फॉर्म 6 में बदलाव पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त के बाद राजनीतिक मायने ?

Political significance after Supreme Court's strictness on changes in Form 6?

सौरभ वार्ष्णेय

भारत में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की संवैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र में नागरिक के सबसे महत्वपूर्ण अधिकार मताधिकार का आधार हैं। इसलिए मतदाता सूची में किसी भी प्रकार का बदलाव, संशोधन या नई प्रक्रिया केवल प्रशासनिक निर्णय भर नहीं माना जा सकता। इसके पीछे कानून, पारदर्शिता और संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता जुड़ी होती है। ऐसे में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के दौरान मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 में कथित बदलाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी बेहद महत्वपूर्ण है।
सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि उसने फॉर्म-6 में इस प्रकार के किसी बदलाव को मंजूरी नहीं दी थी। अदालत ने यह जानने की इच्छा जताई है कि आखिर यह बदलाव किसके स्तर पर हुआ और इसके पीछे निर्णय लेने की पूरी प्रक्रिया क्या थी। सीजेआई सूर्यकांत की यह टिप्पणी कि यदि कोई गैर-कानूनी काम हुआ है तो उसके परिणाम भुगतने होंगे, मामले की गंभीरता को स्पष्ट करती है। यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी वैधानिक प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले फॉर्म में बदलाव किया गया, तो वह किस अधिकार के तहत किया गया? क्या यह निर्णय चुनाव आयोग के स्तर पर सामूहिक रूप से लिया गया? क्या सभी चुनाव आयुक्तों की सहमति इसमें थी? क्या इसके लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया? और सबसे महत्वपूर्ण क्या इस बदलाव की जानकारी सार्वजनिक रूप से दी गई थी?

लोकतंत्र में चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की ताकत केवल उसके अधिकारों में नहीं, बल्कि उसकी निष्पक्षता और सार्वजनिक विश्वास में होती है। चुनाव आयोग पर किसी एक राजनीतिक दल या सरकार का प्रभाव होने का संदेह भी लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है। इसलिए आयोग के प्रत्येक निर्णय में प्रक्रिया की पारदर्शिता उतनी ही आवश्यक है, जितना उसका अंतिम परिणाम। फॉर्म 6 का मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि यह नए मतदाताओं के पंजीकरण से संबंधित है। यदि इस प्रक्रिया में कोई अतिरिक्त घोषणा, दस्तावेज या शर्त जोड़ी जाती है, तो उसका सीधा प्रभाव नागरिक के मतदाता बनने के अधिकार पर पड़ सकता है। किसी पात्र नागरिक को केवल प्रक्रिया की जटिलता के कारण मताधिकार से वंचित होना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं माना जा सकता।

एसआईआर को लेकर पहले से ही राजनीतिक विवाद चल रहा है। विपक्षी दल इस प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि बड़ी संख्या में मतदाता इससे प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग का तर्क अपनी जगह है। ऐसे माहौल में यदि फॉर्म 6 जैसे बुनियादी दस्तावेज में बदलाव को लेकर भी अस्पष्टता पैदा होती है, तो स्वाभाविक रूप से संदेह और बढ़ता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू उठाया है निर्णय लेने की संस्थागत प्रक्रिया। अदालत यह जानना चाहती है कि एसआईआर से संबंधित निर्णय केवल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने लिए या फिर चुनाव आयोग ने उन्हें बहुमत अथवा सर्वसम्मति से मंजूरी दी। यह प्रश्न केवल वर्तमान विवाद तक सीमित नहीं है। यह चुनाव आयोग के भीतर सामूहिक निर्णय प्रणाली और संवैधानिक जवाबदेही से भी जुड़ा हुआ है।

चुनाव आयोग कोई व्यक्तिगत संस्था नहीं है। यह एक संवैधानिक संस्था है और उसके निर्णय संस्थागत होने चाहिए। यदि किसी मामले में सर्वसम्मति नहीं बनती, तो कानून के अनुसार निर्णय लेने की निर्धारित प्रक्रिया का पालन होना चाहिए। यदि कोई महत्वपूर्ण निर्णय केवल एक व्यक्ति के स्तर पर लिया गया हो और बाकी सदस्यों की भूमिका नगण्य कर दी गई हो, तो स्वाभाविक रूप से संस्थागत संतुलन पर प्रश्न उठेंगे।
हालांकि, इस पूरे मामले में जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित करने संबंधी अंतरिम आदेश देने से इनकार किया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल अखबार की रिपोर्ट के आधार पर कोई आदेश नहीं दिया जा सकता। यह न्यायिक संयम लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए महत्वपूर्ण संदेश है।

अदालत ने चुनाव आयोग से रिकॉर्ड मांगा है। यही रिकॉर्ड अब इस विवाद की वास्तविक तस्वीर सामने लाएगा। यदि रिकॉर्ड यह साबित करता है कि सभी निर्णय नियमों और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लिए गए थे, तो विवाद का एक बड़ा हिस्सा स्वत: समाप्त हो जाएगा। लेकिन यदि रिकॉर्ड से यह सामने आता है कि किसी महत्वपूर्ण निर्णय को आवश्यक संस्थागत सहमति के बिना लागू किया गया, तो फिर सवाल केवल फॉर्म 6 तक सीमित नहीं रहेगा।

यह मामला चुनाव आयोग की विश्वसनीयता की अग्निपरीक्षा भी बन सकता है। देश की जनता यह जानना चाहेगी कि मतदाता सूची से जुड़े इतने महत्वपूर्ण फैसले किस प्रक्रिया के तहत लिए गए। आखिर चुनाव आयोग की शक्ति का आधार कानून है या प्रशासनिक विवेक? और यदि कोई बदलाव किया गया तो उसकी वैधानिक स्वीकृति कहां है?

आज आवश्यकता इस बात की है कि चुनावी प्रक्रिया से जुड़े हर विवाद का समाधान राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि दस्तावेजों, कानून और पारदर्शी प्रक्रिया के आधार पर हो। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, किसी को भी चुनाव आयोग की विश्वसनीयता के साथ खिलवाड़ करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

मतदाता सूची लोकतंत्र की बुनियाद है। इसमें एक गलत नाम का शामिल होना जितनी बड़ी समस्या है, उतना ही गंभीर किसी पात्र मतदाता का नाम छूट जाना भी है। इसलिए मतदाता सूची के शुद्धीकरण के नाम पर यदि प्रक्रिया अपनाई जा रही है, तो उसकी हर कड़ी स्पष्ट, पारदर्शी और न्यायसंगत होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल केवल एक सवाल उठाया है कि फॉर्म 6 में बदलाव आखिर किसने किया? लेकिन इस सवाल के पीछे लोकतंत्र का इससे भी बड़ा प्रश्न छिपा है कि क्या चुनावी प्रक्रिया में लिए जाने वाले प्रत्येक निर्णय का संस्थागत और वैधानिक हिसाब जनता के सामने होना चाहिए? इसका उत्तर निश्चित रूप से हां है।क्योंकि चुनाव केवल वोट डालने का दिन नहीं है। चुनाव उस पूरी प्रक्रिया का नाम है जिसमें मतदाता सूची से लेकर मतदान केंद्र और मतगणना तक हर कदम पर नागरिक का विश्वास कायम रहना चाहिए। यदि इस विश्वास में दरार आती है तो उसका नुकसान किसी एक राजनीतिक दल को नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक तंत्र को होता है।इसलिए अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट में पेश होने वाले चुनाव आयोग के रिकॉर्ड पर हैं। रिकॉर्ड बताएगा कि फॉर्म 6 में बदलाव वास्तव में किसने किया, किस अधिकार से किया और किस प्रक्रिया के तहत किया। यदि सब कुछ कानून के अनुरूप है तो संदेह दूर होना चाहिए और यदि कहीं नियमों की अनदेखी हुई है तो जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। लोकतंत्र में चुनाव की पवित्रता केवल निष्पक्ष मतदान से नहीं बल्कि निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया से सुनिश्चित होती है। मतदाता का अधिकार किसी भी प्रशासनिक सुविधा से बड़ा है और इसी कसौटी पर हर चुनावी निर्णय को परखा जाना चाहिए।