तमिलनाडु में धर्म-आधारित कल्याणकारी नीतियां: तुष्टिकरण की पराकाष्ठा

Religion-based welfare policies in Tamil Nadu: The height of appeasement

अशोक भाटिया

स्वतंत्र भारत के इतिहास में नीति-निर्माण का मूल सिद्धांत हमेशा से यह रहा है कि राज्य लोक कल्याणकारी योजनाएं बनाते समय किसी भी नागरिक के साथ उसके पंथ, जाति या लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में निहित ‘पंथनिरपेक्षता’ और अनुच्छेद १४ में समाहित ‘समानता का अधिकार’ इसी समतामूलक समाज की नींव रखते हैं। परंतु, हाल ही में तमिलनाडु सरकार द्वारा राज्य के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में स्नातक पाठ्यक्रमों में प्रवेश लेने वाली केवल मुस्लिम छात्राओं की पूरी ट्यूशन फीस सरकारी खजाने से माफ करने और वक्फ बोर्ड के माध्यम से छात्रवृत्तियों में एकतरफा वृद्धि करने की घोषणा ने इस संवैधानिक दर्शन को तार-तार कर दिया है। सामाजिक न्याय और अल्पसंख्यक कल्याण के लोकलुभावन मुखौटे के पीछे छिपी यह नीति वास्तव में विशुद्ध रूप से बहुसंख्यक विरोधी, विभाजनकारी और आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर तैयार की गई तुष्टिकरण की राजनीति का एक अत्यंत निकृष्ट उदाहरण है। शिक्षा जैसे पवित्र और बुनियादी क्षेत्र को जिस तरह से धार्मिक चश्मे से देखने का प्रयास किया गया है, उसने देश के जागरूक नागरिकों, विधि विशेषज्ञों और करदाताओं के भीतर एक गहरा आक्रोश और असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है।

इस नीति की सबसे बड़ी विडंबना और नैतिक विफलता इसकी बुनियादी सोच में ही निहित है, जो यह मानकर चलती है कि गरीबी, लाचारी, अशिक्षा और आर्थिक विपन्नता का कोई एक विशिष्ट धर्म होता है। वास्तविकता यह है कि तमिलनाडु के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लाखों हिंदू और ईसाई परिवार आज भी अत्यधिक तंगहाली और अभावों में जीवन बसर कर रहे हैं। एक गरीब हिंदू किसान, दिहाड़ी मजदूर, या बुनकर की बेटी भी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए उसी तरह संघर्ष करती है, उसी तरह फीस भरने के लिए अपनी मां के गहने गिरवी रखती है और उन्हीं कठिन परिस्थितियों का सामना करती है, जिन परिस्थितियों से समाज का कोई अन्य व्यक्ति गुजरता है। परंतु, सरकार की इस संकीर्ण और मजहबी नीति ने उस गरीब हिंदू और ईसाई बेटी को केवल इसलिए इस अधिकार से वंचित कर दिया क्योंकि उसने एक विशिष्ट मजहब में जन्म नहीं लिया। यह राज्य द्वारा प्रायोजित खुल्लम-खुल्ला और संस्थागत भेदभाव नहीं तो और क्या है? क्या एक बहुसंख्यक गरीब परिवार की बेटी की आंखों के सपनों और उसकी शिक्षा का मूल्य सरकार की नजरों में सिर्फ इसलिए शून्य है क्योंकि वह किसी राजनीतिक दल का ‘थोक वोट बैंक’ नहीं हैं?

संवैधानिक और कानूनी दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह निर्णय सीधे तौर पर भारत के संविधान के बुनियादी ढांचे को चुनौती देता है। संविधान का अनुच्छेद १५(१) स्पष्ट रूप से राज्य को आदेश देता है कि वह किसी भी नागरिक के खिलाफ केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा। हालांकि, अनुच्छेद १५(३) राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति देता है, लेकिन इस ‘सकारात्मक भेदभाव’ का उद्देश्य समाज के पिछड़े वर्गों का उत्थान करना है, न कि धर्म के आधार पर समाज को दो स्पष्ट धड़ों में बांट देना। जब राज्य केवल एक विशिष्ट धार्मिक समुदाय की युवतियों को पूरी तरह से मुफ्त शिक्षा का विशेषाधिकार देता है और दूसरे समुदाय की समान रूप से गरीब युवतियों को उनकी आर्थिक लाचारी के बावजूद उस लाभ से वंचित रखता है, तो यह कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत की सरेआम हत्या है। पूर्व में भी न्यायपालिका ने अपने विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि लोक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए और इसके लिए ‘विशुद्ध रूप से धार्मिक वर्गीकरण’ को असंवैधानिक माना गया है। मद्रास उच्च न्यायालय के हालिया कड़े रुख ने भी यह साफ किया था कि केवल धार्मिक पहचान या धर्म परिवर्तन को किसी विशेष दर्जे या लाभ का आधार नहीं बनाया जा सकता। इसके बावजूद ऐसी नीतियों को लागू करना न्यायपालिका की अवमानना और संविधान के साथ विश्वासघात है।

इस पूरे प्रकरण का आर्थिक और सामाजिक पक्ष भी उतना ही भयावह है। राज्य का खजाना किसी राजनीतिक दल की बपौती नहीं होता, बल्कि वह देश के करोड़ों ईमानदार करदाताओं के खून-पसीने की कमाई से भरता है। तमिलनाडु पहले से ही भारी कर्ज के बोझ तले दबा हुआ है, जहां राज्य पर वित्तीय प्रबंधन को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। ऐसी स्थिति में जनता के पैसे का उपयोग सर्वव्यापक और समावेशी विकास कार्यों, जैसे स्कूल-कॉलेजों की बुनियादी संरचना सुधारने, नए अस्पताल बनाने या सभी वर्गों के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने में होना चाहिए था। इसके विपरीत, सरकार अरबों रुपये का बजट केवल एक विशेष धार्मिक वर्ग को रिझाने और उनके एकतरफा तुष्टिकरण के लिए झोंक रही है। वक्फ और चर्च संपत्तियों के विकास के लिए करोड़ों रुपये का रिवॉल्विंग फंड जारी करना और केवल एक वर्ग की बेटियों की फीस माफ करना बहुसंख्यक समाज के करदाताओं के साथ एक बहुत बड़ा क्रूर मजाक है। यह नीति करदाताओं के भीतर इस भावना को सुदृढ़ करती है कि उनके द्वारा दिए गए टैक्स का इस्तेमाल उनके ही बच्चों के भविष्य को अंधकार में धकेलने और एक विशेष वर्ग को विशेषाधिकार संपन्न बनाने के लिए किया जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि द्रविड़ राजनीति के गढ़ रहे तमिलनाडु में सामाजिक न्याय का एक लंबा और गौरवशाली इतिहास रहा है। राज्य ने मध्याह्न भोजन (Mid-day Meal) जैसी ऐतिहासिक योजनाएं दीं, जिनकी सफलता का मुख्य कारण यह था कि वे सार्वभौमिक (Universal) थीं। उनमें किसी बच्चे की धार्मिक पहचान नहीं पूछी जाती थी। हाल ही की ‘पुधुमाई पेन योजना’ भी सफल रही क्योंकि उसका आधार सरकारी स्कूल की पृष्ठभूमि थी, न कि कोई मजहब। परंतु, वर्तमान शासन व्यवस्था ने तुष्टिकरण की इस नई नीति के जरिए उस गौरवशाली विरासत पर एक अमिट काला धब्बा लगा दिया है। यह सामाजिक न्याय का उत्थान नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय का निकृष्टतम रूप है। जब सरकारें अपनी राजनीतिक सत्ता को बचाए रखने के लिए समाज में ‘हम’ बनाम ‘वे’ की लकीर खींचने लगती हैं, तो वे अनजाने में एक ऐसे सामाजिक ज्वालामुखी को जन्म दे रही होती हैं जो अंततः पूरे समाज के ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर देता है। ऐसी नीतियां बहुसंख्यक समाज के भीतर एक गहरी निराशा, आक्रोश और अलगाव की भावना पैदा करती हैं, जो किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र और सामाजिक समरसता के लिए अत्यंत आत्मघाती है।

यदि सरकार की मंशा वास्तव में समाज के सबसे पिछड़े, शोषित और पीड़ित वर्ग का कल्याण करने की होती, तो इस वित्तीय सहायता या ट्यूशन फीस माफी का एकमात्र पैमाना ‘पारिवारिक आय’ या ‘आर्थिक स्थिति’ होना चाहिए था। यदि सरकार यह नियम बनाती कि राज्य के किसी भी धर्म, जाति या वर्ग के ऐसे परिवार जिनकी वार्षिक आय एक निश्चित सीमा से कम है, उनकी बेटियों की उच्च शिक्षा की पूरी फीस सरकार भरेगी, तो इस ऐतिहासिक कदम का स्वागत समाज के हर वर्ग द्वारा किया जाता। ऐसी स्थिति में मुस्लिम समाज की जरूरतमंद बेटियों को भी उनका हक सम्मानपूर्वक मिलता और हिंदू तथा ईसाई समाज की लाचार छात्राएं भी शिक्षा के अधिकार से वंचित न होतीं। आर्थिक आधार पर बनाई गई नीतियां समाज को जोड़ती हैं, उनमें पारदर्शिता होती है और वे सर्वस्वीकार्य होती हैं। परंतु, आर्थिक आधार को दरकिनार कर केवल धार्मिक पहचान को योग्यता का पैमाना बनाना यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि सरकार का उद्देश्य समाज का वास्तविक उत्थान करना नहीं, बल्कि आगामी चुनावों में अल्पसंख्यक मतों का एकतरफा ध्रुवीकरण अपने पक्ष में करना है।

यह सही है कि महिलाओं का सशक्तिकरण और लड़कियों को उच्च शिक्षा के अवसर प्रदान करना किसी भी प्रगतिशील राष्ट्र की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती कि अल्पसंख्यक समुदाय की बेटियों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। लेकिन इस पवित्र उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए अपनाया गया मार्ग भी उतना ही न्यायसंगत, पारदर्शी और धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए। धर्म के आधार पर मुफ्तखोरी और विशेषाधिकार बांटने की यह मूक और अदूरदर्शी जिद समाज को विनाश की ओर ले जाएगी। तमिलनाडु सरकार को इस आत्मघाती नीति के व्यापक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक दुष्प्रभावों पर तुरंत पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। नीति निर्माताओं को यह समझना होगा कि सामाजिक न्याय की भव्य इमारत किसी एक वर्ग को अनुचित लाभ देकर और बहुसंख्यक वर्ग को प्रताड़ित करके कभी नहीं बनाई जा सकती। समावेशी विकास का मार्ग धर्म के संकीर्ण गलियारों से नहीं, बल्कि आर्थिक न्याय, योग्यता और मानवीय गरिमा के सार्वभौमिक सिद्धांतों से होकर गुजरता है। समय आ गया है कि देश की अदालतें और प्रबुद्ध नागरिक इस तरह के धर्म-आधारित वर्गीकरण के खिलाफ मजबूती से खड़े हों, ताकि भारतीय संविधान की धर्मनिरपेक्ष आत्मा की रक्षा की जा सके और देश को तुष्टिकरण की इस गंभीर संक्रामक बीमारी से बचाया जा सके।