझने लगा है, जितना हम स्वयं को भी नहीं समझते।
फिर भी समाधान तकनीक से दूरी बनाना नहीं है। तकनीक मानव जीवन की उपलब्धि है और उसका संतुलित उपयोग ही उचित मार्ग है। आवश्यकता इस बात की है कि हम स्क्रीन और संबंधों के बीच संतुलन स्थापित करें। परिवार के साथ प्रतिदिन कुछ समय बिना मोबाइल के बिताएँ, बच्चों से खुलकर बातचीत करें, बुज़ुर्गों के अनुभव सुनें, मित्रों से आमने-सामने मिलें और दुख-सुख में केवल संदेश भेजने के बजाय स्वयं उपस्थित हों। तकनीक सुविधा का माध्यम बने, संवेदना का विकल्प नहीं।
आखिरकार, मशीनें हमारी गति बढ़ा सकती हैं, पर हमारे आँसू नहीं पोंछ सकतीं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता अनेक प्रश्नों के उत्तर दे सकती है, लेकिन माँ के स्पर्श, मित्र के कंधे, शिक्षक के स्नेह और परिवार के आत्मीय साथ का स्थान कभी नहीं ले सकती। विज्ञान हमें अधिक सक्षम बना सकता है, पर अधिक मानवीय केवल हमारी संवेदनाएँ ही बना सकती हैं।
इसलिए समय की सबसे बड़ी आवश्यकता तकनीक का विरोध करना नहीं, बल्कि संवेदनाओं का पुनर्जागरण करना है। जिस दिन मोबाइल की स्क्रीन से अधिक महत्व हमारे सामने बैठे व्यक्ति के चेहरे को मिलने लगेगा, उसी दिन तकनीक सचमुच मानवता की सहायक बनेगी, उसकी प्रतिस्पर्धी नहीं।





