बम पिस्तौल से क्रांति नहीं आती : शहीदे आज़म भगत सिंह

Revolution is not brought about by bombs and pistols: Shaheed-e-Azam Bhagat Singh

दिलीप कुमार पाठक

शहीदे आज़म भगत सिंह: वैचारिक क्रांति का वो नाम, जो आज भी हर दिल में धड़कता है जो समाज में बदलाव देखना चाहता है। जब भी हम भगत सिंह के बारे में सोचते हैं, हमारे ज़हन में एक जाबांज़ नौजवान की छवि उभरती है, जिसके हाथ में पिस्तौल है और आंखों में आज़ादी का सपना। लेकिन यह छवि उनके विराट व्यक्तित्व का केवल एक छोटा सा हिस्सा है। भगत सिंह सिर्फ एक जाबांज़ क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि वे एक गहरे विचारक, दार्शनिक और दूरदर्शी राजनेता थे, जिनका बौद्धिक स्तर अपने समय से बहुत आगे था।

आमतौर पर भगत सिंह को केवल हिंसा और हथियारों से जोड़कर देखा जाता है, जो कि उनके साथ एक बड़ा अन्याय है। वे कभी भी हिंसा के अंध-समर्थक नहीं थे। उन्होंने अदालत में अपने ऐतिहासिक बयान में साफ कहा था, ‘क्रांति से हमारा तात्पर्य अंततः एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना से है जिसे किसी तरह का ख़तरा न हो।’ उनके लिए अहिंसा का मतलब कायरता नहीं था, बल्कि वे मानते थे कि जब शोषक सत्ता बहरी हो जाए, तो उसे जगाने के लिए धमाके की ज़रूरत होती है, न कि किसी की जान लेने की। असेंबली में बम फेंकने का उनका उद्देश्य किसी की हत्या करना नहीं, बल्कि सोई हुई ब्रिटिश हुकूमत की अंतरात्मा को झकझोरना था। वे वैचारिक रूप से अहिंसा की मूल भावना का सम्मान करते थे, लेकिन उनका मानना था कि आज़ादी की लड़ाई में आत्मरक्षा और हक के लिए उठाई गई आवाज़ को हिंसा का नाम देकर दबाया नहीं जा सकता। भगत सिंह का राष्ट्रवाद संकीर्ण नहीं था, बल्कि वह अंतरराष्ट्रीयता यानि वसुधैव कुटुम्बकम के महान विचारों से ओतप्रोत था। वे केवल भारत को ब्रिटिश गुलामी से आज़ाद नहीं कराना चाहते थे, बल्कि वे दुनिया भर के शोषितों, मजदूरों और किसानों की आज़ादी के पैरोकार थे। वे कार्ल मार्क्स और व्लादिमीर लेनिन के विचारों से गहराई से प्रभावित थे। उनके लिए आज़ादी का मतलब सिर्फ गोरे शासकों की जगह भूरे शासकों का बैठ जाना नहीं था, बल्कि वे एक ऐसे वैश्विक समाज की कल्पना करते थे जहां इंसान द्वारा इंसान का शोषण पूरी तरह समाप्त हो जाए। वे दुनिया भर के क्रांतिकारी आंदोलनों का अध्ययन करते थे और भारत की आज़ादी को वैश्विक मुक्ति संग्राम के एक हिस्से के रूप में देखते थे।

उनकी इस वैचारिक लड़ाई का एक बड़ा रूप लाहौर जेल में देखने को मिला, जहाँ उन्होंने भारतीय क्रांतिकारियों को राजनीतिक कैदी का दर्जा और मानवीय अधिकार दिलाने के लिए 116 दिनों की ऐतिहासिक भूख हड़ताल की। इस संघर्ष के दौरान उनके साथी जतिन दास शहीद भी हुए, लेकिन भगत सिंह पीछे नहीं हटे। उन्होंने देश को ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’ जैसा अमर नारा दिया, जिसका मतलब कोई खूनी क्रांति नहीं, बल्कि समाज के अन्यायपूर्ण और शोषक ढांचे को बदलकर एक समतावादी समाज का निर्माण करना था। इतिहास की किताबों में अक्सर भगत सिंह और महात्मा गांधी के बीच वैचारिक मतभेदों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। यह सच है कि दोनों के रास्ते अलग थे, लेकिन गांधी जी के प्रति भगत सिंह के मन में गहरी श्रद्धा थी। वे गांधी जी के जन आंदोलन खड़े करने की क्षमता के कायल थे। उन्होंने खुले दिल से स्वीकार किया था कि गांधी जी ने देश की सोई हुई जनता को जगाने का जो अभूतपूर्व काम किया है, वह बेहद वंदनीय है। इसी तरह, पंडित जवाहरलाल नेहरू के प्रति भगत सिंह की सोच बेहद सकारात्मक और सम्मानजनक थी। भगत सिंह नेहरू जी के प्रगतिशील, आधुनिक और अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण की सराहना करते थे। उन्होंने अपने एक प्रसिद्ध लेख ‘नए नेताओं के अलग-अलग विचार’ में नेहरू जी को एक ऐसा नेता बताया था जो युवाओं को रूढ़िवादिता से निकालकर वैज्ञानिक सोच की ओर ले जा सकता है।

भगत सिंह की शख्सियत का सबसे अद्भुत पहलू उनका नास्तिक होना था। एक ऐसे देश में जहां धर्म इंसानी पहचान का सबसे बड़ा आधार माना जाता है, वहां भगत सिंह ने गर्व से ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ जैसा कालजयी निबंध लिखा। उनकी नास्तिकता किसी चिढ़ या गुस्से का परिणाम नहीं थी, बल्कि यह गहन अध्ययन, तर्क और वैज्ञानिक चेतना पर आधारित थी। लेकिन वे एक ऐसे नास्तिक थे जो समाज में पूर्ण धार्मिक सद्भाव चाहते थे। वे चाहते थे कि हर धर्म का इंसान, चाहे वह हिंदू हो, मुस्लिम हो, सिख हो या ईसाई, पूरी आज़ादी और आपसी भाईचारे के साथ रहे। उनके लिए धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय था, जिसे राजनीति या सामाजिक अधिकारों के बीच नहीं आना चाहिए था। इस महानायक की ज्ञान के प्रति ललक का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि फांसी के फंदे पर झूलने से ठीक कुछ मिनट पहले तक वे लेनिन की किताब पढ़ रहे थे। जब जेलर उन्हें लेने आया, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा था, ‘ठहरो, एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है।’ मौत के मुहाने पर खड़े होकर भी किताब के पन्नों में खो जाना यह साबित करता है कि उनके लिए वैचारिक स्पष्टता जीवन से भी अधिक मूल्यवान थी। भगत सिंह आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार, उनकी अंतरराष्ट्रीय सोच और एक शोषण-मुक्त, सद्भावपूर्ण समाज का उनका सपना आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना एक सदी पहले था। ये सच है कि शहीदे आज़म जैसी विराट शख्सियत को एक लेख में समेटना आसान नहीं है, ये बस एक श्रद्धांजलि थी।