स्वदेश कुमार
उत्तर प्रदेश की सियासत एक बार फिर करवट ले रही है और साल 2027 के विधानसभा रण के लिए सूबे की राजधानी लखनऊ में सियासी बिसात तेजी से बिछाई जाने लगी है। राज्य में सत्ता की सीढ़ी चढ़ने या बचाने के लिए सियासी दलों ने अपने तरकश के सबसे धारदार तीर निकालने शुरू कर दिए हैं। समाजवादी पार्टी जहां अपने अचूक माने जाने वाले ‘पीडीए’ यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले के दम पर जनता के बीच पैठ मजबूत कर रही है, वहीं सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी ने अपनी रणनीति को धार देने के लिए एक बार फिर उस चाणक्य को मैदान में उतार दिया है, जिनके नाम से ही राजनीति के बड़े-बड़े समीकरण थरथरा उठते हैं। हम बात कर रहे हैं देश के केंद्रीय गृह मंत्री और बीजेपी के चुनावी रणनीतिकार अमित शाह की, जिनकी लखनऊ की धरती पर हो रही यह सीधी एंट्री महज एक सामान्य संगठनात्मक दौरा नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश में सत्ता की हैट्रिक लगाने का एक बेहद सुनियोजित खाका है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा आम हो चुकी है कि साल 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को उत्तर प्रदेश के भीतर जो अप्रत्याशित झटके लगे थे, उसने पार्टी के भीतर गहरी आत्मसमीक्षा को जन्म दिया है। 80 लोकसभा सीटों वाले इस सबसे बड़े सूबे में जब भगवा दल महज 33 सीटों पर सिमट गया, तब सियासी पंडितों ने इसके पीछे कई अंदरूनी कारण तलाशे। धरातल पर कार्यकर्ताओं की लगातार यह शिकायत रही कि स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक मशीनरी और विधायकों के रवैये के चलते उनकी सुनवाई नहीं हो रही है, जिससे भितरघात और उदासीनता का माहौल पैदा हुआ। इसके अलावा, अखिलेश यादव के पीडीए फॉर्मूले ने गैर-यादव पिछड़ी जातियों और गैर-जाटव दलितों के एक बड़े वर्ग को साधने में सफलता हासिल की, जिससे बीजेपी के पारंपरिक समीकरणों में सेंध लगी। ऐसे में, इन तमाम कमियों को दुरुस्त करने, कार्यकर्ताओं के भीतर फिर से जोश भरने और जमीनी स्तर पर संगठन की नब्ज टटोलने की बागडोर अब सीधे अमित शाह ने अपने हाथों में थाम ली है।
इसी सियासी और रणनीतिक पृष्ठभूमि के तहत लखनऊ में 30 और 31 अक्टूबर को प्रदेश कार्यसमिति की एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक का आयोजन किया गया है। इस बैठक से ठीक पहले बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी की ओर से जारी की गई 548 सदस्यीय नई कार्यसमिति की सूची ने साफ कर दिया है कि पार्टी इस बार किसी भी तरह के ढिलाई के मूड में नहीं है। इस लंबी-चौड़ी फेहरिस्त में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और दोनों उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य व ब्रजेश पाठक को जहां स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाया गया है, वहीं पार्टी के दिग्गज नेताओं जैसे डॉ. मुरली मनोहर जोशी, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी, केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद, हरदीप सिंह पुरी, एसपी सिंह बघेल के साथ-साथ पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और मुख्तार अब्बास नकवी तक को शामिल किया गया है। इसके अलावा 134 विशेष आमंत्रित सदस्यों में अरुण सिंह, सुधांशु त्रिवेदी, गौरव भाटिया, दारा सिंह चौहान से लेकर अभिनेता और सांसद बने अरुण गोविल और हेमा मालिनी जैसे बड़े चेहरों को जगह देकर पार्टी ने हर वर्ग, हर क्षेत्र और हर जाति को साधने का एक स्पष्ट संदेश दे दिया है। अमित शाह का उत्तर प्रदेश की राजनीति से पुराना और अटूट नाता रहा है। साल 2013 का वह दौर आज भी सियासी इतिहास के पन्नों में दर्ज है, जब बीजेपी उत्तर प्रदेश में तीसरे-चौथे नंबर की पार्टी हुआ करती थी और राज्य की सियासी जमीन को बंजर माना जा रहा था। उस वक्त पार्टी की कमान संभालते ही अमित शाह ने जो 60-40 का सोशल फॉर्मूला गढ़ा था, उसने सारे समीकरण पलट दिए थे। उन्होंने सपा और बसपा के पारंपरिक वोटबैंक यानी 40 फीसदी आबादी (यादव, मुस्लिम, जाटव) के मुकाबले बाकी 60 फीसदी आबादी यानी उच्च जातियों, गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलितों को एकजुट करने की ऐसी रणनीति बनाई कि साल 2014 के लोकसभा चुनाव में एनडीए ने 80 में से 73 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया। इसके बाद साल 2017 के विधानसभा चुनाव में उनकी बूथ स्तर की ‘पन्ना प्रमुख’ रणनीति, पचमढ़िया सम्मेलनों और माइक्रो-कास्ट मैनेजमेंट के बूते बीजेपी ने 312 सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ 14 साल बाद उत्तर प्रदेश की सत्ता में धमाकेदार वापसी की थी।
लेकिन वक्त के साथ जब संगठन के समीकरण बदले और केंद्रीय स्तर पर रणनीतिकारों की दूरियां जमीन से थोड़ी कम हुईं, तो उसका असर परिणामों पर भी दिखा। साल 2024 के परिणामों से सबक लेते हुए अब अमित शाह के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन जमीनी कार्यकर्ताओं को फिर से मनाने की है, जो उपेक्षा का शिकार महसूस कर रहे थे। इसके अलावा, अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल, निषाद पार्टी के संजय निषाद और सुभासपा के ओमप्रकाश राजभर जैसे क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ समन्वय बिठाकर पिछड़े और अति-पिछड़े मतदाताओं के बीच अपनी पुरानी धार को वापस पाना होगा। इतिहास गवाह है कि अमित शाह टिकट वितरण और उम्मीदवारों के चयन में भावनाओं से ज्यादा जीत की संभावना को प्राथमिकता देते हैं। पिछले एक दशक से सत्ता में रहने के कारण कई स्थानीय विधायकों और मंत्रियों के खिलाफ उपजे जनआक्रोश को भांपते हुए, इस बार भी खराब प्रदर्शन करने वाले चेहरों के टिकट काटकर नए और साफ-सुथरे स्थानीय चेहरों को आगे बढ़ाने का कड़ा संदेश लखनऊ की इन बैठकों से दिया जा सकता है। फिलहाल, 2027 के इस सियासी दंगल में बीजेपी ने अपनी तैयारियों का चक्रव्यूह रचना शुरू कर दिया है। अमित शाह की मौजूदगी में होने वाली बैठकों का मुख्य केंद्र बिंदु कमजोर बूथों की पहचान करना, जिला और क्षेत्रीय स्तर पर पेंच कसना और मतदाताओं के बीच संवाद और संपर्क के दायरे को और अधिक व्यापक बनाना है। पार्टी जानती है कि उत्तर प्रदेश की गद्दी का रास्ता कमजोर रास्तों से होकर नहीं गुजर सकता, इसलिए हर एक जाति, हर एक क्षेत्र और हर एक नाराज कार्यकर्ता को साधना इस वक्त की सबसे बड़ी प्राथमिकता है। एक तरफ जहां विपक्ष अपनी पीडीए की पिच पर मजबूत शॉट खेलने की तैयारी में है, वहीं दूसरी तरफ अमित शाह के चुनावी चातुर्य और नए बूथ मैनेजमेंट प्लान के सहारे बीजेपी एक बार फिर राज्य की सत्ता पर काबिज होकर इतिहास रचने की पुरजोर कोशिश में जुटी है। आने वाले दिन तय करेंगे कि यह रणनीति विपक्ष के किले में कितनी बड़ी सेंध लगा पाती है।





