नंदन नीलेकणी: इंफोसिस से आधार तक, और अब परीक्षा सुधार

Nandan Nilekani: From Infosys to Aadhaar, and now exam reform

हम सब जानते हैं कि पीएम नरेन्द्र मोदी ने नंदन नीलकेणी को एक बेहद खास जिम्मेदारी सौंपी है। वे दिल्ली लौट रहे हैं। वे पहले भी यहां रहे हैं। वे तब आधार परियोजना पर काम करने के लिए आए थे। वे तब रहते थे सफदरजंग लेन में। मैंने उन्हें तब कम से कम दो बार बंगाली मार्केट में देखा। उनकी एक प्रेस कांफ्रेंस को अटेंड भी किया।

विवेक शुक्ला

नंदन नीलेकणी फिर राजधानी वापस लौट रहे हैं। फिर उन्हें एक बड़ी जिम्मेदारी मिली है। पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने दी थी और अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें परीक्षा व्यवस्था सुधारने वाले उच्च-स्तरीय टास्क फोर्स का अध्यक्ष बना दिया है। पेपर लीक, छात्रों की चिंता और परीक्षा व्यवस्था पर उठते सवालों के बीच यह जिम्मेदारी उन पर आई है। लेकिन नीलेकणी के लिए यह कोई नई बात नहीं। वे पहले भी बड़े-बड़े काम हाथ में ले चुके हैं और हर बार सिस्टम को थोड़ा बेहतर छोड़ गए हैं।

ये बात करीब चार-पांच साल पहले की है। दिल्ली के बंगाली मार्केट में एक प्रमुख मिठाई की दुकान के बाहर 15-20 लोग किसी व्यक्ति को घेरे खड़े थे। सब ऑटोग्राफ मांग रहे थे। वो शख्स विनम्रता से मना कर रहा था। वो नंदन नीलेकणी ही थे। दुकान के मालिक आज भी कहते हैं कि सज्जनता और विनम्रता में उनका कोई सानी नहीं। शाम को जब शहर की भीड़ थोड़ी थमती, वे कभी-कभी पेंट-शर्ट में दोस्तों के साथ वहां दिख जाते। बिना सुरक्षा के। दिल्ली के जायके उनके लिए कोई शौक नहीं, बल्कि पुरानी यादें थीं उस शहर की जहां उन्होंने एक बार पूरा भारत बदलने का फैसला किया था।

नीलेकणी का बचपन स्थिर नहीं रहा। पिता मोहन राव नीलेकणी मैसूर और मिनर्वा मिल्स के जनरल मैनेजर थे, फैबियन समाजवादी विचारों वाले। मां दुर्गा घर संभालती थीं। पिता की नौकरी में बार-बार तबादले होते रहे। बारह साल की उम्र में वे धारवाड़ में चाचा के पास चले गए। वहीं उन्होंने आत्मनिर्भर होना सीखा। पढ़ाई बिशप कॉटन बॉयज स्कूल, सेंट जोसेफ हाई स्कूल धारवाड़ और कर्नाटक कॉलेज में हुई। फिर आईआईटी बॉम्बे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग। वहां वे औसत छात्र थे, लेकिन क्विज टीम के सितारे और सोशल लीडर। एक क्विज में ही रोहिणी से मुलाकात हुई। 1981 में शादी हो गई। उनके दो बच्चे हैं-निहार और जान्हवी।

करियर की शुरुआत 1978 में पटनी कंप्यूटर सिस्टम्स से हुई। वहीं एन.आर. नारायण मूर्ति से दोस्ती हुई। 1981 में सिर्फ 250 डॉलर की पूंजी लेकर नीलेकणी, मूर्ति और पांच और साथियों ने इंफोसिस खड़ा किया। कंपनी ने भारत को ग्लोबल आईटी हब बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। 2002 से 2007 तक नीलेकणी सीईओ रहे। उनके समय में इंफोसिस अरबों डॉलर का कारोबार छू गई। 2009 में उन्होंने कंपनी छोड़ दी और सार्वजनिक जीवन में कदम रखा।

सबसे बड़ा काम आधार था। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने उन्हें बुलाया। यूआईडीएआई के संस्थापक अध्यक्ष बने, कैबिनेट मंत्री का दर्जा मिला। जुलाई 2009 में दिल्ली आए। पहले होटल या दोस्तों के घर, फिर कर्नाटक भवन, बाद में 2 सफदरजंग लेन का बंगला। औपनिवेशिक स्टाइल का सफेद बंगला, बगीचे में मोर घूमते। पास ही इंदिरा गांधी का घर। हफ्ते में तीन रात दिल्ली, बाकी बेंगलुरु में परिवार के साथ। ऑफिस में फाइलों का अंबार, राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बात, गृह मंत्रालय की आपत्तियां, प्राइवेसी के सवाल। फिर भी वे कहते“मैं प्लंबर हूं, सरकार की पाइपलाइन ठीक कर रहा हूं।” आधार ने एक अरब से ज्यादा भारतीयों को बायोमेट्रिक पहचान दी। फर्जी लाभार्थी हटे, सरकारी खजाने में हजारों करोड़ बचे, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर आसान हुआ। यूपीआई, डिजिलॉकर जैसी चीजें उसी सोच से निकलीं। आलोचनाएं आईं, लेकिन उन्होंने गोपनीयता और सुरक्षा का ध्यान रखते हुए काम आगे बढ़ाया।

दानवीरता भी उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है। 2017 में पत्नी रोहिणी के साथ बिल गेट्स की गिविंग प्लेज पर हस्ताक्षर किए। संपत्ति का कम से कम आधा हिस्सा समाज के लिए देने का वादा। आईआईटी बॉम्बे को सैकड़ों करोड़ दे चुके हैं। रोहिणी भी बड़े पैमाने पर परोपकार करती हैं। दोनों शिक्षा, जलवायु और सुशासन पर काम करते हैं।

नीलेकणी राजनीति में भी गए। 2014 में कांग्रेस के टिकट पर बेंगलुरु साउथ से चुनाव लड़ा, हार गए। फिर तकनीक और सार्वजनिक सेवा पर लौट आए। 2017 में इंफोसिस के संकट में गैर-कार्यकारी अध्यक्ष बनकर कंपनी को संभाला। जी-20 में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर टास्क फोर्स के सह-अध्यक्ष भी रहे।

अब फिर दिल्ली लौट रहे हैं। जिम्मेदारी बदली है, शहर वही है। परीक्षा सुधार का टास्क फोर्स। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के विवाद, पेपर लीक और छात्रों के भविष्य की चिंता के बीच। टास्क फोर्स में पूर्व इसरो अध्यक्ष एस. सोमनाथ, पूर्व आईबी निदेशक तपन डेका, आईआईटी मद्रास निदेशक वी. कामाकोटी जैसे लोग हैं। नीलेकणी जानते हैं कि सिर्फ सजा बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। सिस्टम डिजाइन मजबूत करना होगा।पारदर्शी, तकनीक-आधारित और भरोसेमंद।

दोनों सरकारों ने उन्हें चुना। मनमोहन सिंह के समय कांग्रेस थी, अब मोदी के समय एनडीए। लेकिन नीलेकणी हमेशा टेक्नोक्रेट ही रहे। विशेषज्ञ। वे कहते हैं कि असमानता बढ़ रही है, युवा चिंतित हैं। इसलिए दीर्घकालिक, रणनीतिक दान पर जोर देते हैं। उनकी जिंदगी मध्यवर्गीय घर से वैश्विक मंच तक की है, लेकिन जमीनी समस्याएं कभी नहीं छोड़ीं।

आज जब भारत डिजिटल महाशक्ति बनने की बात करता है, नीलेकणी उस रास्ते के पथप्रदर्शक हैं। इंफोसिस से आधार, दान से परीक्षा सुधार-हर जगह राष्ट्रहित को आगे रखा। उनका व्यक्तित्व विनम्र, गहरा सोचने वाला और समस्या सुलझाने वाला है। बड़े प्रोजेक्ट लेते हैं-एक अरब लोगों की पहचान हो या परीक्षा व्यवस्था लीक-प्रूफ बनाना। तकनीक और करुणा के मेल से बदलाव संभव है, यही उनका संदेश है।

राजधानी की शामों में जब बंगाली मार्केट की रोशनी जलती है, तो लगता है कुछ कहानियां शहर के साथ चलती रहती हैं। कभी आधार की, कभी परीक्षा सुधार की। और उनके बीच एक आदमी जो दोनों को जोड़ता है। नाम आप जानते ही हैं। उनकी कहानी अभी जारी है। और भारत उनका ऋणी है।