पूर्वजों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और हमारे संस्कार जीवनभर जीवित रहने चाहिए

Respect and gratitude towards our ancestors, as well as our cultural values, should remain alive throughout our lives

ओम प्रकाश शर्मा

पितृ पक्ष यानी की श्राद्ध का समय चल रहा है, इस समय हम पूर्वजों के प्रति श्रद्धा विश्वास के साथ श्रद्धांजलि देते हुए विभिन्न कर्मकांड को करते हैं, हम अपने पूर्वजों का ऋण चुकाने के लिए प्रयास करते हैं, पितृ पक्ष पर मथुरा निवासी वरिष्ठ अध्यापक ओमप्रकाश शर्मा कहते हैं कि पितृ पक्ष का सबसे बड़ा संदेश है कि इन सोलह दिनों में अपने पूर्वजों को याद करते हैं, उनके नाम पर जल अर्पित करते हैं या दान-पुण्य करते हैं, तो क्या कभी आपने यह सोचा है कि क्या हमारे पूर्वज सिर्फ कर्मकांड से संतुष्ट हो जाते हैं या वे चाहते हैं कि हम उनके अधूरे छोड़े हुए कामों और उनके संस्कारों को आगे बढ़ाएं, आखिर हम अपने ‘पितृ ऋण’ को असल मायनों में कैसे चुका सकते हैं, इसके लिए विचार करें। सनातन दर्शन, योग विज्ञान और जीवन के रहस्यों पर हम बात करें तो यह एक ऐसा उत्तरदायित्व है, जो हमारे अतीत और हमारे भविष्य (यानी आने वाली पीढ़ी) को जोड़ता है। इससे सरल शब्दों में बिंदुवार समझें –

विरासत में मिली संपत्ति बनाम संस्कार

इसे एक छोटे से उदाहरण से समझें। मान लीजिए किसी परिवार के दादा-परदादा ने अपनी पूरी जिंदगी मेहनत करके भारी संपत्ति, मकान और बैंक बैलेंस जोड़ लिया और उसे अपने बच्चों के नाम कर दिया। लेकिन उन बच्चों को कोई अच्छे संस्कार, अनुशासन या मानवीय मूल्य नहीं मिले। नतीजा क्या हुआ? कुछ ही सालों में उस नई पीढ़ी ने वह सारा पैसा गलत आदतों और अहंकार में उड़ा दिया, और परिवार का नाम मिट्टी में मिल गया। इसके विपरीत, एक दूसरा परिवार है जिसके पास बहुत ज्यादा धन-दौलत तो नहीं थी, लेकिन उनके बुजुर्गों ने अपनी संतान को सत्यनिष्ठा, प्रेम, बड़ों का सम्मान और धर्म के रास्ते पर चलना सिखाया। वह पीढ़ी आज समाज में सिर उठाकर जी रही है और अपने कुल का नाम रोशन कर रही है। इससे यह साफ पता चलता है कि हमारे पूर्वज हमसे कोई सोने-चांदी के उपहार नहीं मांगते, वे चाहते हैं कि हम उनके ‘संस्कारों’ को जीवित रखें।

पितृ ऋण चुकाने का मार्ग: आने वाली पीढ़ी को दिशा देना

हमारे शास्त्रों में तीन प्रकार के ऋण बताए गए हैं – देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। देव ऋण पूजा-पाठ से, ऋषि ऋण ज्ञान से और पितृ ऋण केवल और केवल एक ही तरीके से चुकाया जा सकता है – वह है ‘वंश और संस्कारों का संरक्षण’। जब आप अपने बच्चों को अपनी संस्कृति से जोड़ते हैं, उन्हें संवेदना सिखाते हैं, और यह अहसास कराते हैं कि वे किस महान परंपरा का हिस्सा हैं, तब आप अपने पितरों का कर्ज चुका रहे होते हैं। अगर आप अपने बच्चों को सिर्फ भौतिकवादी मशीन बना रहे हैं जो अपनों को भूल चुकी है, तो आप अपने पितृ ऋण को और ज्यादा बढ़ा रहे हैं। श्राद्ध का असली उद्देश्य ही यही है कि हम अपने अतीत से सीखकर अपने वर्तमान को सुधारें और भविष्य को सुरक्षित करें।

सनातन दृष्टि: पीढ़ियों की श्रृंखला और हमारा कर्तव्य

इसे हमारे सनातन दर्शन की गहरी दृष्टि से समझिए। हमारे यहाँ जन्म को केवल एक शारीरिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि आत्मा की एक निरंतर यात्रा माना गया है। आप अपने पूर्वजों की उस लंबी श्रृंखला की एक ऐसी कड़ी हैं जिस पर आज पूरा परिवार टिका हुआ है। अगर यह कड़ी कमजोर पड़ गई, तो पूरा खानदान और उसकी संस्कृति बिखर जाएगी। स्वामी विवेकानंद ने कहा था – ‘वही राष्ट्र या परिवार जीवित रहता है जिसकी जड़ें अपने इतिहास और संस्कारों से जुड़ी होती हैं।’ पितृ पक्ष हमें यही चेताने आता है कि अपनी जड़ों को मजबूत रखिए ताकि आने वाले तूफान आपकी पीढ़ियों को उखाड़ न सकें।

मित्रों, पितृ पक्ष के इन पवित्र दिनों का समापन भले ही अमावस्या के साथ हो जाए, लेकिन गौरवशाली सनातन धर्म संस्कृति व प्राचीन परंपराओं के अनुसार हमारा पूर्वजों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और हमारे संस्कार जीवनभर जीवित रहने चाहिए।