हिमालय के बदलते खतरों के बीच सिर्फ अर्ली वार्निंग नहीं, निर्माण और विकास की पूरी नीति पर नए सिरे से सोचना होगा
राजेश जैन
नेपाल-चीन सीमा पर 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालय को लेकर हमारी सोच पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मृतकों की संख्या 900 के पार पहुंच चुकी है और 4200 से अधिक लोग अब भी लापता हैं। लेकिन यह त्रासदी केवल मौतों और तबाही का आंकड़ा नहीं है। इसका सबसे बड़ा संदेश यह है कि हिमालय में खतरे का स्वरूप बदल रहा है और हमारी तैयारी अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रही है। सवाल यह नहीं है कि अगली आपदा कब आएगी, सवाल यह है कि क्या हम अगली आपदा से पहले कुछ सीख पाएंगे?
बाढ़ का जन्म नदी में नहीं, पहाड़ में हुआ
हम आमतौर पर बाढ़ को भारी बारिश से जोड़कर देखते हैं। बारिश हुई, नदी का जलस्तर बढ़ा और बाढ़ आ गई। लेकिन इस बार कहानी कुछ अलग थी। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के प्रारम्भिक आकलन के अनुसार शुरुआत में ग्लेशियर का बर्फ और चट्टानों का मलबा तेज ढलान पर तेजी से नीचे आया और रास्ते में पानी तथा दूसरी सामग्री को अपने साथ मिलाता हुआ आगे बढ़ा। आईसीआईएमओडी ने भी ऊंचाई वाले क्षेत्र में संभावित आइस-रॉक एवलॉन्च को घटना का संदिग्ध ट्रिगर माना है। यानी बाढ़ का असली खतरा उस जगह पैदा हुआ, जहां नीचे नदी किनारे रहने वाले लोगों की नजर ही नहीं पहुंच सकती थी। यही हिमालयी आपदाओं की सबसे बड़ी चुनौती है। ऊंचाई पर ग्लेशियर या चट्टान टूटती है, नदी का रास्ता रुकता है, पानी जमा होता है और फिर प्राकृतिक अवरोध टूटने पर पानी, मिट्टी, पत्थर और पेड़ों का सैलाब नीचे की ओर दौड़ता है। एक घटना दूसरी घटना को जन्म देती है। इसे ‘कैस्केडिंग डिजास्टर’ कहा जाता है। नेपाल की इस त्रासदी ने दिखाया है कि कुछ ही समय में ऐसा खतरा कितनी बड़ी तबाही में बदल सकता है।
चेतावनी है, लेकिन क्या सही खतरे की?
नेपाल में बाढ़ और मौसम की निगरानी के लिए नदी जलस्तर केंद्र, स्वचालित मौसम स्टेशन, मौसम रडार, हिमपात निगरानी, हिमनद और हिमनद झीलों की निगरानी तथा सामुदायिक चेतावनी व्यवस्था मौजूद है। आईसीआईएमओडी की फ्लैश फ्लड प्रणाली भी हजारों नदी खंडों में संभावित खतरे का अनुमान लगाती है। फिर भी इस बार चेतावनी व्यवस्था की सीमा सामने आ गई। आईसीआईएमओडी के मुताबिक त्रिशूली नदी के एक हिस्से में जलस्तर करीब 30 मिनट में नौ मीटर तक बढ़ गया। कई निगरानी केंद्र भी क्षतिग्रस्त हो गए। इसलिए अब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि अर्ली वार्निंग सिस्टम है या नहीं। सवाल यह है कि क्या वह उस खतरे को पहचान सकता है, जो नदी में पानी बढ़ने से पहले पहाड़ के भीतर पैदा हो चुका है?
हमें नदी की निगरानी से आगे बढ़कर पूरे पर्वतीय तंत्र की निगरानी करनी होगी। कौन-सा ग्लेशियर बदल रहा है? कौन-सी हिमनद झील तेजी से बढ़ रही है? कहां ढलान अस्थिर है? कहां प्राकृतिक बांध बन रहा है? किन घाटियों में मलबे के साथ अचानक बाढ़ आने का खतरा है? इन सवालों के जवाब खोजने होंगे।
जरूरी है सही जगह निर्माण
लेकिन केवल तकनीक इस समस्या का समाधान नहीं है। चेतावनी मिल भी जाए तो सवाल रहेगा कि लोगों को ले जाएंगे कहां? किसी गांव के मोबाइल पर चेतावनी संदेश पहुंचना तभी उपयोगी है, जब वहां रहने वाले व्यक्ति को पहले से मालूम हो कि सुरक्षित स्थान कहां है, किस रास्ते से जाना है और कितनी देर में वहां पहुंचना है। हिमालय के पुराने समाजों ने अपने अनुभव से यह बात समझी थी। लोग अक्सर नदी के बिल्कुल किनारे नहीं, अपेक्षाकृत सुरक्षित और ऊंचे स्थानों पर घर बनाते थे। आधुनिक विकास के दौर में हमने इस स्थानीय समझ को काफी हद तक भुला दिया है। आज नदी किनारे होटल, मकान और होमस्टे बन रहे हैं। पहाड़ काटकर सड़कें बनाई जा रही हैं। सुरंगें खोदी जा रही हैं और जलविद्युत परियोजनाएं स्थापित हो रही हैं। विकास जरूरी है, लेकिन हर जगह निर्माण करना विकास नहीं हो सकता। हमें यह तय करना होगा कि कौन-सी जमीन रहने योग्य है और कौन-सी नहीं। नदी के डूब क्षेत्र से बाहर बस्तियां बसाना और जोखिम वाले इलाकों में निर्माण सीमित करना जरूरी है।
एक परियोजना नहीं, पूरे पहाड़ का हिसाब
हिमालय को टुकड़ों में देखने की हमारी आदत भी खतरे को बढ़ा रही है। एक सड़क को अलग परियोजना माना जाता है, एक बांध को अलग, एक होटल को अलग और एक सुरंग को अलग। लेकिन पहाड़ इन्हें अलग-अलग नहीं देखता। एक ही घाटी में सैकड़ों निर्माण हों तो उनका सामूहिक असर नदी के रास्ते, जल निकासी और ढलानों की स्थिरता पर पड़ सकता है। इसलिए अब हर बड़ी परियोजना के साथ उसके संचयी प्रभाव का आकलन जरूरी है। सवाल यह भी होना चाहिए कि यदि अत्यधिक बारिश हो, ग्लेशियर का बड़ा हिस्सा टूटे, भूस्खलन हो या मलबे का सैलाब आए तो पूरी घाटी पर क्या असर पड़ेगा?
सिर्फ पिछले 50 या 100 वर्षों के मौसम के आंकड़ों से भविष्य की सुरक्षा तय करना भी पर्याप्त नहीं है। हिमालय स्थिर भूगोल नहीं है। बदलते तापमान, ग्लेशियरों में परिवर्तन और मौसम की चरम घटनाओं के बीच पुराने आंकड़े भविष्य का पूरा जोखिम नहीं बता सकते।
सुरंग और बांध भी जोखिम से बाहर नहीं
नेपाल की घटना के बाद भारत में हिमालयी राज्यों की सुरंगों और जलविद्युत परियोजनाओं की सुरक्षा पर भी ध्यान बढ़ना स्वाभाविक है। खासकर हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में जहां सड़क सुरंगों और जलविद्युत परियोजनाओं का विस्तार तेजी से हुआ है। सवाल यह नहीं कि सुरंगें बनाई जाएं या नहीं। सवाल यह है कि निर्माण से पहले भूगर्भीय स्थिति को कितनी गंभीरता से समझा गया। चट्टानों की स्थिरता, पानी का रिसाव, भूमिगत दबाव और निर्माण के दौरान होने वाले बदलावों की वास्तविक समय में निगरानी हो रही है या नहीं। हिमालय में सुरंग खोदना सामान्य निर्माण कार्य नहीं है। यहां हर मीटर खुदाई के साथ पहाड़ की आंतरिक संरचना बदलती है। इसलिए आधुनिक रॉक सपोर्ट, भूगर्भीय सर्वेक्षण और रियल-टाइम निगरानी को परियोजना की अनिवार्य शर्त बनाया जाना चाहिए। स्रोत में भी इसी तरह की सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी की जरूरत रेखांकित की गई है।
पर्यटन को भी बदलनी होगी अपनी रफ्तार
हिमालय में पर्यटन रोजगार और अर्थव्यवस्था का बड़ा आधार है, लेकिन क्या हर पहाड़ी शहर अनियंत्रित पर्यटक भीड़ का दबाव झेल सकता है? किसी शहर की सड़क, पानी, सीवरेज, कचरा प्रबंधन और आपातकालीन निकासी क्षमता सीमित है तो पर्यटकों की संख्या भी उसी के अनुरूप होनी चाहिए। संवेदनशील क्षेत्रों में नियंत्रित प्रवेश, डिजिटल परमिट और मौसम के अनुसार पर्यटकों की संख्या तय करने जैसे उपायों पर गंभीरता से विचार करना होगा। पर्यटन का मतलब केवल ज्यादा लोग और ज्यादा कमाई नहीं है। सुरक्षित पर्यटन ही टिकाऊ पर्यटन है।
भारत के लिए सबसे बड़ी चेतावनी
नेपाल की बाढ़ का एक और पहलू भारत के लिए रणनीतिक महत्व रखता है। हिमालय पर देशों की सीमाएं हैं, लेकिन नदियों की नहीं। तिब्बत में पैदा हुआ खतरा नेपाल तक पहुंच सकता है और वहां से भारत तथा आगे बांग्लादेश तक असर डाल सकता है। इसलिए हिमालयी आपदाओं को केवल स्थानीय प्रशासन की समस्या मानना पर्याप्त नहीं है। भारत को अपने हिमालयी राज्यों में ग्लेशियर, हिमनद झील, भूस्खलन और नदी तंत्र की निगरानी को एकीकृत करना होगा।
उपग्रहों, स्वचालित कैमरों, भूकंपीय सेंसरों, मौसम रडार और नदी जलस्तर केंद्रों से मिलने वाले आंकड़ों को एक साझा तंत्र में जोड़ना होगा। लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है कि यह सूचना सीमा-पार समय पर साझा हो। भारत, नेपाल, भूटान और चीन के बीच राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन प्राकृतिक आपदाओं के सामने सहयोग की जरूरत अलग है। एक साझा हिमालयी जोखिम मानचित्र, वास्तविक समय की सूचना प्रणाली और सीमा-पार आपदा चेतावनी तंत्र समय की मांग है।
प्राकृतिक खतरा और मानवीय गलती अलग-अलग हैं
हर आपदा के बाद दो आसान तर्क सामने आते हैं। पहला-यह प्राकृतिक आपदा थी, इसे रोका नहीं जा सकता था। दूसरा-यह जलवायु परिवर्तन के कारण हुआ। दोनों बातें किसी हद तक सही हो सकती हैं, लेकिन इन्हें अंतिम जवाब बनाकर जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता।
ग्लेशियर का टूटना हमारे नियंत्रण में नहीं है। भूस्खलन को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है। लेकिन नदी के डूब क्षेत्र में बस्ती बसाना या अस्थिर ढलान पर निर्माण करना हमारे फैसले हैं। यह भी हमारे फैसले हैं कि एक घाटी में कितनी परियोजनाएं लगेंगी, सड़क कहां से गुजरेगी और आपदा आने पर लोगों को निकालने की व्यवस्था कितनी मजबूत होगी। इसलिए प्राकृतिक खतरे और मानवीय जोखिम को अलग-अलग समझना जरूरी है। प्राकृतिक घटना को हमेशा रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसके विनाश को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
नेपाल की बाढ़ हमें डराने के लिए नहीं, चेताने के लिए आई है। यह कह रही है कि हिमालय को केवल सड़क, सुरंग, बांध और पर्यटन की जमीन समझने की गलती अब महंगी पड़ सकती है। हमें विकास चाहिए, लेकिन जोखिम को समझकर। सड़क चाहिए, लेकिन हर ढलान पर नहीं। बिजली चाहिए, लेकिन हर नदी घाटी को परियोजनाओं से भरकर नहीं। पर्यटन चाहिए, लेकिन पहाड़ की क्षमता से ज्यादा दबाव डालकर नहीं। और सबसे बढ़कर, हमें यह समझना होगा कि हिमालय को टुकड़ों में नहीं बचाया जा सकता। एक ग्लेशियर, एक नदी, एक जंगल, एक ढलान और एक बस्ती-सब एक ही प्राकृतिक तंत्र का हिस्सा हैं।
अगली आपदा को शायद हम रोक न सकें। लेकिन अगली आपदा को बड़ी मानवीय त्रासदी बनने से रोकना हमारे हाथ में है।
हिमालय लगातार संकेत दे रहा है। कभी ग्लेशियर टूटकर, कभी नदी उफनकर और कभी पहाड़ दरककर। अब फैसला हमें करना है कि हम हर घटना के बाद मुआवजा और राहत बांटेंगे या उससे पहले अपनी विकास नीति बदलेंगे।





