विनोद कुमार विक्की
हाल ही में दिल्ली से प्रकाशित होने वाले 44 वर्ष पुराने सांध्य दैनिक ‘सांध्य टाइम्स’ का प्रकाशन बंद होने की सूचना सामने आई। इससे पहले इसी साल 8 जनवरी को देश के लोकप्रिय समाचार पत्रों में शुमार ‘राष्ट्रीय सहारा’ का प्रकाशन भी बंद हो गया। वर्ष 1991 से अनवरत प्रकाशित होने वाला यह समाचार पत्र कभी दिल्ली, पटना, कानपुर, वाराणसी, गोरखपुर, देहरादून और लखनऊ जैसे शहरों से अपने संस्करण प्रकाशित करता था। कोविड-19 के दौर में हिंदुस्तान मीडिया की लोकप्रिय बाल एवं साहित्यिक पत्रिकाएँ ‘नंदन’ और ‘कादंबिनी’ भी अपने लंबे सफर को विराम दे चुकी हैं। इन घटनाओं को महज कुछ प्रकाशनों के बंद होने के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इनके पीछे बदलती पाठकीय आदतों, तकनीकी क्रांति, आर्थिक दबाव और संपादकीय प्राथमिकताओं की एक बड़ी कहानी छिपी हुई है।
समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के अस्तित्व पर मंडराते संकट के अनेक कारण हैं। इनमें सबसे प्रमुख है दृश्य-प्रधान तकनीक का तेजी से बढ़ता प्रभाव। मोबाइल फोन, सोशल मीडिया, ओटीटी प्लेटफॉर्म, वेब सीरीज़, शॉर्ट वीडियो, रील और वीडियो स्ट्रीमिंग ने सूचना एवं मनोरंजन की दुनिया का स्वरूप बदल दिया है। कभी समाचार जानने के लिए सुबह अखबार का इंतजार होता था, तो किसी नई कहानी, कविता या विचार को पढ़ने के लिए पत्रिका का अंक हाथ में आने की उत्सुकता रहती थी। आज वही जानकारी कुछ सेकंड में मोबाइल स्क्रीन पर उपलब्ध हो जाती है। पाठक धीरे-धीरे दर्शक में बदल रहा है और यह परिवर्तन मुद्रित मीडिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।
समाज के निर्माण में साहित्य का योगदान उतना ही मौलिक है, जितना शरीर में रक्त का। लेखक केवल शब्दों का जादूगर नहीं होता, बल्कि वह अपने समय का सजग प्रहरी भी होता है। वह समाज की धड़कनों को महसूस करता है, विसंगतियों को पहचानता है और अपनी लेखनी के माध्यम से प्रश्न खड़े करता है। उसकी रचनाएँ केवल मनोरंजन नहीं करतीं, बल्कि मनुष्य को सोचने, समझने और बेहतर समाज की कल्पना करने के लिए प्रेरित करती हैं। इसलिए साहित्य को सभ्यता की स्मृति और सामाजिक चेतना का महत्वपूर्ण माध्यम माना गया है।
लेकिन आज पठन-संस्कृति स्वयं चुनौती के दौर से गुजर रही है। पहले लोग पुस्तकालयों में घंटों बैठते थे, नई किताबों की खोज करते थे, साहित्यिक गोष्ठियों में भाग लेते थे और किसी रचना पर लंबी बहस करते थे। आज कुछ ही मिनटों में मनोरंजन उपलब्ध कराने वाली रील और शॉर्ट वीडियो ने उस धैर्य को प्रभावित किया है, जो एक अच्छी पुस्तक पढ़ने के लिए आवश्यक होता है। मोबाइल स्क्रीन पर लगातार बदलती तस्वीरें और छोटे-छोटे वीडियो मस्तिष्क को त्वरित सूचना एवं मनोरंजन के लिए अभ्यस्त कर रहे हैं। परिणामस्वरूप लंबा लेख पढ़ना, गंभीर विषय पर विचार करना अथवा किसी पुस्तक के साथ लंबे समय तक बने रहना कठिन होता जा रहा है।
कभी पुस्तकें घर की पहचान हुआ करती थीं। अलमारियों में सजी पुस्तकें परिवार की बौद्धिक संपदा मानी जाती थीं। आज कई घरों में वही पुस्तकें धूल जमा रही हैं और मोबाइल फोन लगातार सक्रिय है। पुस्तक मेले अब भी लोगों को आकर्षित करते हैं, लेकिन अनेक स्थानों पर उनका आकर्षण पुस्तक खरीदने से अधिक आयोजन, सेल्फी और सोशल मीडिया सामग्री तैयार करने तक सीमित होता दिखाई देता है। यह बदलाव केवल माध्यम का बदलाव नहीं, बल्कि पठन की मानसिकता में आए परिवर्तन का संकेत भी है।
हालाँकि इसके लिए केवल तकनीक को दोष देना उचित नहीं होगा। पत्र-पत्रिकाओं की दुनिया में संपादकीय भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। कई बार परिचित अथवा नामी-गिरामी साहित्यकारों को अत्यधिक संरक्षण देना पत्रिका के लिए नुकसानदेय साबित होता है। अतिव्यस्तता या उदासीनता के कारण कुछ संपादक नए नाम से आई अच्छी रचना को पढ़ने का समय नहीं निकालते। इसके विपरीत परिचित, प्रिय अथवा चर्चित लेखकों की रचनाएँ आसानी से प्रकाशित हो जाती हैं। जब पाठक को लगातार ऐसी सामग्री मिलने लगे, जो उसकी रुचि, जिज्ञासा और समय की अपेक्षाओं पर खरी न उतरे, तो उसका संबंधित पत्रिका से मोहभंग होना स्वाभाविक है।
एक सफल पत्रिका केवल कागज और स्याही से नहीं बनती; वह संपादक, लेखक और पाठक के बीच बने विश्वास से जीवित रहती है। संपादक का दायित्व है कि वह स्थापित नामों के साथ-साथ नई प्रतिभाओं को भी अवसर दे। अच्छी रचना का मूल्य लेखक की प्रसिद्धि से नहीं, उसकी गुणवत्ता से निर्धारित होना चाहिए। यदि पत्र-पत्रिकाएँ बदलते समय की चुनौतियों को समझें, नए विषयों को स्थान दें और युवा पाठकों की रुचि के अनुरूप प्रस्तुति विकसित करें, तो वे अपने अस्तित्व को मजबूत कर सकती हैं।
फिर भी यह कहना जल्दबाजी होगी कि लेखन का युग समाप्त होने की कगार पर है। सच तो यह है कि लेखन ने अपना रूप बदला है, अस्तित्व नहीं। आज लेखक ई-बुक, ऑडियोबुक, ब्लॉग, डिजिटल पत्रिकाओं और सोशल मीडिया के माध्यम से अपने विचारों को नए पाठक वर्ग तक पहुँचा रहे हैं। शब्द अब केवल कागज पर नहीं, बल्कि कंप्यूटर, टैबलेट और मोबाइल की स्क्रीन पर भी दिखाई दे रहे हैं। डिजिटल माध्यमों ने क्षेत्रीय और छोटे शहरों के लेखकों को भी व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचने का अवसर दिया है।
तकनीक इसलिए केवल संकट नहीं, अवसर भी है। जरूरत इस बात की है कि साहित्य और पत्रकारिता डिजिटल दुनिया से संघर्ष करने के बजाय उसके साथ संवाद स्थापित करें। पत्रिकाएँ अपने मुद्रित संस्करण के साथ डिजिटल संस्करण, ऑडियो सामग्री, पॉडकास्ट और आकर्षक ऑनलाइन प्रस्तुति विकसित कर सकती हैं। गंभीर साहित्य को युवा पीढ़ी की भाषा और माध्यम में प्रस्तुत किया जाए तो नई पीढ़ी उससे जुड़ सकती है।
समकालीन साहित्य आज भी बदलते समाज का सशक्त प्रतिबिंब है। युवा पीढ़ी की आकांक्षाएँ, बेरोजगारी, सामाजिक असमानता, पारिवारिक संबंधों में बदलाव, पर्यावरणीय संकट, तकनीक का प्रभाव और मानवीय संवेदनाओं की जटिलताएँ नई दृष्टि और नए शिल्प के साथ रचनाओं में अभिव्यक्त हो रही हैं। व्यंग्य, कहानी, कविता और आलेख, सभी विधाओं में प्रयोग जारी हैं। यानी संकट शब्दों का नहीं, पाठक तक शब्दों को पहुँचाने के पारंपरिक माध्यम का है।
मुद्रित पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएँ भले ही पहले जैसी लोकप्रिय न रही हों, लेकिन विचारों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। सूचना के इस विस्फोटक दौर में सही और विश्वसनीय जानकारी, गहन विश्लेषण तथा विवेकपूर्ण दृष्टि की जरूरत बढ़ी है। सोशल मीडिया हमें सूचना की गति देता है, लेकिन साहित्य हमें उस सूचना को समझने की दृष्टि देता है। वीडियो हमें दृश्य दिखा सकता है, पर पुस्तक कई बार उस दृश्य के पीछे छिपे मनुष्य को समझने की क्षमता देती है।
इसलिए आवश्यकता तकनीक से दूरी बनाने की नहीं, बल्कि तकनीक और पठन-संस्कृति के बीच संतुलन बनाने की है। परिवारों, विद्यालयों, पुस्तकालयों और साहित्यिक संस्थाओं को मिलकर नई पीढ़ी में पढ़ने की आदत विकसित करनी होगी। बच्चों को केवल परीक्षा के लिए नहीं, आनंद और ज्ञान के लिए भी पुस्तक पढ़ने के लिए प्रेरित करना होगा। लेखकों और संपादकों को भी बदलते समय की नब्ज पहचाननी होगी।
मनोरंजन के सैकड़ों नए साधन आते रहेंगे। तकनीक और अधिक विकसित होगी। स्क्रीन का आकार बदल सकता है, माध्यम बदल सकते हैं, लेकिन मनुष्य की जिज्ञासा, कल्पना और विचार की आवश्यकता कभी समाप्त नहीं होगी।





