भक्ति परंपरा में ईश्वर के प्रति प्रेम और मानव के प्रति करुणा के बीच गहरा संबंधः प्रो. सुरेश

Deep connection between love for God and compassion for humans in the Bhakti tradition: Prof. Suresh

रविवार दिल्ली नेटवर्क

तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर इंडियन नॉलेज सिस्टम- सीआईकेएस की ओर से मध्यकालीन व्यवधान और भक्ति एवम् संत परंपराः भक्ति और लोकभाषाओं के माध्यम से शिक्षा पर 17वें राष्ट्रीय ऑनलाइन कॉन्क्लेव

माखनलाल चतुर्वेदी नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ जर्नलिज्म एंड कम्युनिकेशन के फॉर्मर वाइस चांसलर एवम् इंडिया हैबिटेट सेंटर के डायरेक्टर प्रो. केजी सुरेश ने मध्यकालीन परिस्थितियों और भक्ति-संत परंपरा के व्यापक सामाजिक और शैक्षिक प्रभाव पर कहा, शिक्षा केवल औपचारिक संस्थानों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह समाज, संस्कृति और जीवन-मूल्यों से जुड़े ज्ञान को समृद्ध करने वाली होनी चाहिए। प्रो. सुरेश ने भक्ति को नैतिक जीवन-पद्धति से जोड़ते हुए कहा, वास्तविक भक्ति केवल पूजा या धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यह व्यक्ति के व्यवहार में भी दिखाई देनी चाहिए। भक्ति का उद्देश्य केवल ईश्वर के प्रति समर्पण नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर नैतिक परिवर्तन उत्पन्न करना भी है। आंतरिक शुद्धता, सत्य, करुणा, सेवा, आत्मसंयम, सह-अस्तित्व और मानवीय सम्मान सरीखे मूल्य इस दृष्टि के केंद्र में आते हैं। जब भक्ति व्यवहार में करुणा, सेवा और सह-अस्तित्व के रूप में प्रकट होती है, तब वह व्यक्तिगत आध्यात्मिकता से आगे बढ़कर सामाजिक नैतिकता का रूप ग्रहण करती है। प्रो. केजी सुरेश ने कहा, सर्वे भवन्तु सुखिनः और सार्वभौमिक कल्याण का मूल भाव केवल व्यक्तिगत सुख नहीं, बल्कि सामूहिक कल्याण और सर्वजन हित है। भक्ति परंपरा में ईश्वर के प्रति प्रेम और मानव के प्रति करुणा के बीच गहरा संबंध दिखाई देता है। लोककल्याण की अवधारणा को व्यापक बनाते हुए प्रो. सुरेश ने भारतीय ज्ञान परंपरा को समकालीन पर्यावरणीय संकट और ग्लोबल वार्मिंग के संदर्भ से जोड़ने की आवश्यकता पर भी बल दिया। प्रो. सुरेश तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के सेंटर फॉर इंडियन नॉलेज सिस्टम- सीआईकेएस की ओर से मध्यकालीन व्यवधान और भक्ति एवम् संत परंपराः भक्ति और लोकभाषाओं के माध्यम से शिक्षा पर आयोजित 17वें राष्ट्रीय ऑनलाइन कॉन्क्लेव में बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे। इससे पूर्व दीप प्रज्जवलन के संग कॉन्क्लेव का शुभारम्भ हुआ।

भक्ति को एक-केंद्रीय आंदोलन के रूप में न समझेंः प्रो. विभा राठौर
स्वामी विवेकानन्द सुभारति यूनिवर्सिटी, मेरठ की प्रो. विभा राठौर ने कहा, भक्ति परंपरा ने ज्ञान और आध्यात्मिक विचारों को व्यापक समाज तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लोकभाषाओं और सरल अभिव्यक्ति के माध्यम से धार्मिक, नैतिक एवम् सामाजिक विचारों को सामान्य जन के लिए अधिक सुलभ बनाया है। डॉ. राठौड़ ने भक्ति परंपरा की बहुकेंद्रीय एवम् क्षेत्रीय प्रकृति पर प्रकाश डालते हुए कहा, भक्ति को किसी एकरूप या एक-केंद्रीय आंदोलन के रूप में नहीं समझा जाना चाहिए। इसके विभिन्न क्षेत्रीय रूपों ने स्थानीय भाषाओं, सामाजिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक परंपराओं के साथ निरंतर संवाद स्थापित किया। तमिल क्षेत्र में आलवार और नायनार, कर्नाटक में बसवन्ना एवम् वचन परंपरा, महाराष्ट्र में ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम, उत्तर भारत में कबीर, रविदास, सूरदास, तुलसीदास और मीराबाई, पंजाब में गुरु नानक, बंगाल और असम में चैतन्य एवम् शंकरदेव की परंपराओं के माध्यम से भक्ति की विविध क्षेत्रीय अभिव्यक्तियाँ विकसित हुईं। इस क्षेत्रीय विविधता से स्पष्ट होता है कि भक्ति परंपरा केवल धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति नहीं थी; उसने भाषा, स्मृति, सामुदायिक संवाद और ज्ञान-संचार के लिए भी नए मंच निर्मित किए हैं। इससे पूर्व टीएमयू के कुलपति प्रो. वीके जैन ने कार्यक्रम की शैक्षणिक महत्ता को रेखांकित करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा, शिक्षा और सांस्कृतिक विरासत के अध्ययन को महत्वपूर्ण बताया। टीएमयू के सीआईकेएस की समन्वयक डॉ. अलका अग्रवाल ने वोट ऑफ थैंक्स दिया। संचालन डॉ. माधव शर्मा ने किया।