अशोक भाटिया
भारत में त्योहारों का आगमन अब आम इंसान के लिए उल्लास का संदेश कम, और मानसिक प्रताड़ना का सबब ज्यादा लेकर आता है। देश की बहुसंख्यक आबादी, जो हर सुबह अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए हाड़-तोड़ संघर्ष करती है, उसके लिए त्योहारी सीजन एक ऐसी आर्थिक भूलभुलैया बन गया है जहां से बिना कर्जदार बने निकलना नामुमकिन है। यह कैसी विडंबना है कि जैसे ही देश गणेशोत्सव, दुर्गा पूजा और दीपावली की तरफ बढ़ता है, वैसे ही जमाखोरों, बिचौलियों और बाजार के सटोरियों का सिंडिकेट सक्रिय हो जाता है। वे जनता की थाली को बंधक बना लेते हैं और देश का प्रशासनिक तंत्र गहरी, कुंभकर्णी नींद में सोया रहता है। जब आम आदमी की जेब पूरी तरह कट जाती है, तब जाकर सरकारी महकमों की कागजी फाइलें हिलती हैं। यह स्थिति केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के उस मूल चरित्र पर एक गहरा धब्बा है जो खुद को ‘लोककल्याणकारी’ कहने का दम भरती है।
आज देश में महंगाई के जो जमीनी हालात हैं, वे सरकारी बयानों और सांख्यिकी मंत्रालयों द्वारा जारी की जाने वाली रिपोर्टों को सरेआम खारिज करते हैं। सरकार की आर्थिक नीतियों की पोल खोलने के लिए देश की खुदरा महंगाई दर के हालिया आंकड़े ही काफी हैं। जुलाई 2026 में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 4.45 फीसदी के स्तर पर पहुंच गई, जबकि खाद्य महंगाई दर ने 5.52 फीसदी की डराने वाली छलांग लगाई है। यह सरकारी आंकड़ों का वो हिस्सा है जो एयर-कंडीशनर कमरों में बैठकर तैयार किया जाता है, लेकिन जब आप वास्तविक बाजार में कदम रखते हैं, तो यह महंगाई दर दोगुनी और तिगुनी महसूस होती है। सब्जियों के मोर्चे पर तो जैसे आग लगी हुई है। टमाटर जैसी बुनियादी सब्जी की कीमतें जहां 48 फीसदी से ज्यादा की दर से भाग रही हैं, वहीं बेमौसम बारिश और भीषण गर्मी के बहाने प्याज की खुदरा कीमतें 65 से 70 रुपये प्रति किलोग्राम को पार कर चुकी हैं। एक आम परिवार जो महीने की शुरुआत में राशन का बजट बनाता है, वह महीने के मध्य तक आते-आते अपनी ही रसोई में कटौती करने को मजबूर हो जाता है। यह कैसी तरक्की है जहां देश का नागरिक त्योहारों पर अपने बच्चों का मुंह मीठा कराने के लिए भी अपनी बुनियादी प्राथमिकताओं का गला घोंटने पर मजबूर है?
इस पूरे संकट में सरकार का जो रवैया रहा है, वह बेहद संवेदनहीन और निराशाजनक है। केंद्रीय मंत्रियों और प्रशासनिक सचिवों के बयान आते हैं कि “बाजार में वस्तुओं की कोई कमी नहीं है, पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है”। लेकिन जनता यह पूछने का हक रखती है कि यदि बफर स्टॉक मौजूद है, तो वह आम उपभोक्ता की पहुंच से दूर क्यों है? वह कौन सा अदृश्य हाथ है जो सरकारी गोदामों से राशन को गायब करके बिचौलियों की तिजोरियों में पहुंचा देता है? अभी हाल ही में सरकारी स्तर पर माना गया कि प्याज की कीमतों में यह बेतहाशा बढ़ोतरी कालाबाजारी, जमाखोरी और मुनाफाखोरी के कारण हो रही है। यह स्वीकारोक्ति अपने आप में एक बड़ा तमाचा है उस प्रशासनिक तंत्र पर, जिसके पास जमाखोरों को जेल की सलाखों के पीछे भेजने के लिए असीमित कानूनी अधिकार और पुलिस बल मौजूद हैं। जब सरकार खुद मान रही है कि बिचौलिए और मुनाफाखोर खुलेआम लूट मचा रहे हैं, तो फिर उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून या सख्त आपराधिक धाराओं के तहत कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्यों हर बार त्योहारों से ठीक पहले इन जमाखोरों को खुली छूट दे दी जाती है कि वे जनता की बेबसी का फायदा उठाकर अरबों रुपये का वारा-न्यारा कर लें?
बाजारवाद और कॉर्पोरेट परस्त नीतियों ने देश के पूरे आर्थिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है। आज का बाजार ‘फ्री मार्केट’ के नाम पर एक ऐसी अनियंत्रित लाठ बन चुका है, जिससे केवल गरीब और मध्यम वर्ग को हांका जा रहा है। त्योहारों के इस सीजन में बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल और ई-कॉमर्स वेबसाइट्स पर ‘महासेल’ और ‘त्योहारी छूट’ के लुभावने विज्ञापनों की बाढ़ आई हुई है। लेकिन यह चमक-दमक केवल एक छलावा है, जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बड़े व्यापारियों की जेबें भरने के लिए रची गई है। जमीनी हकीकत यह है कि वाणिज्यिक रसोई गैस के दाम आसमान छू रहे हैं, परिवहन और माल ढुलाई की लागतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इस महंगे परिवहन तंत्र का सीधा बोझ अंततः उस अंतिम उपभोक्ता पर पड़ता है, जिसकी क्रय शक्ति पहले से ही घटी हुई है। जब देश की एक बड़ी आबादी की वास्तविक मजदूरी में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हो रहा हो, और उसके विपरीत रोजमर्रा के खर्चों में 15 से 20 फीसदी की मासिक बढ़ोतरी हो रही हो, तो समाज में आर्थिक असंतोष का पनपना लाजिमी है।
इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना इसके दोहरे मापदंडों में छिपी है। भारत एक कृषि प्रधान देश होने का गौरव गान गाते नहीं थकता। हमारे नीति-निर्माता हर मंच से किसानों की आय दोगुनी करने और उपभोक्ताओं को सस्ती दरों पर भोजन उपलब्ध कराने के लंबे-चौड़े दावे करते हैं। लेकिन हकीकत में, इस देश का किसान और उपभोक्ता दोनों एक ही सिक्के के दो पीड़ित पहलू हैं। जब खेतों में प्याज या टमाटर की बंपर पैदावार होती है, तो बाजार के बड़े सटोरिये और आढ़ती कौड़ियों के दाम पर किसानों की फसल खरीद लेते हैं। उस समय किसान को अपनी लागत तक नहीं मिलती और वह अपनी उपज को सड़कों पर फेंकने या आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है। लेकिन जैसे ही वह फसल किसान के हाथों से निकलकर इन बड़े आढ़तियों के कोल्ड स्टोरेज और गोदामों में बंद हो जाती है, वैसे ही बाजार में ‘कृत्रिम किल्लत’ पैदा कर दी जाती है। कुछ ही हफ्तों के भीतर, वही प्याज जो किसान से 10 रुपये किलो खरीदा गया था, उपभोक्ता को 65 रुपये किलो बेचा जाने लगता है। बीच का यह 55 रुपये का मुनाफा न तो देश के सकल घरेलू उत्पाद में कोई सकारात्मक योगदान देता है और न ही किसान के घर में खुशहाली लाता है। यह पूरा पैसा उस सफेदपोश माफिया की जेब में जाता है जो राजनीतिक व्यवस्था को चंदे के दम पर नियंत्रित करता है।
यह सवाल भी बेहद मौजूं है कि आखिर देश का मध्यम वर्ग इस क्रूरता को कब तक खामोशी से सहता रहेगा? आज का मध्यम वर्ग टैक्स चुकाने के मामले में सबसे आगे खड़ा है। वह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष टैक्स के रूप में अपनी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा सरकार को सौंपता है, लेकिन जब उसे सुरक्षा, राहत या आर्थिक संरक्षण की जरूरत होती है, तो उसे पूरी तरह लावारिस छोड़ दिया जाता है। त्योहारों की खुशियों को संजोने के लिए आज का आम इंसान बैंकों से ‘पर्सनल लोन’ ले रहा है या अपनी क्रेडिट कार्ड की सीमाओं को लांघ रहा है। उपभोक्ता संस्कृति के इस दौर में कर्ज लेकर त्योहार मनाना एक मजबूरी बन गया है, जो आने वाले महीनों में उस परिवार को और गहरे आर्थिक गर्त में धकेल देता है। सरकारें हर साल बड़ी बेशर्मी से त्योहारों के बाद यह दावा पेश कर देती हैं कि इस बार रिकॉर्ड तोड़ व्यापार हुआ, जिससे देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है। लेकिन वे यह कभी नहीं बतातीं कि इस रिकॉर्ड तोड़ व्यापार के पीछे जनता का कितना खून-पसीना बहा है और कितना हिस्सा कर्ज की बुनियाद पर खड़ा था।
अब समय आ गया है कि जनता की इस लाचारी को केवल भाग्य का फेर मानकर छोड़ना बंद किया जाए। यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है, यह पूरी तरह से एक ‘मानव-निर्मित और नीति-जनित’ संकट है। यदि सरकार वाकई इस देश के नागरिकों के प्रति जवाबदेह है, तो उसे अपनी आर्थिक नीतियों की दिशा बदलनी होगी। केवल कागजी समीक्षा बैठकों और बफर स्टॉक जारी करने के बयानों से बाजार की आग नहीं बुझने वाली। जमाखोरी और सट्टेबाजी के खिलाफ राज्यों और केंद्र सरकार को मिलकर एक राष्ट्रव्यापी, कठोर अभियान चलाना होगा। आवश्यक वस्तु अधिनियम को और अधिक कड़ा बनाकर फास्ट-ट्रैक अदालतों के जरिए मुनाफाखोरों को त्वरित सजा देनी होगी। जब तक दो-चार बड़े मगरमच्छों पर कानून का शिकंजा नहीं कसेगा, तब तक बाजार के ये सटोरिये आम जनता की थाली से निवाला छीनते रहेंगे। त्योहारों का उल्लास किसी भी देश की सांस्कृतिक और सामाजिक जीवंतता का प्रतीक होता है। यदि इसे महंगाई के राक्षस की भेंट चढ़ने दिया गया, तो समाज के भीतर की खुशहाली और शांति पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। व्यवस्था को अब जागना ही होगा, क्योंकि लाचारी की भी एक सीमा होती है और जब वह सीमा टूटती है, तो जन-आक्रोश का जो सैलाब आता है, वह बड़ी से बड़ी सत्ताओं को तिनके की तरह बहा ले जाता है।





