डॉ. सत्यवान सौरभ
स्वतंत्रता के समय भारत के सामने केवल राजनीतिक स्वतंत्रता को स्थायी बनाने की चुनौती नहीं थी, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण भी करना था जिसमें भाषा, संस्कृति, परंपरा और क्षेत्रीय पहचान की असाधारण विविधता के बावजूद राष्ट्रीय एकता कायम रहे। ब्रिटिश शासन से विरासत में मिली प्रांतीय सीमाएँ प्रशासनिक सुविधा और औपनिवेशिक हितों के अनुरूप थीं। इनमें अनेक क्षेत्रों की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा गया था। इसलिए स्वतंत्रता के बाद भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग स्वाभाविक रूप से उठी।
हालाँकि शुरुआती दौर में राष्ट्रीय नेतृत्व भाषाई राज्यों को लेकर आशंकित था। विभाजन की त्रासदी अभी ताजा थी और यह भय था कि यदि राज्यों का गठन भाषा के आधार पर किया गया तो क्षेत्रीय पहचान राष्ट्रीय पहचान पर हावी हो सकती है। किंतु भारतीय लोकतंत्र की विशेषता यही रही कि उसने इन आकांक्षाओं को दबाने के बजाय संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से समायोजित करने का रास्ता चुना। समय ने सिद्ध किया कि भाषाई पहचान को सम्मान देना भारत की एकता के लिए खतरा नहीं, बल्कि उसकी मजबूती का आधार बन सकता है।
भाषाई पहचान की राजनीतिक स्वीकार्यता स्वतंत्रता से पहले ही दिखाई देने लगी थी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने प्रांतीय संगठनों का पुनर्गठन भाषाई आधार पर किया था। इसका उद्देश्य यह था कि जनता से संवाद उनकी भाषा और सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों में बेहतर ढंग से हो सके। लेकिन स्वतंत्रता और विभाजन के बाद परिस्थितियाँ बदल गईं। राष्ट्रीय नेतृत्व तत्काल किसी बड़े क्षेत्रीय पुनर्गठन के पक्ष में नहीं था।
1948 में गठित धार आयोग ने तत्काल भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की अनुशंसा नहीं की। इसके बाद जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल और पट्टाभि सीतारमैया की सदस्यता वाली जेवीपी समिति ने भी 1949 में राष्ट्रीय एकता, प्रशासनिक स्थिरता और नवगठित राष्ट्र की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। उस समय यह सावधानी समझ में आती थी, क्योंकि देश राजनीतिक संक्रमण और सामाजिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था।
लेकिन जन आकांक्षाओं को अनिश्चित काल तक टाला नहीं जा सकता था। आंध्र क्षेत्र में तेलुगु भाषी जनता के लिए अलग राज्य की मांग तेज होती गई। पोट्टि श्रीरामुलु के 1952 के आमरण अनशन और उनकी मृत्यु ने इस आंदोलन को निर्णायक मोड़ दिया। व्यापक जनदबाव के बाद 1953 में आंध्र राज्य का गठन हुआ। यह घटना केवल एक राज्य के निर्माण तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने देश के अन्य हिस्सों में भी भाषाई आधार पर राज्यों की मांग को गति दी।
इसके बाद सरकार ने समस्या का व्यापक और संस्थागत समाधान खोजने का प्रयास किया। 1953 में गठित राज्य पुनर्गठन आयोग, जिसकी अध्यक्षता फज़ल अली ने की, ने भाषाई और सांस्कृतिक आकांक्षाओं के साथ-साथ प्रशासनिक, आर्थिक तथा भौगोलिक व्यवहार्यता पर भी विचार किया। आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम तथा संविधान का सातवाँ संशोधन लागू हुआ। इसके परिणामस्वरूप भारत के प्रशासनिक मानचित्र में व्यापक बदलाव आया और 14 राज्यों तथा छह केंद्रशासित प्रदेशों की व्यवस्था अस्तित्व में आई।
भाषाई राज्यों का सबसे बड़ा योगदान यह रहा कि उन्होंने क्षेत्रीय पहचान और राष्ट्रीय पहचान के बीच टकराव को कम किया। जब किसी समुदाय को अपनी भाषा, संस्कृति और स्थानीय आकांक्षाओं के अनुरूप प्रशासनिक पहचान मिली तो अलगाव की भावना कमजोर हुई। लोगों को यह विश्वास मिला कि भारतीय संघ उनकी विशिष्ट पहचान को समाप्त करने के बजाय उसका सम्मान करता है।
भाषाई पुनर्गठन का दूसरा महत्वपूर्ण लाभ प्रशासनिक स्तर पर दिखाई दिया। मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में शासन-प्रशासन और सार्वजनिक सेवाओं की उपलब्धता ने राज्य और नागरिक के बीच दूरी कम की। लोकतंत्र तभी प्रभावी होता है जब नागरिक शासन की भाषा और प्रक्रिया को समझ सके। क्षेत्रीय भाषाओं में प्रशासन ने सामान्य नागरिकों की भागीदारी को अधिक सहज बनाया।
इस व्यवस्था ने लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को भी व्यापक बनाया। स्थानीय भाषा बोलने वाले राजनीतिक नेतृत्व को राज्य स्तर पर उभरने का अवसर मिला। इससे राजनीति अधिक जनसरोकारों से जुड़ी और विभिन्न क्षेत्रों की समस्याएँ राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनीं। भाषाई राज्यों ने यह भी सिद्ध किया कि संघीय व्यवस्था में अलग-अलग क्षेत्रीय पहचानें राष्ट्रीय एकता के साथ सह-अस्तित्व रख सकती हैं।
भारत का पुनर्गठन 1956 पर समाप्त नहीं हुआ। बदलती राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार राज्यों की सीमाओं में आगे भी परिवर्तन हुए। 1960 में महाराष्ट्र और गुजरात का गठन तथा 1966 में पंजाब के पुनर्गठन के साथ हरियाणा का निर्माण इसके महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। इससे स्पष्ट हुआ कि भारतीय संघ कोई स्थिर और अपरिवर्तनीय प्रशासनिक ढाँचा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के अनुरूप स्वयं को ढालने वाली व्यवस्था है।
हालाँकि भाषाई राज्यों की सफलता का अर्थ यह नहीं कि भाषाई अस्मिता से जुड़ी सभी चुनौतियाँ समाप्त हो गईं। भाषाई बहुसंख्यकवाद, अल्पसंख्यक भाषाओं की उपेक्षा और क्षेत्रीय श्रेष्ठताबोध जैसी प्रवृत्तियाँ संघीय सद्भाव के लिए चुनौती बन सकती हैं। इसलिए भाषाई पहचान के संरक्षण के साथ भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा भी आवश्यक है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि क्षेत्रीय आकांक्षाओं को संवैधानिक और लोकतांत्रिक माध्यमों से सुना जाए। किसी भी क्षेत्र की पहचान को राष्ट्र-विरोधी मानना उतना ही अनुचित है जितना क्षेत्रीय पहचान को राष्ट्रीय पहचान से ऊपर रखना। सांस्कृतिक अस्मिता और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन ही भारतीय संघवाद की वास्तविक शक्ति है।
भाषाई पुनर्गठन भारत के राष्ट्र-निर्माण की एक विशिष्ट उपलब्धि है। इसने यह महत्वपूर्ण सबक दिया कि विविधता को दबाकर एकता कायम नहीं की जा सकती। भारत ने अपनी भाषाई विविधता को संवैधानिक ढाँचे में स्थान देकर यह सिद्ध किया कि एकता समानता थोपने से नहीं, बल्कि विविधताओं को सम्मानपूर्वक समायोजित करने से मजबूत होती है। यही लचीला संघवाद आज भी भारत की लोकतांत्रिक स्थिरता और राष्ट्रीय एकता की महत्वपूर्ण आधारशिला है।





