बदलता संघ और बदलता युवा: संघ प्रमुख मोहन भागवत का ‘जेन-जी’ के नाम संदेश

The Evolving Sangh and the Changing Youth: Sangh Chief Mohan Bhagwat's Message to 'Gen-Z'

अशोक भाटिया

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परंपरा, अनुशासन और प्राचीन मूल्यों को सर्वोपरि रखने के लिए जाना जाता है। ऐसे में जब संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत समकालीन युवा पीढ़ी—जिन्हें ‘जेन-जी’ और ‘जेन-अल्फा’ कहा जाता है—के पक्ष में खुलकर खड़े होते हैं, तो यह भारतीय विमर्श में एक युगांतरकारी मोड़ का संकेत है। हाल ही में संघ प्रमुख ने जिस बेबाकी और संवेदनशीलता के साथ युवाओं की सोच, उनके अधिकारों, उनके विरोध प्रदर्शनों और उनकी देशभक्ति का समर्थन किया है, उसने देश के नीति-निर्माताओं और पुरानी पीढ़ी को आत्ममंथन करने पर मजबूर कर दिया है । यह संदेश दर्शाता है कि संघ समय के साथ न केवल बदल रहा है, बल्कि नए भारत की नई सोच को अपनाने के लिए पूरी तरह तैयार है। डिजिटल बदलावों और बदलते सामाजिक परिवेश के बीच यह संदेश राष्ट्र निर्माण की एक नई रूपरेखा प्रस्तुत करता है।

अमूमन हर दौर में पुरानी पीढ़ी को नई पीढ़ी से शिकायतें रही हैं। आज भी अक्सर ‘जेन-जी’ को लेकर यह धारणा बनाई जाती है कि वे रील्स और सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में खोए हुए हैं, वे एकाग्रता की कमी से जूझ रहे हैं और अपनी संस्कृति से दूर जा रहे हैं। लेकिन डॉ. मोहन भागवत ने इन तमाम रूढ़िवादिता को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि आज की युवा पीढ़ी पिछली पीढ़ियों की तुलना में कहीं अधिक ईमानदार, पारदर्शी, जागरूक और देशभक्त है।

संघ प्रमुख का यह कहना कि वे “नई पीढ़ी पर आंख मूंदकर भरोसा करते हैं,” एक बहुत बड़ा वक्तव्य है । यह भरोसा इस समझ से उपजा है कि आज का युवा पाखंड को पसंद नहीं करता। वह जो सोचता है, वही बोलता है; उसकी कथनी और करनी में दिखावा नहीं होता। उनकी देशभक्ति किसी प्रदर्शनकारी राष्ट्रवाद का हिस्सा नहीं है, बल्कि देश को आंतरिक रूप से मजबूत और अधिक न्यायसंगत बनाने की उनकी स्वाभाविक इच्छा से प्रेरित है। जब देश का सबसे बड़ा सांस्कृतिक संगठन युवाओं की इस प्रामाणिकता को मान्यता देता है, तो यह युवाओं के आत्मविश्वास को एक नई उड़ान देता है और पुरानी पीढ़ी के संशय को दूर करता है।

इस संदेश का सबसे महत्वपूर्ण और चर्चा में रहने वाला हिस्सा वह था, जहां डॉ. भागवत ने युवाओं के विरोध प्रदर्शनों और उनके अधिकारों की बात की । पिछले कुछ वर्षों में देश ने विभिन्न शैक्षणिक और सामाजिक मुद्दों पर छात्रों के उग्र आंदोलन देखे हैं। दुर्भाग्यवश, कई बार ऐसे आंदोलनों को फौरन दबाने या उन्हें ‘देश-विरोधी’ या ‘गुमराह’ बताने की कोशिशें की जाती रही हैं। लेकिन सरसंघचालक ने इस पर बेहद परिपक्व और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण रखा ।

उन्होंने साफ किया कि व्यवस्था, सरकारी नीतियों या किसी घटना के खिलाफ आवाज उठाना और विरोध प्रदर्शन करना युवाओं का लोकतांत्रिक अधिकार है । युवाओं का गुस्सा व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए नहीं, बल्कि उसे सुधारने, पारदर्शी बनाने और अधिक जवाबदेह देखने के लिए होता है। किसी आंदोलन में शामिल होने मात्र से कोई युवा देश-विरोधी नहीं हो जाता । यह बयान उन ताकतों के लिए एक कड़ा सबक है जो हर असहमति की आवाज को दबा देना चाहती हैं। लोकतंत्र की असली ताकत निरंतर संवाद में है, दमन में नहीं, और युवाओं का विरोध इसी स्वस्थ संवाद की मांग करता है।

आज का युवा सूचना क्रांति के उस दौर में जी रहा है जहां दुनिया भर का ज्ञान उसकी उंगलियों पर है। वह किसी भी बात या परंपरा को सिर्फ इसलिए चुपचाप नहीं मान लेता क्योंकि वह किसी बुजुर्ग या प्राचीन व्यवस्था ने कही है। वह तर्क चाहता है, वह प्रमाण चाहता है, वह न्यायसंगत कारण चाहता है। डॉ. मोहन भागवत ने युवाओं के इस खोजी स्वभाव और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की खुलकर सराहना की है। उन्होंने माना कि आज की पीढ़ी बिना डरे सीधे सवाल पूछता है और पुरानी पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि वे इन सवालों से भागने या नाराज होने के बजाय उनके तार्किक और संतोषजनक जवाब दें।

यह दृष्टिकोण संघ की पारंपरिक छवि से अलग और प्रगतिशील है। संघ प्रमुख का यह मानना कि समस्याओं या असंतोष का समाधान ‘बल’ या ‘उपेक्षा’ से नहीं हो सकता, आज के समय की सबसे बड़ी नीतिगत जरूरत है। जब छात्र किसी नीति पर अपनी चिंताएं जताते हैं, तो प्रशासन या समाज को उनके साथ एक ‘मेंटर’ की तरह व्यवहार करना चाहिए, न कि किसी क्रूर शासक की तरह। उनके तर्कों को संवेदनशीलता से सुनना और उनकी आशंकाओं को दूर करना ही उनके असंतोष को शांत करने का एकमात्र सर्वमान्य उपाय है।

आज का भारतीय समाज वैचारिक रूप से अत्यधिक ध्रुवीकृत है। दक्षिणपंथ और वामपंथ के बीच की खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि मध्यमार्ग गायब सा दिखता है। ऐसे माहौल में संघ प्रमुख का यह बयान एक पुल का काम करता है। यह संदेश उन युवाओं तक भी एक सकारात्मक प्रतिध्वनि के रूप में पहुंचता है जो संघ को हमेशा एक अत्यंत पुरातनपंथी संस्था के रूप में देखते आए हैं। जब वे देखते हैं कि संघ का सर्वोच्च नेता उनके विरोध करने के अधिकार और उनकी तार्किकता का सम्मान कर रहा है, तो वैचारिक कट्टरता की दीवारें कमजोर होती हैं ।

यह लेख इस बुनियादी सत्य को रेखांकित करता है कि राष्ट्र निर्माण किसी एक विचारधारा के एकाधिकार से नहीं हो सकता। इसके लिए देश के हर युवा की ऊर्जा, उसकी स्वतंत्र सोच और उसके रचनात्मक विरोध की आवश्यकता है। संघ प्रमुख ने युवाओं को यह अहसास कराया है कि वे देश के भविष्य ही नहीं, बल्कि वर्तमान के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सेदार हैं और राष्ट्र को उनके सहयोग की जरूरत है।

डॉ. भागवत का यह वक्तव्य जितना युवाओं के लिए मार्गदर्शक है, उससे कहीं अधिक यह देश की वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था, पुलिस तंत्र और राजनीतिक दलों के लिए एक गंभीर ‘चेतावनी’ की तरह है । पिछले कुछ समय में देश के अलग-अलग हिस्सों में छात्रों की मांगों को जिस तरह बलपूर्वक दबाया गया, संघ प्रमुख का यह बयान उन प्रशासनिक नीतियों पर एक परोक्ष प्रहार है ।

यदि प्रशासनिक तंत्र युवाओं को केवल एक ‘कानून-व्यवस्था’ की समस्या के रूप में देखता रहेगा, तो हम अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का कभी लाभ नहीं उठा पाएंगे। विश्वविद्यालयों को पुलिस छावनी बनाने के बजाय उन्हें स्वतंत्र विचार-विमर्श का केंद्र बनाना होगा। जब तक युवाओं को यह विश्वास नहीं होगा कि उनकी चिंताओं को गंभीरता से सुना जा रहा है, तब तक सड़कों का असंतोष पूरी तरह शांत नहीं हो सकता। प्रशासन को अपनी पुरानी मानसिकता को छोड़कर युवाओं के साथ मित्रवत व्यवहार करना होगा।

डॉ. मोहन भागवत का यह संदेश केवल ‘जेन-जी’ के लिए प्रेरणा नहीं है, बल्कि पुरानी पीढ़ी, राजनीतिक दलों और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए एक ‘वेक-अप कॉल’ है । हमें युवाओं को एक समस्या के रूप में देखना बंद करना होगा; वे वास्तव में देश की समस्याओं का सबसे आधुनिक समाधान हैं। युवा आबादी की ऊर्जा को दबाने के बजाय उसे सही दिशा देना ही समझदारी है।

यदि भारत को सचमुच एक वैश्विक शक्ति, ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था और ‘विश्वगुरु’ बनना है, तो हमें अपनी युवा आबादी की इस ऊर्जा, उनकी बेबाकी और उनकी तार्किकता को सहेजना होगा। संघ प्रमुख ने इस दिशा में संवाद का हाथ बढ़ाकर एक बड़ी पहल की है। अब वास्तविक जिम्मेदारी सरकार, शिक्षण संस्थानों और परिवारों की है कि वे युवाओं के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलें। ‘जेन-जी’ पर किया गया यह भरोसा ही आने वाले कल के समृद्ध, सशक्त, समावेशी और लोकतांत्रिक भारत की नींव बनेगा ।