यमुना के कालिंदी कुंज तट पर सेवा का वह स्वर्णिम सवेरा

That golden dawn of service on the banks of the Yamuna at Kalindi Kunj

नई दिल्ली के रायसीना मार्ग पर स्थित नेशनल मीडिया सेंटर से पुरानी टूरिस्ट बस में शुरू हुई हमारी यादगार यात्रा,जहाँ गाँधी-शास्त्री की सेवा भावना, पत्रकारिता और यमुना संरक्षण का संकल्प एक साथ दिखाई दिया

विनोद सिंह ‘तकियावाला’

अक्टूबर माह की पहली तारीख।दिल्ली की सुबह में हल्की ठंडक, सुहावनी हवा और आसमान पर फैली नर्म रोशनी के बीच रायसीना मार्ग स्थित नेशनल मीडिया सेंटर का वातावरण हमें कुछ अलग ही अनुभूति करा रहा था।रोज की भागदौड़ से अलग मन में विशेष उत्साह था।अगले दिन 2 अक्टूबर है,जब देश राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती मनाने जा रहा था। दोनों महापुरुषों का जीवन सेवा, सादगी, सत्य, स्वच्छता और राष्ट्रनिष्ठा का संदेश देता है।इसी भावभूमि में जल शक्ति मंत्रालय की ओर से यमुना के कालिंदी कुंज तट पर आयोजित स्वच्छता एवं सेवा अभियान में सहभागी बनने का अवसर मिला। मेरे लिए यह किसी सरकारी कार्यक्रम में भागीदारी भर नहीं थी। यह अपने शहर,अपने समय और अपनी नागरिक जिम्मेदारी को यमुना के किनारे खड़े होकर करीब से महसूस करने का अवसर था।वर्ष 2026 के स्वच्छता अभियान का संदेश ‘स्वच्छता में सहभाग, स्वच्छ भारत, विकसित भारत’ है। 17 सितंबर से 2 अक्टूबर तक चल रहे इस अभियान में स्वच्छता को सरकारी गतिविधि से आगे ले जाकर जनभागीदारी और सामूहिक जिम्मेदारी से जोड़ने पर बल दिया गया है।स्वैच्छिक श्रमदान इसी भावना का महत्वपूर्ण हिस्सा है।रायसीना मार्ग से हमारी यात्रा शुरू हुई।इस यात्रा का सबसे दिलचस्प हिस्सा थी वह पुरानी-सी टूरिस्ट बस,जो आधुनिक दिल्ली की चमचमाती तस्वीर से बिल्कुल मेल नहीं खाती थी।बस अपनी उम्र की कहानी कह रही थी।कहीं से थकी हुई, कहीं से खटारा-सी दिखाई देती थी,लेकिन उस सुबह उसमें बैठने वालों के लिए उसका महत्व किसी वातानुकूलित लग्जरी बस से कम नहीं था।शायद इसलिए कि उस दिन बस की मंजिल पर्यटन नहीं,सेवा थी।बस में अधिकारी,पत्रकार,फोटो पत्रकार, चालक,सहयोगी और कुछ अन्य साथी थे। न कोई बड़ा काफिला, न कोई दिखावटी तामझाम।किसी के हाथ में कैमरा था,किसी के पास नोटबुक और किसी के मन में यमुना के प्रति चिंता।मेरे लिए यह पत्रकारिता की एक अलग तस्वीर थी।सामान्यतः पत्रकार किसी घटना को देखने, सुनने और लिखने के लिए पहुँचता है। उस दिन हम केवल देखने वाले नहीं थे।हम स्वयं सेवा अभियान का हिस्सा बनने जा रहे थे।कैमरा और कलम के साथ हाथ में श्रम की जिम्मेदारी भी थी।दिल्ली की सड़कें धीरे-धीरे जाग रही थीं। कहीं दूध की गाड़ियाँ थीं,कहीं काम पर निकलते लोग और कहीं सुबह की सैर करते नागरिक। इसी जीवंत दिल्ली के बीच बहती यमुना हमारी यात्रा का अगला पड़ाव थी। .राजधानी की जीवनरेखा कही जाने वाली यह नदी सदियों से दिल्ली के इतिहास,संस्कृति और सभ्यता की साक्षी रही है। इसके किनारे साम्राज्य बने,बस्तियाँ बसीं और आधुनिक दिल्ली का विस्तार हुआ।आज यही यमुना हमारी पर्यावरणीय चेतना और सामूहिक जिम्मेदारी की कसौटी भी बन चुकी है।जब हमारी बस कालिंदी कुंज तट के करीब पहुँची तो वातावरण में एक अलग गंभीरता महसूस हुई।सामने यमुना नदी थी और आसपास स्वच्छता अभियान की तैयारियाँ।कुछ क्षण के लिए लगा कि हम किसी सामान्य कार्यक्रम में नहीं,बल्कि उस नदी के सामने खड़े हैं जिसने सदियों से हमारी सभ्यता को अपने आँचल में सँजोया है।यहीं गाँधी और शास्त्री की स्मृति इस यात्रा से स्वतः जुड़ जाती है।महात्मा गाँधी के लिए स्वच्छता केवल सफाई का विषय नहीं थी।वह सामाजिक चेतना और सार्वजनिक जीवन की जिम्मेदारी का हिस्सा थी। 2 अक्टूबर की पूर्व संध्या पर यमुना तट की सफाई में हाथ बँटाना उनके विचार को केवल याद करना नहीं, उसे कर्म में उतारने जैसा अनुभव था।लाल बहादुर शास्त्री का जीवन इसी भावना को सादगी और कर्तव्यनिष्ठा के रूप में सामने रखता है।उनका जीवन यह संदेश देता है कि राष्ट्रसेवा केवल बड़े पदों पर बैठकर नहीं होती।अपने दायित्व को ईमानदारी से निभाना भी राष्ट्रसेवा है। यमुना तट पर श्रम करते हुए यही विचार बार-बार मन में आता रहा।हमारे हाथों में दस्ताने थे,सामने यमुना थी और आसपास सेवा में जुटे लोग।कुछ समय के लिए पत्रकार और अधिकारी की पहचान पीछे छूट गई थी।वहाँ केवल नागरिक होना महत्वपूर्ण था।यही सेवा की वास्तविक शक्ति है।जब पद और पहचान से ऊपर उठकर व्यक्ति स्वयं को समाज का हिस्सा मानता है,तब श्रमदान औपचारिकता नहीं रहता।कालिंदी कुंज यमुना संरक्षण में जनभागीदारी का महत्वपूर्ण स्थल भी बन चुका है।सितंबर 2025 में जल शक्ति मंत्रालय के नेतृत्व में यहाँ ‘एक दिन, एक घंटा,एक साथ’ श्रमदान आयोजित किया गया था। इसमें केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल और राज्य मंत्री वी. सोमन्ना के साथ विभागीय अधिकारियों,युवाओं, विद्यार्थियों,गैर-सरकारी संगठनों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। यह भागीदारी बताती है कि नदी संरक्षण का दायित्व केवल सरकारी संस्थानों तक सीमित नहीं रह सकता।यमुना की चुनौती केवल तट पर दिखाई देने वाले कूड़े तक सीमित नहीं है। नदी को स्वच्छ रखने के लिए सीवेज उपचार,नालों का प्रबंधन, औद्योगिक प्रदूषण पर निगरानी, ठोस कचरे का उचित निस्तारण और नागरिक व्यवहार में बदलाव जैसे अनेक स्तरों पर काम करना पड़ता है।नमामि गंगे कार्यक्रम में सीवेज उपचार,नदी सतह की सफाई,जैव विविधता संरक्षण, वनीकरण,जनजागरूकता और औद्योगिक अपशिष्ट की निगरानी जैसे प्रयास शामिल हैं।सरकारी आँकड़ों के अनुसार मार्च 2026 तक नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत 524 परियोजनाएँ स्वीकृत की गई थीं, जिनमें 355 परियोजनाएँ पूरी हो चुकी थीं। जून 2026 तक इस कार्यक्रम के तहत 4,263 मिलियन लीटर प्रतिदिन की सीवेज उपचार क्षमता सृजित किए जाने की जानकारी दी गई।इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि नदी की वास्तविक सफाई केवल सतह से कचरा हटाने तक सीमित नहीं है।नदी में पहुँचने वाले प्रदूषित जल को रोकना और उसका उपचार करना भी उतना ही आवश्यक है।

इसीलिए श्रमदान और दीर्घकालीन नदी संरक्षण को एक-दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। श्रमदान नागरिक को अपनी जिम्मेदारी का प्रत्यक्ष अनुभव कराता है, जबकि सीवेज उपचार और प्रदूषण नियंत्रण जैसी व्यवस्थाएँ नदी के स्थायी पुनर्जीवन का आधार तैयार करती हैं।2025 के कालिंदी कुंज आयोजन में विद्यार्थियों,युवाओं, गैर-सरकारी संगठनों,नागरिक समाज और स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी इसी व्यापक सोच का संकेत थी। उसी वर्ष स्वच्छता ही सेवा अभियान के दौरान देशभर में 18 करोड़ से अधिक लोगों की जनभागीदारी का सरकारी आकलन सामने आया था। यह संख्या बताती है कि स्वच्छता का संदेश तभी स्थायी बन सकता है, जब वह सरकारी कार्यक्रम से निकलकर समाज के व्यवहार का हिस्सा बने।यमुना केवल दिल्ली की नदी नहीं है। यह हमारी सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है।इसके किनारे हमारी सभ्यता की अनेक परतें विकसित हुई हैं।इसलिए यमुना की स्वच्छता केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं, हमारी सांस्कृतिक और नागरिक जिम्मेदारी का प्रश्न भी है।

सरकारें योजनाएँ बना सकती हैं,अभियान चला सकती हैं और संसाधन उपलब्ध करा सकती हैं, लेकिन नदी को स्वच्छ रखने का स्थायी संकल्प समाज की सामूहिक चेतना से ही आकार लेगा।उस सुबह की पुरानी टूरिस्ट बस भी अब मुझे केवल एक बस नहीं लग रही थी।वह इस पूरी यात्रा की स्मृति बन गई थी। उसके भीतर बैठे लोग यमुना की ओर जा रहे थे और लौटते समय हर किसी के पास अनुभव की अपनी कहानी थी।किसी के कैमरे में तस्वीरें थीं, किसी की नोटबुक में शब्द और किसी के मन में एक सवाल – हम अपनी नदियों को स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी कब तक केवल अभियानों के भरोसे छोड़ते रहेंगे?नदी के किनारे जमा कूड़ा कुछ घंटों में हटाया जा सकता है,लेकिन नदी के प्रति हमारी सोच बदलने में समय लगेगा।वास्तविक स्वच्छता तब होगी,जब यमुना के किनारे कूड़ा फेंकने से पहले हर व्यक्ति एक क्षण ठहरकर सोचे कि वह केवल नदी को नहीं, अपनी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को भी प्रभावित कर रहा है।नेशनल मीडिया सेंटर से कालिंदी कुंज तट तक की वह छोटी-सी यात्रा मेरे लिए बड़ी स्मृति बन गई। अक्टूबर की सुहावनी सुबह, पुरानी टूरिस्ट बस,साथ बैठे अधिकारी और पत्रकार साथी, कैमरे की क्लिक, सेवा में जुटे हाथ और सामने बहती यमुना—इन सबने मिलकर उस यात्रा को ऐसा अनुभव बना दिया, जिसे केवल समाचार के रूप में नहीं देखा जा सकता।2 अक्टूबर को जब देश महात्मा गाँधी और लाल बहादुर शास्त्री को श्रद्धापूर्वक याद करेगा, तब उनके जीवन से जुड़े दो शब्द हमारे सामने विशेष रूप से होंगे—सेवा और सादगी। यमुना के तट पर बिताई उस सुबह ने इन दोनों शब्दों को मेरे लिए फिर से जीवंत कर दिया।शायद यही स्वच्छता ही सेवा अभियान की सबसे बड़ी सार्थकता है।सेवा तब कार्यक्रम नहीं रहती,जब वह व्यक्ति के भीतर जिम्मेदारी की भावना जगा दे। स्वच्छता तब अभियान नहीं रहती,जब वह हमारी आदत बन जाए। और नदी तब केवल जलधारा नहीं रहती,जब उसके साथ हमारी सभ्यता, हमारी आस्था और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य जुड़ जाए।उस सुबह जब हम पुरानी टूरिस्ट बस से लौट रहे थे, दिल्ली की सड़कें फिर उसी रफ्तार से चल रही थीं। मगर मेरे भीतर कुछ बदल चुका था। यमुना के तट पर बिताए वे कुछ घंटे यह एहसास छोड़ गए कि राष्ट्रसेवा हमेशा किसी बड़े मंच से शुरू नहीं होती।कभी- कभी वह एक पुरानी बस से शुरू होती है और पहुँचती है उस नदी के किनारे, जहाँ अपने हाथों से सफाई करते हुए मन यह संकल्प लेता है कि देश केवल सरकारों से नहीं,नागरिकों की जिम्मेदारी से भी बनता है।यही 2 अक्टूबर की सच्ची भावना है। यही गाँधी और शास्त्री को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि भी है। और यही यमुना के किनारे उस स्वर्णिम सवेरे की सबसे बड़ी सीख है- स्वच्छ भारत का सपना किसी एक दिन के श्रमदान से पूरा नहीं होगा।वह तब साकार होगा,जब सेवा हमारे संस्कार और स्वच्छता हमारी जीवनशैली बन जाएगी।