दिलीप कुमार पाठक
सुबह-शाम के वक्त किसी भी कॉलोनी के पार्क या मंदिर के चबूतरे या सीढ़ियों पर देखिए। वहाँ आपको बेंच पर अकेले बैठे कुछ बुजुर्ग मिल जाएंगे, जो बिना किसी काम के बस बैठे रहते हैं। वहां से गुजरने वाले हर इंसान को देखते हैं, फिर छोटी-छोटी चीजों पर डिस्कशन भी करते हैं। कभी उनके पास सिर्फ दो मिनट के लिए बैठकर देखिएगा। शुरुआत भले ही मौसम या राजनीति से हो, लेकिन जैसे ही उन्हें लगता है कि सामने वाला वाकई उनकी बात सुन रहा है, उनके भीतर से इंट्रेस्टिंग कहानियां निकलने लगती हैं। वे अपने दौर के ऐसे-ऐसे दिलचस्प किस्से और अपनी जवानी के संघर्ष सुनाने लगते हैं कि आप दंग रह जाएंगे। कई बार तो उनके हास्य का पुट और मजाक करने का अंदाज इतना खूबसूरत होता है कि हमारे आज के चुटकुले उनके सामने फीके लगने लगते हैं। वे बूढ़े बुजुर्ग जीती-जागती किताबें हैं, जिन्हें बस कोई अदब से पलटने वाला चाहिए।
यह कोई कहानी नहीं, बल्कि हमारे ही समाज का सच है। हालिया आंकड़ों की मानें तो देश में साठ साल से ऊपर के बुजुर्गों की संख्या 16.6 करोड़ के पार है और इसमें से हर दूसरा बुजुर्ग अकेलेपन की जिंदगी जी रहा है। करीब 37 फीसदी बुजुर्ग तो ऐसे हैं जो पूरी तरह अकेले रह रहे हैं। सोच कर देखिए, जिस देश में कभी दादा-दादी की कहानियों के बिना बच्चों की रात नहीं होती थी, वहाँ हमारे बड़े-बुजुर्ग अपनों के बीच ही इतने बेगाने कैसे हो गए? क्या हम इतने बेहिस हो चुके हैं कि हमें अपने ही घर की नींव नजर आना बंद हो गई है?
आज बड़े-बड़े फ्लैट्स में रहने वाले हज़ारों बुजुर्ग सिर्फ इसलिए गुमसुम रहने लगे हैं क्योंकि पूरे दिन में उनसे दो मीठी बातें करने वाला कोई नहीं होता। बच्चे पढ़-लिखकर बड़े शहरों या विदेशों में चले गए, वहाँ उनकी अपनी एक व्यस्त दुनिया बस गई। मगर पीछे छूट गए ये बूढ़े मां-बाप, जो सुबह से शाम तक बस दरवाजे को निहारते रहते हैं या बार-बार फोन की स्क्रीन देखते हैं कि शायद आज बच्चों का फोन आ जाए। इस अकेलेपन के बीच ढलती उम्र की बीमारियां और सुरक्षा का डर उनकी जिंदगी को और भारी बना देता है।
आए दिन जब अखबारों में अकेले रह रहे बुजुर्गों के साथ होने वाले हादसों की खबरें आती हैं, तो रूह कांप जाती है। आजकल बहुत से बच्चे वीडियो कॉल के ज़रिए अपने माता-पिता का अंतिम संस्कार कर देते हैं, और पैसे भेज देते हैं कि अंतिम संस्कार हो गया है, जबकि अंतिम संस्कार भी हमारी संस्कृति में कृतज्ञता एवं प्रेम व्यक्त करने की एक आख़िरी यादगार रस्म है, जो अब कुछ बच्चों ने मज़ाक बना दिया है। पैसों के इस घमंड ने हमारे भीतर के इंसान को मार दिया है। हम यह भूल जाते हैं कि जिस मां-बाप ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, वे आखिरी वक्त में कफन के लिए रुपयों के नहीं, बल्कि अपनी औलाद के कांधे के भूखे होते हैं।
बुजुर्गों को हमारे महंगे सामान या पैसों का लालच नहीं होता, वे तो सिर्फ हमारे थोड़े से समय के भूखे होते हैं। इस तस्वीर को बदलने के लिए हमें कोई बहुत बड़ा काम नहीं करना है, बस अपनी रोज़ की आदतों को थोड़ा सा बदलना है। अपनी इतनी व्यस्त जिंदगी में से रोज़ सिर्फ पंद्रह मिनट का समय निकालिए। अपने माता-पिता या दादा-दादी के पास बैठिए, उनका हाथ थामिए और उनसे उनके ज़माने की कोई पुरानी याद सुन लीजिए। आप देखेंगे कि उनके चेहरे पर एक अलग ही सुकून और चमक आ जाएगी। उन्हें आज का नया मोबाइल चलाना सिखा दीजिए ताकि वे दूर बैठे नाती-पोतों का चेहरा देखकर खुश हो सकें, अपने घर के बुजुर्गों को गले लगाएं और उन्हें भरोसा दिलाएं कि वे आज भी हमारे लिए उतने ही जरूरी हैं, जितने कल थे। आखिर, कल वक्त के इसी मोड़ पर हमें भी तो पहुंचना है।





